Sunday, July 16, 2017

Hum din ke payaami hain magar kushtay e shab hai

Online Alami Mushaira no. 65 by Mauje Ghazal
Hum din ke payaami hain magar kushtay e shab hai



इस महफिले हसती मे सभी अपनी तलब हैं
हम दिन के पयामी हैं मगर कश्त ए शब हैं

संजीदा भी हो जा तू कभी, वास्ता रब का
हर वक्त शोखी के यह अंदाज कढ़प हैं

दुनिया को मेरे इश्क़ का क्या हाल सुनाया
अफसोस के तैयार सज़ा देने को सब हैं

वह कौन सा इंसाँ है जो बर्दाश्त करेगा
नखरे जो हसीनों के हैं, वल्लाह गज़ब हैं

छाये हैं मुसलमानों पे क्यों ज़ुल्म के बादल
इन्सान के तक़दीस के दाई़ कहां अब हैं

अब क्या मैं बताऊँ के मैं क्यों लिखता हूं यारो!
ज़ीशान के लिखने के बहुत सारे सबब हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

اس محفلِ ہستی میں سبھی اپنی طلب ہیں
ہم دن کے پیامی ہیں مگر کشتہء شب ہیں

سنجیدہ بھی ہو جا تو کبھی، واسطہ رب کا
ہر وقت شوخی کے یہ انداز کڑھب ہیں

دنیا کو میرے عشق کا کیا حال سنایا
افسوس کہ تیّار سزا دینے کو سب ہیں

وہ کون سا انساں ہے جو برداشت کریگا
نخرے جو حسینوں کے ہیں، واللہ غضب ہیں

چھائے ہیں مسلمانوں پہ کیوں ظلم کے بادل
انسان کے تقدیس کے داعی کہاں اب ہیں

اب کیا میں بتاؤں کہ میں کیوں لکھتا ہوں یارو!
ذیشان کے لکھنے کے بہت سارے سبب ہیں

✍ ذیشان آعظمی