Wednesday, August 30, 2017

दुश्मन ने बांधा कसकर मुस्लिम को रस्सियों में

दुश्मन ने बांधा कसकर मुस्लिम को रस्सियों में
क्या रत्ती भर नहीं थी ग़ैरत नमाजियों में।

बेखौफ दीं की खातिर, दुश्मन का ज़ख्म खाकर
मुस्लिम तड़प रहे हैं कूफे की वादियों में।

सज्जाद कब गए थे बतलाए कोई हमको
मजलिस जहां न पहले होती हो शादियों में।

मेहमां नवाज़ी आखिर, कूफे में कौन करता
ना एक मेजबां था मुस्लिम के साथियों में।

क्या लोग साथ देते मज़लूमे कर्बला का
ईमान कूफियों का बिकता है रद्दियौं में।

क्या पूछते हो हम से मज़लूम की मुसीबत
मुस्लिम की देखो ग़ुरबत सरवर के आंसुओं में।

मुस्लिम का साथ छोड़े, गद्दार कूफे वाले
क्यों कर शहीद ना हो? मजलूम बाग़ियौं में।

बस एक शै हुसैनी, होती है आदमी मे
ज़ीशान तू बिछा दे फरशे अज़ा दिलों में।

✍ ज़ीशान आज़मी

دشمن نے باندھا کس کر مسلم کو رسِّیوں میں
کیا رتّی بھر نہیں ہے غیرت نمازیوں میں

بے خوف دیں کی خاطر، دشمن کا زخم کھا کر
مسلم تڑپ رہے ہیں کوفے کی وادیوں میں

سجّاد کب گئے ہیں بتلائے کوئی ہم کو
مجلس جہاں نہ پہلے ہوتی ہو شادیوں میں

مہماں نوازی آخر، کوفے میں کون کرتا
نا ایک میزباں تھا مسلم کے ساتھیوں میں

کیا لوگ ساتھ دیتے مظلومِ کربلا کا
ایمان کوفیوں کا بکتا یے ردّیوں میں

کیا پوچھتے ہو ہم سے مظلوم کی مصیبت
مسلم کی دیکھو غربت سرور کے آنسوؤں میں

مسلم کا ساتھ چھوڑے، غدّار کوفے والے
کیوں کر شہید نا ہو مظلوم باغیوں میں

بس ایک شے حسینی ہوتی ہے آدمی میں
ذیشان تو بچھا دے فرشِ عزا دلوں میں

✍ ذیشان آعظمی

चुप हैं मेरे सवाल के बाइस

जी ले कारे हलाल के बाइस
जिंदगी है कमाल के बाइस

हर कुंवारा समझ ले इसको अभी
शानो-शौकत है ऑल के बाइस

नाज़ तक़रीर पर जिनहें था बहुत
चुप हैं मेरे सवाल के बाइस

जिंदगी को समझना है मुश्किल
तीखे हुस्नो जमाल के बाइस

मुश्किलें क्या है? इल्म कर हासिल
सब हैं आसां मिसाल के बाइस

खौफ जिनको नहीं खुदा का कुछ
लड़ रहे हैं वह माल के बाइस

जु़ल्म ज़ीशान जितने होते हैं
सब हैं वह बद ख़याल के बाइस

✍ ज़ीशान आज़मी

جی لے کارِ حلال کے باعث
زندگی ہے کمال کے باعث

ہر کنوارا سمجھ لے اس کو ابھی
شان و شوکت ہے آل کے باعث

ناز تقریر پر جنہیں تھا بہت
چپ ہیں میرے سوال کے باعث

زندگی کو سمجھنا ہے مشکل
تیکھے حسن و جمال کے باعث

مشکلیں کیا ہے؟ علم کر حاصل
سب ہے آساں مثال کے باعث

خوف جن کو نہیں خدا کا کچھ
لڑ رہے ہیں وہ مال کے باعث

ظلم ذیشان جتنے ہوتے ہیں
سب ہیں وہ بد خیال کے باعث

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, August 27, 2017

क्यों आज तक मै दूर रहा अपने आप से

करता हूं रात दिन मैं दुआ अपने आप से
