Monday, July 31, 2017

Zaleel aadmi ki hasiyat nahi hoti


कमीन लोगों की गर सल्तनत नहीं होती
ज़माने भर में कहीं मासीयत नहीं होती

नमाज़े इश्क से हासिल तू कर इसे ग़ाफिल
खुदा की यूं ही कभी मारेफत नहीं होती

किताबे हक़ को पड़ेगा तो लिख सकेगा तो
ख़याले शर से कभी मनक़बत नहीं होती

खुदा से गुफ्तगू होती है एक बंदे की
नमाज़ ऐसे ही मसरूफियत नहीं होती

खुदा से मांग तु इज़्ज़त उठाकर हाथों को
ज़लील आदमी की हैसियत नहीं होती

किसी को मौत किसी को हयात देती है
हवा के पास कोई मसलेहत नहीं होती

लिबासे ज़िस्त ज़रा और कर रफू भाई
गरीब लोगों की यां अहमियत नहीं होती

हलाल रोजी़ ही ज़िशान फायदा देगी
हराम माल में बेशक बचत नहीं होती

✍ ज़ीशान आज़मी

کمین لوگوں کی گر سلطنت نہیں ہوتی
زمانے بھر میں کہیں معصیت نہیں ہوتی

نمازِ عشق سے حاصل تو کر اسے غافل
خدا کی یوں ہی کبھی معرفت نہیں ہوتی

کتابِ حق کو پڑھےگا تو لکھ سکےگا تو
خیالِ شر سے کبھی منقبت نہیں ہوتی

خدا سے گفتگو ہوتی ہے ایک بندہ کی
نماز ایسے ہی مصروفیت نہیں ہوتی

خدا سے مانگ تو عزّت اٹھا کے ہاتھوں کو
ذلیل آدمی کی حیثیت نہیں ہوتی

کسی کو موت کسی کو حیات دیتی ہے
ہوا کے پاس کوئی مصلحت نہیں ہوتی

لباسِ زیست ذرا اور کر رفو بھائی
غریب لوگوں کی یاں اھمیت نہیں ہوتی

حلال روزی ہی ذیشان فائدہ دےگی
حرام مال میں بےشک بچت نہیں ہوتی

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, July 27, 2017

तू मुलव्वस शिर्क से हरदम अगर है जिंदगी

SHIRK BADA GUNAH HAI

خوشبوئے جنت یقیناً حشر میں ہوگی حرام
تو ملوث شرک سے ہر دم اگر ہے زندگی

खुशबू है जन्नत यकीनन हश्र में होगी हराम
तू मुलव्वस शिर्क से हरदम अगर है जिंदगी

✍ Zeeshan Azmi

Monday, July 24, 2017

Na kiyo ho hasr tak ab tazkera masoom zahra ka

खुदा जाने मुकद्दस मर्तबा मासूम ज़हरा का
ईमामो ने लिया है मशवरा मासूम ज़हरा का

सबक़ देगा यज़ीदों को मुजाहिद दीने खुदा का
चुना है उसने दिल से रास्ता मासूम ज़हरा का

खुदा जा़लिम हुकूमत को मिटा देगा ज़माने से
खुदा को दीजिए सब वास्ता मासूम ज़हरा का

मज़ारे फातिमा पर ज़ुल्म ढाया है सऊदी ने
ना क्यों हो हश्र तक अक तज़करा मासूम ज़हरा का

क़यामत तक भुला सकते नहीं मोमिन दरे ज़हरा
है याद अब तक वह दिल में हादसा मासूम ज़हरा का

