Wednesday, July 12, 2017

अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढ लेता है

अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढ लेता है

जहां में आदमी मंजिल का रास्ता ढूंढ़ लेता है
अगर तहक़ीक़ करता है क़रीना ढूंढ लेता है

कोई मुश्किल नहीं है कर्बला के दश्त में उसको
वह हुर है मुश्किलों में भी ठिकाना ढूंढ लेता है

अली का चाहने वाला कभी जाहिल नहीं होता
खुदा की मारेफत का वह खज़ाना ढूंढ लेता है

परेशान क्यों है ग़फिल इल्म हासिल कर जवानी में
खुदा का रिज़्क लिख्खा है वह बंदा ढूंढ लेता है

कोई भी दौर हो या फिर इलाक़ा हो मुनाफिक़ का
अली का इश्क पाकीज़ा क़बीला ढूंढ लेता है

ज़माने की हजा़रों मुश्किलें उस पर पड़ी लेकिन
खुदा को पाने का ज़िशान लम्हा ढूंढ लेता है

✍ ज़ीशान आज़मी

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