हरगिज़ न होने पाऊं जुदा अपने आप से।

एहसास उसके झूठ का जब सर पे चढ़ गया
ना जाने क्या मैं कहता रहा अपने आप से।

जब देखी बेवफाई की तस्वीर सामने
पहचाना खुद को, प्यार हुआ अपने आप से।

दिल तोड़कर मेरा वह कहां पायेंगी सुकूं
होंगी जरूर वह भी खफा अपने आप से।

जाते हैं छोड़कर हमें तो जाने दीजिए
हमने भी उनको दूर रखा अपने आप से।

आंखें खुली तो जान गया राज़े जिंदगी
क्यों आज तक मै दूर रहा अपने आप से

ज़ीशान इश्क़ करना कोई खेल तो नहीं
मिलती है आशिकों को सजा अपने आप से।

✍ ज़ीशान आज़मी

کرتا ہوں رات دن میں دعا اپنے آپ سے
ہرگز نہ ہونے پاؤں جدا اپنے آپ سے

احساس اسکے جھوٹ کا جب سر پہ چڑھ گیا
نا جانے کیا میں کہتا رہا اپنے آپ سے

جب دیکھی بے وفائی کی تصویر سامنے
پہچانا خود کو، پیار ہوا اپنے آپ سے

دل توڑ کر مرا وہ کہاں پائیں گے سکوں
ہوں گے ضرور وہ بھی خفا اپنے آپ سے

جاتے ہیں چھوڑ کر ہمیں تو جانے دیجئے
ہم نے بھی ان کو دور رکھا اپنے آپ سے

آنکھیں کھولیں تو جان گیا رازِ زندگی
کیوں آج تک میں دور رہا اپنے آپ سے

ذیشان عشق کرنا کوئی کھیل تو نہیں
ملتی ہے عاشقوں کو سزا اپنے آپ سے

✍ ذیشان آعظمی

थम गया दर्द उजाला हुआ तन्हाई में

वह सज़ा हम को मिली इश्क़ की रुसवाई में
थम गया दर्द उजाला हुआ तन्हाई में

आसमां झुकता है तेरी ही ज़ियारत के लिए
हमने देखी वह कशिश आप की अंगड़ाई में

अब तो वाकि़फ हैं मेरे हाल से दुनिया वाले
राज़े दिल आम हुआ इश्क़ की सच्चाई में

खूब वाक़िफ हूं हसीनों की अदाओं से मगर
फंसता जाता हूँ हसीनाओं की ज़ेबाई में

शिर्क से बचते हुए करता हूं तारीफ तेरी
इतनी तौफीक़ कहां कोई भी शैदाई में

कोशिशे लाख करो उस पे मगर याद रहे
धोखा ज़ीशान नहीं खाता पज़ीराई में

✍ ज़ीशान आज़मी

وہ جزا ہم کو ملی عشق کی رسوائی میں
تھم گیا درد اجالا ہوا تنہائی میں

آسماں جھکتا یے تیری ہی زیارت کے لئے
ہم نے دیکھی وہ کششِ آپ کی انگڑائی میں

اب تو واقف ہے مرے حال سے دنیا والے
رازِ دل عام ہوا عشق کی سچائی میں

خوب واقف ہوں حسینوں کی اداؤں سے مگر
پھنستا جاتا ہوں حسیناو کی زیبائی میں

شرک سے بچتے ہوئے کرتا ہوں تعریف تیری
اتنی توفیق کہاں کوئی بھی شیدائی میں

کوششیں لاکھ کرو اس پہ مگر یاد رہے
دھوکا ذیشان نہیں کھاتا پزیرائی میں

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, August 20, 2017

अपनी यादों का सरोसामां जलाते जाइए।

जाने से पहले ज़रा हम को हंसाते जाइए
बात कोई मीठी सी हम को सुनाते जाइए।

चेहरा है ग़मगीन मेरा, मैं हूं मुरझाया हुआ
आपको ग़म किस बात का? चेहरा खिलाते जाईए।

मैं नहीं हूं ग़ैर कोई, यह घड़ी फुरक़त की है
मेरे हाथों से भी हाथ अपना मिलाते जाइए।