परेशां इसलिए जी़शान हुए जाते हैं जालिम
सऊदी पर है छाया दबदबा मासूम ज़हरा का

✍ ज़ीशान आज़मी

خدا جانے مقدّس مرتبہ معصوم زہرا کا
اماموں نے لیا ہے مشورہ معصوم زہرا کا

سبق دے گا یزیدوں کو مجاہد دینِ خدا کا
چنا ہے اس نے دل سے راستہ معصوم زہرا کا

خدا ظالم حکومت کو مٹا دےگا زمانے سے
خدا کو دیجیئے سب واسطہ معصوم زہرا کا

مزارِ فاطمہ پر ظلم ڈھایا ہے سعودی نے
نہ کیوں ہو حشر تک اب تزکرہ معصوم زہرا کا

قیامت تک بھلا سکتے نہیں مومن درِ زہرا
ہے یاد اب تک وہ دل میں حادثہ معصوم زہرا کا

پریشاں اس لئے ذیشان ہوئے جاتے ہے ظالم
سعودی پر ہے چھایا دبدبہ معصوم زہرا کا

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, July 22, 2017

Rubaro unse huwi baat to barsa sawaan

Mouj-e-Ghazal adabi forum ke 66th Online Aalami tarhi mushayera ba unwane "sawaan" ba tareekh 22nd July 2017 par meri tab-e-aazmaee:

موج غزل ادبی فورم کے ٤٤ ویں آن لاین عالمی طرحی مشاعرے بعنوان ساون بتاریخ ۲۲ جولائی ۲۰۱۷ کے لئے میری طبع آزمائی

روبرو ان سے ہوئی بات تو برسا ساون
کتنا اچھا تھا ملاقات کا پہلا ساو

रूबरू उनसे हुई बात तो बरसा सावन
कितना अच्छा था मुलाकात का पहला सावन

Rubaro unse huwi baat to barsa sawaan
Kitna achcha tha mulaqaat ka pahla sawaan


گل کھلیں باغ میں یا چلتی رہے ٹھنڈی ہوا
دل جلوں کو نہیں اب  لگتا ہے پیارا ساون

ग़ुल खिले बाग़ मे या चलती रहे ठंडी हवा
दिल जलों को नहीं अब लगता है प्यारा सावन

Gul khiley bagh me ya chalte rahe thandi hawa
Dil jalo'n ko nahi ab lagta hai pyara sawaan


آسماں رونے کو تیار ہے سن کے نغمہ
درد کے گیت سنانے لگا اجڑا ساون

आसमां रोने को तैयार है सुन के नग़मा
दर्द के गीत सुनाने लगा उजड़ा सावन

Aasmaa'n rone ko tayyar hai sun ke nagma
Dard ke geet sunane laga ujda sawaan


ان کو جب جب بھی کبھی ہم نے بھلانا چاہا
یاد پھر ان کی لئے سامنے آیا ساون

उनको जब जब भी कभी हमने भुलाना चाहा
याद फिर उनकी लिए सामने आया सावन

Unko jab jab bhi kabhi humne bhulana chaha
Yaad phir unki liye samane aayaa sawaan


جب بھی تنہائی میں بیٹھے ہوئے دیکھا مجھ کو
میری غربت پہ بہت زور سے رویا ساون

जब भी तनहाई में बैठे हुए देखा मुझको
मेरी ग़रबत पे बहुत ज़ोर से रोया सावन

Jab bhi tanhaai me baithe huwe dekha mujh ko
Meri ghurbat pe bahut zor se roya sawaan


جب سے ذیشان وہ بچھڑے تو قیامت گزری
پہلے لگتا تھا جواں اب لگے بوڑھا ساون

जब से ज़िशान वह बिछड़े तो क़यामत गुज़री
पहले लगता था जवां अब लगे बूढ़ा सावन

Jab se Zeeshan woh bichde to qayamat guzri
Pahle lagta tha jawa'n ab lage budha sawaan

