Friday, June 30, 2017

अजादारों उठो तुम हौसला लेकर बहत्तर से

अजादारों उठो तुम हौसला लेकर बहत्तर से

सदा रोने की उठती है हर मज़लूम के घर से
खुदाया रख हमें महफूज तू शैतानो के शर से

खिलाफे ज़ुल्म जो कहते नहीं कुछ भी किसी डर से
मोहब्बत हो नहीं सकती कभी उनको पय्मबर से

बिछादो ढेर लाशों के जहां तक हो सके लेकिन
तज़क्कुर कर्बला का रुक नहीं सकता है मेंबर से

कहां तक जुल्म के साए में हम चुपचाप बैठेंगे
अजादारों उठो तुम हौसला लेकर बहत्तर से

समझ सकते हो तो समझो तरसटी अंजुमन वाले
मसाजिद और अज़ाखाने चला करते है रहबर से

हमारी क़ौम पर यूं ही नहीं का़बिज़ हुए ज़ालिम
किसी हद तक मुसलमां की खता भी है बराबर से

कोई इंसान नजर आता नहीं शहरे ख़मोशा मे
मुसलमॉ क़त्ल होते हैं यंहा जीशान खंजर से

✍ ज़ीशान आज़मी

صدائیں رونے کی  اٹھتی ہیں ہر مظلوم کے گھر سے
خدایا رکھ ہمیں محفوظ تو شیطان کے شر سے
 
خلافِ ظلم جو کہتے نہیں کچھ بھی کسی ڈر سے
محبت ہو نہیں سکتی کبھی ان کو پیمبر سے

بچھا دو ڈھیر لاشوں کے جہاں تک ہو سکے لیکن
تذکر کربلا کا رک نہیں سکتا ہے منبر سے
 
کہاں تک ظلم کے سائے میں ہم چپ چاپ بیٹھیں گے
عزادارو! اٹھو تم حوصلہ لے کر بہتر سے

سمجھ سکتے ہو تو سمجھو ٹرسٹی انجمن والو
مساجد اور عزاخانے چلا کرتے ہیں رہبر سے

ہماری قوم پر یوں ہی نہیں قابض ہوئے ظالم
کسی حد تک مسلماں کی خطا بھی ہے برابر سے

کوئی انساں نظر آتا نہیں شہر خموشاں میں
مسلماں قتل ہوتے ہیں یہاں ذیشان خنجر سے

✍ ذیشان آعظمی

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