Sunday, April 30, 2017

Shuja'ate Hazrat e Abbas (a.s)

Shuja'ate Hazrat e Abbas (a.s)

Joo'n ki too'n fauje yazeedi rahi maqtal me khadi
Khainch kar khat zamee'n par jaise hi jarraar utha

Dushmane dee'n ka lahoo bahte huwe aataa nazar
Sheh jo Abbas se kah dete ke talwaar utha

✍ Zeeshan Azmi

Wednesday, April 19, 2017

Wo mehfil wo majlis se Nabi(saw) ko enaad hai

Wo mehfil wo majlis se Nabi(saw) ko enaad hai

حدیثِ نبی ثقلین والی تو یاد ہے

برابر کا پلّہ جس سے بر حق مراد ہے

جہاں عترت و قرآن کا ذکر ہو نہیں

وہ محفل وہ مجلس سے نبی کو عناد ہے

Hadith e Nabi(saw),  Saqlain wali to Yaad Hai

Baraaber ka palla jis se bar haq  muraad hai

Jaha'n Itrat o quraan ka zikr ho nahi

Wo mehfil wo majlis se Nabi(saw) ko e'naad hai

✍ Zeeshan Azmi

Monday, April 17, 2017

Shabbir hai quran to nuqta Ali asghar

Shabbir hai quran to nuqta Ali asghar

Bhai hai Sakina ka wo Nannah Ali Asghar
Zahra ke gulistaa'n ka hai ghuncha Ali Asghar

Faujein thi jawa'n dushmane islam ki lekin
Maghloob kiya Jang me bachcha Ali Asghar

Kaafi hai yeh tafseer zamane ko batao
Shabbir hai quran to nuqta Ali asghar

Kiyon kar na mohabbat kare Zeeshan o Ghayur
Mazloom hai  Masoom hai pyaara Ali Asghar

✍ Zeeshan Azmi

Thursday, April 13, 2017

Be lagaam chodd dein be sha'oor peedi ko

Khud ba khud maqam e murtad pe qaum pohchegi
Be lagaam chodd dein be sha'oor peedi ko

خود بخود مقامِ مرتد پہ قوم پہنچے گی
بے لگام چھوڑ دیں بے شعور پیڑی کو

खुद ब खुद मक़ामे मुरतद पे क़ौम पहुंचेगी
बेलगाम छोड़ दें बेशऊर पीढ़ी को

Ek alag andaz me :
Eik do nahee.n murtad saari qaum thahereygi,
Be lagaam rakh dei.n gar be shawoor peedhee ko.

Mushkil ko door karta hai mushkil kusha Ali

Mushkil ko door karta hai mushkil kusha Ali

Har Manzilon ke raasto'n ka raasata Ali
Har rahnuma se achcha mera rahnuma Ali

Allah ke wali hain, wasiye Rasool bhi
Sab se buland martaba hai aap ka Ali

Deene khuda ki kashti ko koi dubaye kya
Allah ki taraf se hai jab nakhuda Ali

Nazil kahoo to kaise kahoo nuqs hai bada
Hum maante hai kaabe me paida huwa Ali

Nade Ali kaho Nabi, Jibreel ne kaha
Mushkil ko door karta hai mushkil kusha Ali

Dil ko sukoo'n milta hai aur hausala hame
Zeeshan jab zuba'n se nikalta hai Ya Ali

✍ Zeeshan Azmi

Note: 4th sher's dalil:

*आइम्मा (अ) के लिए विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिखने के नुक़्सानात*
मौला की मुहब्बत में बाज़ लोग इतना आगे बढ़ गए के वो मासूमीन (अ) और उलोमा की सीरत को छोड कर अपनी मरज़ी से आइम्मा (अ) के लिए विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिखने लगे हैं जबके मासूमीन से जो रिवायतें मासूमीन की विलादत के बारे में किताबों में मिलती हैं उन सब में विलादत ही लिखा है, हमें ये कोई हक़ नहीं पहुंचता के हम इमामे मासूम से भी आगे बढ़ जाऐं हम किसी भी मासूम से न इतनी मुहब्बत कर सकते हैं जितनी एक मासूम दूसरे मासूम से करते थे और न हमें इतनी मारफ़त हो सकती है जितनी एक मासूम को दूसरे मासूम की थी इसके बावजूद भी एक मासूम ने दूसरे मासूम की विलादत के लिए ज़हूर या नुज़ूल का लफ़ज़ इस्तेमाल नहीं किया है।
अगर हम आइम्मा ए मासूम (अ) की विलादत को ज़हूर या नुज़ूल लिखना शूरु करदें तो इस से शीया मज़हब को बहूत सारे नुक़्सानात पंहुच सकते हैं।
वर्षों से वहाबी ये कोशिश कर रहे हैं के इमाम अली (अ) की ख़ाना ए काबा में विलादत की फ़ज़ीलत को कमरंग कर दिया जाए, लेकिन शिया उलोमा ने ऐसा होने नहीं दिया, मगर नुज़ूल या ज़हूर लिखने वाले़ वहाबियों की इस कोशिश को पानी दे रहें है और विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिख कर नादानिस्ता, वहाबियों को फ़ायदा पंहुचा रहे हैं, क्योंकि ज़ुहूर या नुज़ूल रायज होने से इमाम अली (अ) की मौलूदे काबा होने की फ़ज़ीलत ख़त्म हो जाएगी।
जब विलादत का इंकार कर दिया तो शहादत का भी इंकार होगा तो मक़ामाते मुक़द्देसा नजफ़, करबला, क़ुम, मशहद वग़ैरा की ज़ियारत और इजतमा की कोई अहमियत नहीं रहेगी और फिर ये सवाल भी होगा के जब कोई शहीद हुआ ही नहीं तो फिर इन ज़ियारतगाहों में कौन दफ़न है।?
ज़हूर या नुज़ूल कहने या लिखने के क़ायल अफराद को ज़ियारते वारेसा का इंकार करना पडेगा क्योंकि ज़ियारते वारेसा में मासूम (अ) फ़रामते हैं के: मैं गवाही देता हूँ के आप बुलंद तरीन सुल्बों और पाकीज़ा तरीन रहमों में नूरे इलाही बन कर रहे, और ये बात सब जानते हैं के सुल्ब और रहम का ताअल्लुक़ विलादत से होता है।
मासूम से मरवी रजब की दुआ कर इंकार करना पडेगा जिस में मासूम फ़रमाते हैं के: ऐ माबूद ! माहे रजब में मुतावल्लिद होने वाले 2 मौलूदों के वास्ते से सवाल करता हूँ जो इमाम मुहम्मद तक़ी (अ) और इमाम अली नक़ी (अ) बुलंद नसब वाले हैं, इन दोनों के वास्ते से तेरा बेहतरनी तक़र्रुब चाहता हूँ।
जब विलादत का इंकार किया जाएगा तो शहादत का इंकार भी करना पडेगा और जब शहादत का इंकार किया जाएगा तो मान्ना पड़ेगा के इमाम को शहीद करने वाला भी कोई नहीं था, लेहाज़ा ज़ालेमीन के ज़िम्मे आइम्मा का कोई ख़ून नहीं रहेगा।
वो तमाम दुआऐं और ज़ियारतें जो अक़ायद और मुआरिफ़ से भरी हुई हैं और जिन में ज़ालेमीन पर लआन ज़िक्र हुई है उनका इंकार कर दिया जाएगा, इस लिए के जब किसी ने शहीद ही नहीं किया तो लआन वो तआन क्यों ?
जब आइम्मा पैदा ही नहीं होते तो नस्ले सादात कहाँ से वजूद में आ गई ? क्या तमाम सादात का भी ज़हूर हो गया है ? इस अक़ीदे वाले को नस्ले सादात का इंकार करना पडेगा।
मासूम की विलादत का इंकार करने वालों को ईदे मीलादुन्नबी (स) का इंकार करना पड़ेगा और वहाबी यही चाहते हैं, क्योंकि तमाम मुसलमान नबी (स) की विलादत का जश्न मनाते हैं और आपके रोज़े विलादत को किसी ने भी ज़हूर या नुज़ूल से याद नहीं किया है।
ऐसा अक़ीदा रखने वालों को इमाम अली (अ) की एक ऐसी फ़ज़ीलत का इंकार करना पडेगा जिस में कोई दूसरा शरीक नहीं है और वो ‘‘ मौलूदे काबा ‘‘ होना है, अलबत्ता वहाबी इसका भी इंकार करते हैं।
जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (अ) और दीगर आइम्मा ए मासूमन (अ) की इस फ़ज़ीलत के बारे में मरवी उन रिवायतों का इंकार करना पडेगा जिन में इन मासूमीन (अ) को शिकमे मादर में अपनी वालेदा से बातें करते हुए बताया गया है।
विलादत के बजाए ज़हूर इस्तेमाल होने लगे तो सब से बड़ा नुक़्सान ये होगा के लोगों के ज़हन में इमामे ज़माना (अ) के ज़हूर की जो ख़ुसूसियत है वो ख़त्म हो जाएगी।
(तालिबे दुआः पैग़ंबर नौगांवी)

Friday, April 7, 2017

Jaha'n ke logo'n ko har pahlo se bataya gaya

Kalam e khuda ke zariye, ghalat sahih hai kya
Jaha'n ke logo'n ko har pahlo se bataya gaya

کلامِ خدا کے ذریعہ غلط صحیح ہے کیا
جہاں کے لوگوں کو ہر پہلو سے بتایا گیا

कलामे खुदा के जरिए गलत सहीह है क्या
जहां के लोगों को हर पहलू से बताया गया

✍ Zeeshan Azmi

Monday, April 3, 2017

Shaoor paak ho tab midhat e naqi hogi

*Shao'or paak ho tab midhat e naqi hogi*

1. Nazar me jiske zara azmate Naqi hogi
Ita'ate Ali aur ta'ate Naqi hogi

2. Rajab ke maah me hoga qamar ko rashq bahut
Zami'n ki god me jab surate Naqi hogi

3. Khilega chahra jo ibne taqi ki aamad par
Usi ke wasate bas qurbate Naqi hogi

4. Khayal e kham se koi sana nahi hoti
Shao'or paak ho tab midhat e naqi hogi

5. Zahoor Mehdi(AS) ka Zeeshan jab kabhi hoga
Usi ki zaat me sab seerate Naqi hogi

✍ Zeeshan Azmi

*شعور پاک ہو تب مدحتِ نقی ہوگی*

1. نظر میں جس کے ذرا عظمتِ نقی ہوگی
اطاعت علی اور طاعت نقی ہوگی

2. رجب کے ماہ میں ہوگا قمر کو رشک بہت
زمیں کی گود میں جب صورتِ نقی ہوگی

3. کھلیگا جہرہ جو ابن تقی  کی آمد پر
اسی کی واسطے بس قربتِ نقی ہوگی

4. خیالِ خام سے کوئی ثنا نہیں ہوتی
شعور پاک ہو تب مدحتِ نقی ہوگی

5.ظہور مہدی کا ذیشان جب کبھی ہوگا
اسی کی ذات میں سب سیرتِ نقی ہوگی

✍ ذیشان آعظمی