✍Zeeshan Azmi

Wednesday, July 19, 2017

ईमान का मरकज़ है ईमाने अबूतालिब

*ایمان کا مرکز ہے ایمانِ ابوطالب*

रोशन है ज़माने पर ईमाने अबूतालिब
अल्लाह ही जाने क्या है शाने अबूतालिब

रहने से रिसालत और रहने से इमामत के
पुर नूर जहां मे है अएवाने अबूतालिब

समझोगे ना हरगिज़ तुम कुरआन को रटने से
मोमिन को जो मिलता है इ़रफाने अबूतालिब

जब अ़ग़द मोहम्मद(स) का तय पाया ख़दीजा से
उस वक्त हुआ पूरा अरमान अबूतालिब

दुनिया ने अभी तक वह मीज़ान नहीं देखी
तुल जाये जहां यूंही एहसान अबूतालिब

यह बात वज़ाहत से मेहदी ही बताएंगे
ईमान का मरकज़ है ईमाने अबूतालिब

ज़ीशान को यह मतलब समझाओ ना ऐ मुफ्ती
बेहतर वह समझता है फैज़ाने अबूतालिब

✍ ज़ीशान आज़मी

*ایمان کا مرکز ہے ایمانِ ابوطالب*

1. روشن ہے زمانے پر ایمان ابو طالب
اللہ ہی جانے کیا ہے شان ابو طالب

2. رہنے سے رسالت اور رہنے سے امامت کے
پُر نور جہاں میں ہے ایوان ابو طالب

3. سمجھوگے نہ ہرگز تم قرآن کو رٹنے سے
مومن کو جو ملتا ہے عرفان ابو طالب

4. جب عقد محمد(ص) کا طے پایا خدیجہ سے
اس وقت ہوا پورا ارمان ابو طالب

5. دنیا نے ابھی تک وہ میزان نہیں دیکھی
تل جائے جہاں یونہی احسان ابو طالب

6. یہ بات وضاحت سے مہدی ہی بتائیں گے
ایمان کا مرکز ہے ایمانِ ابوطالب

7. ذیشان کو یہ مطلب سمجھاؤ نہ اے مفتی
بہتر وہ سمجھتا ہے فیضانِ ابو طالب

✍ ذیشان آعظمی

Youtube Channel Zeeshan Azmi

Sunday, July 16, 2017

Hum din ke payaami hain magar kushtay e shab hai

Online Alami Mushaira no. 65 by Mauje Ghazal
Hum din ke payaami hain magar kushtay e shab hai



इस महफिले हसती मे सभी अपनी तलब हैं
हम दिन के पयामी हैं मगर कश्त ए शब हैं

संजीदा भी हो जा तू कभी, वास्ता रब का
हर वक्त शोखी के यह अंदाज कढ़प हैं

दुनिया को मेरे इश्क़ का क्या हाल सुनाया
अफसोस के तैयार सज़ा देने को सब हैं

वह कौन सा इंसाँ है जो बर्दाश्त करेगा
नखरे जो हसीनों के हैं, वल्लाह गज़ब हैं

छाये हैं मुसलमानों पे क्यों ज़ुल्म के बादल
इन्सान के तक़दीस के दाई़ कहां अब हैं

अब क्या मैं बताऊँ के मैं क्यों लिखता हूं यारो!
ज़ीशान के लिखने के बहुत सारे सबब हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

اس محفلِ ہستی میں سبھی اپنی طلب ہیں
ہم دن کے پیامی ہیں مگر کشتہء شب ہیں

سنجیدہ بھی ہو جا تو کبھی، واسطہ رب کا
ہر وقت شوخی کے یہ انداز کڑھب ہیں

دنیا کو میرے عشق کا کیا حال سنایا
افسوس کہ تیّار سزا دینے کو سب ہیں

وہ کون سا انساں ہے جو برداشت کریگا
نخرے جو حسینوں کے ہیں، واللہ غضب ہیں

چھائے ہیں مسلمانوں پہ کیوں ظلم کے بادل
انسان کے تقدیس کے داعی کہاں اب ہیں

اب کیا میں بتاؤں کہ میں کیوں لکھتا ہوں یارو!
ذیشان کے لکھنے کے بہت سارے سبب ہیں

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, July 15, 2017

Koi mahshar me tere aamaal ka zamin nahi

Koi mahshar me tere aamaal ka zamin nahi

आखे़रत में काम आए ऐसे इंसो जिन नहीं
कोई महशर में तेरे आमाल का ज़मीन नही

क्यों बहाना वक्त का हर दम किया करते हैं लोग
ना मिले नेकी का मौका ऐसा कोई दिन नहीं

क्यों नहीं करती यह दुनिया पैरवी कुरान की
ज़ल्म कानून ए खुदा में हो कभी मुमकिन नहीं

यह ज़माने का अजब मनज़र है कैसे हो बयां
सब सेयाने लग रहे हैं कोई भी कमसिन नहीं

गर तेरे आमाल हैं अल्लाह ही के वास्ते
नेकीयां फिर करता जा जीशान उन को गिन नहीं

✍ ज़ीशान आज़मी

آخرت میں کام آئیں ایسے انس و جن نہیں
کوئی محشر میں ترے اعمال کا ضامن نہیں

کیوں بہانہ وقت کا ہردم کِیا کرتے ہیں لوگ
نا ملے نیکی کا موقع ایسا کوئی دن نہیں

کیوں نہیں کرتی یہ دنیا پیروی قرآن کی
ظلم قانونِ خدا میں ہو کبھی ممکن نہیں

یہ زمانے کا عجب منظر ہے کیسے ہو بیاں
سب سیانے لگ رہے ہیں، کوئی بھی کمسن نہیں

گر ترے اعمال ہیں اللہ ہی کے واسطے
نیکیاں پھر کرتا جا ذیشان ان کو گن نہیں

✍ ذیشان آعظمی

Friday, July 14, 2017

Dil-e-nadaa ko uski yaad aati hai

नई मौसम की करवट यों सताती है
दिल-ए-नादान को उसकी याद आती है

हर एक मौसम मे तेरी यादों की ताबिस
मेरे दिल को न जाने क्यों जलाती है

बहारे मौसमे बारिश की यादें भी
तेरी भूली हुई यादें जगाती है

तेरी यादों ने वो जादू चलाया है
खुली पलकों पे मेरी नींद सोती है

ना तुमने कदर कि मेरी मोहब्बत की
तेरी ना कदरी भी बेहद रुलाती है

बहेंगे सोच के ज़ीशान के आंसू
वह क्या मेरे लिए आंसू बहाती है

✍ ज़ीशान आज़मी

نئے موسم کی کروٹ یوں ستاتی ہے
دلے ناداں کو اس کی یاد آتی ہے

ہر اک موسم میں تری یادوں کی تابش
مرے دل کو نہ جانے کیوں جلاتی ہے

بہارِ موسمِ بارشِ کی یادیں بھی
تری بھولی ہوئی یادیں جگاتی ہے

تری یادوں نے وہ جادو چلایا ہے
کھلی پلکوں پہ میری نیند سوتی ہے

نہ تم نے قدر کی میری محبت کی
تری نا قدری بھی بے حد رلاتی ہے

بہے نگے سوچ کے ذیشان کے آنسو
وہ کیا میرے لئے آنسو بہاتی ہے

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, July 12, 2017

अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढ लेता है

अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढ लेता है

जहां में आदमी मंजिल का रास्ता ढूंढ़ लेता है
अगर तहक़ीक़ करता है क़रीना ढूंढ लेता है

कोई मुश्किल नहीं है कर्बला के दश्त में उसको
वह हुर है मुश्किलों में भी ठिकाना ढूंढ लेता है

अली का चाहने वाला कभी जाहिल नहीं होता
खुदा की मारेफत का वह खज़ाना ढूंढ लेता है

परेशान क्यों है ग़फिल इल्म हासिल कर जवानी में
खुदा का रिज़्क लिख्खा है वह बंदा ढूंढ लेता है

कोई भी दौर हो या फिर इलाक़ा हो मुनाफिक़ का
अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढ लेता है

ज़माने की हजा़रों मुश्किलें उस पर पड़ी लेकिन
खुदा को पाने का ज़िशान लम्हा ढूंढ लेता है

✍ ज़ीशान आज़मी

Tuesday, July 11, 2017

Adaa-e-dilbari teri zamana dhondta hai

Adaa-e-dilbari teri zamana dhondta hai

सुकून पाने अली वाला मदीना ढूंढता है
जमीने कर्बला जाने का लम्हा ढूंढता है

गलतफहमी बशर की दूर करने के लिए ही
अली की ज़ात को आयत का नुकता ढूंढता है

कफ़न बांधे हुए हर जुल्म से लड़ने की खातिर
तबस्सुम को अली असगर के बच्चा ढूंढता है

खुदाया भेज परदे से मसीहा वह कहां है
लिए आहो बुका जख्मों की मक्का ढूंढता है

तमाशा देख कर जालिम हुकूमत की जफ़ा का
हुसैन इब्ने अली को हर घराना ढूंढता है

हयाते जावेदानी नसले इन्सानी बसाने
अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढता है

बता ज़ीशान कैसे फतहा करता है दिलों को
आदाए दिलबरी तेरी ज़माना ढूंढता है

✍ ज़ीशान आज़मी

*علی کا عشق پاکیزہ قبیلہ ڈھونڈتا ہے*

سکوں پانے علی والا مدینہ ڈھونڈتا ہے
زمینِ کربلا جانے کا لمحہ ڈھونڈتا ہے

غلط فہمی بشر کی دور کرنے کے لئے ہی
علی کی ذات کو آیت کا نقطہ ڈھونڈتا ہے

کفن باندھے ہوئے ہر ظلم سے لڑنے کی خاطر
تبسّم کو علی اصغر کے بچہ ڈھونڈتا ہے

خدایا بھیج پردے سے مسیحا وہ کہاں ہے
لئے آہ و بکا زخموں کی مکّہ ڈھونڈتا ہے

تماشہ دیکھ کر ظالم حکومت کی جفا کا
حسین بن علی کو ہر گھرانہ ڈھونڈتا ہے

حیات جاویدانی نسل انسانی بسانے
علی کا عشق پاکیزہ قبیلہ ڈھونڈتا ہے

بتا ذیشان کیسے فتح کرتا ہے دلوں کو
ادائے دلبری تیری زمانہ ڈھونڈتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, July 3, 2017

Hamara kya bigaadegi GST note bandi

Hamara kya bigaadegi GST note bandi

مراٹھی ہو کہ مسلم ہو کہ عیسائی کہ سندھی
ہراک مذہب کو پیاری ہے ہماری بھاشا ہندی

سیاست داں اگر تھوڑا خدا کا خوف کر لیں
نہیں ہوگا کرپشن ہند میں نا ہوگی مندی

دغابازوں کی نیندوں کو اڑادےگی
یہ بے شک
ہمارا کیا بگاڑیں گی GST نوٹ بندی

اسی کے گرد تدبیریں کیا کرتی ہیں گردش
کوئی کیا سمجھے گا ذیشان تیری فتح مندی

✍ ذیشان آعظمی

Marathi ho ke Muslim ho ke isaayee ke sindhi
Har ek mazhab ko pyari hai hamari bhasha hindi

Siyasat daa'n agar thoda khuda ka khauf kar lein
Nahi hoga corruption hind me na hogi mandi

Daghabazo ki neendo ko uda degi yeh beshak
Hamara kya bigaadegi GST note bandi

Isi ke gird tadbeerein kiya karti hai gardish
Koi kya samjhega Zeeshan teri fatha mandi

✍ Zeeshan Azmi

Saturday, July 1, 2017

Kabza kiye hue hai aaj sitamgar baqee me

Girya kuna hai rohe payambar baqee me

قبضہ کئے ہیں آج ستمگر بقیع میں
امّت کی بے بسی ہے اجاگر بقیع میں

سوتے ہوئے ضمیر جگا عاشقِ نبی
گریہ کناں یے روح پیمبر بقیع میں

✍ ذیشان آعظمی

कब्जा किए हैं आज सितमगर बक़ीअ़ में
उम्मत की बेबसी है उजागर बक़ीअ़ में

सोते हुए ज़मीर जगा आशिके नबी
गिरया कुना है रूहे पयंबर बक़ीअ़ में

✍ ज़ीशान आज़मी

Kabza kiye hai aaj sitamgar baqee me
ummat ki bebasi hai ujaagar baqee me

Sote hue zameer jagha aashiqe nabi
Girya kuna hai rohe payambar baqee me

✍ Zeeshan Azmi
Saturday 1st July 2017