कुछ क़रार आया था दिल को आप के आने के क़ब्ल
दर्द दिल का आप मेरा और बढ़ाते जाईए।

आप की सौगात है कुछ, मैं जला सकता नहीं
अपनी यादों का सरोसामां जलाते जाइए।

बेरुखी ज़ीशान से अच्छी नहीं है दिलरुबा
दिल संभाले बैठा है उस को मनाते जाइए।

✍ ज़ीशान आज़मी

جانے سے پہلے ذرا ہم کو ہنساتے جائیے
بات کوئی میٹھی سی ہم کو ستاتے جائیے

چہرا ہے غمگین میرا، میں ہوں مرجھایا ہوا
آپ کو غم کس بات کا؟ چہرا کھلاتے جائیے

میں نہیں ہوں غیر کوئی، یہ گھڑی فرقت کی ہے
میرے ہاتھوں سے بھی ہاتھ اپنا ملاتے جائیے

کچھ قرار آیا تھا دل کو آپ کے آنے کے قبل
درد دل کا آپ میرا اور بڑھاتے جائیے

آپ کی سوغات ہے کچھ، ہم جلا سکتے نہیں
اپنی یادوں کا سروساماں جلاتے جائیے

بے رخی ذیشان سے اچھی نہیں ہے دلربا
  دل سنبھالے بیٹھا ہے اس کو مناتے جائیے

✍ ذیشان آعظمی

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उठाओ जनाज़ा मोहम्मद तक़ी का

किताब इजतेहाद और तक़लीद की दी
हमें है यह तोहफा मोहम्मद तक़ी का

जवानी में ज़ीशान पाई शहादत
उठाओ जनाज़ा मोहम्मद तक़ी का

✍ ज़ीशान आज़मी

کتاب اجتہاد اور تقلید کی دی
ہمیں ہے یہ تحفہ محمد تقی کا

جوانی میں ذیشان پائی شہادت
اٹھاؤ جنازہ محمد تقی کا

✍ ذیشان آعظمی

वस्ल से इन्तज़ार अच्छा था

क्या मेरा प्यार एक तरफा था
या न इक़दाम मेरा पहला था।

उस को मुझ से प्यार था बेशक
बस मेरा ही क़यास झूठा था।

याद है मुझ को दोस्त का मिलना
वह मेरी थी कभी मैं उस का था।

उस की क़िस्मत में प्यारा सा घर था
मेरी क़िस्मत मे दर्ज सहरा था।

वह मिले और हुये नाराज़ भी
वस्ल से इन्तज़ार अच्छा था

फिक्र उस के बिछड़ने की क्यों है
कल भी ज़ीशान तू अकेला था।

✍ ज़ीशान आज़मी

کیا میرا پیار ایک طرفہ تھا
یا نہ اقدام میرا پہلا تھا

اس کو مجھ سے پیار تھا بےشک
بس مرا ہی قیاس جھوٹا تھا

یاد ہے مجھ کو دوست کا ملنا
وہ میری تھی کبھی میں اسکا تھا

اس کی قسمت میں پیارا سا گھر تھا
میری قسمت میں درج صحرا تھا

وہ ملے اور ہوئے ناراض بھی
وصل سے انتظار اچھا تھا

فکر اس کے بچھڑنے کی کیوں ہے
کل بھی ذیشان تو اکیلا تھا

✍ ذیشان آعظمی

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Saturday, August 19, 2017

दिल उस का नहीं होगा पत्थर यकी़नन

موجِ غزل عالمی آن لائن ٧٠ ویں طرحی مشاعرہ:

ردیف یقیناً اور قوافی اور بحر حسب ذوق

افاعیل: فعولن فعولن فعولن فعولن

بڑی بےقراری میں دلبر یقیناً
مجھے ڈھونڈتی ہوگی دردر یقیناً

وہ آئیگی ہم سے ملاقات کرنے
دل اس کا نہیں ہوگا پھتّر یقیناً

لبوں پر مرے ذکر رہتا ہے اس کا
اثر ہے محبّت کا دل پر یقیناً

مجھے انتظار ان کا ہے مدّتوں سے
ہر اک پل مرا دل ہے مضطر یقیناً

بھلا کیسے سمجھے کوئی شعر میرا
ہے لبریز گاگر میں ساگر یقیناً

ضرور آئیگی ملنے ذیشان اک دن
وہ مہمان بن کے تیرے گھر یقیناً

✍ ذیشان آعظمی

बड़ी बेक़रारी में दिलबर यकी़नन
मुझे ढूंढती होंगी दर-दर यकी़नन।

वह आयेगी हम से मुलाक़ात करने
दिल उस का नहीं होगा पत्थर यकी़नन

लबों पर मेरे ज़क्र रहता है उसका
असर है मोहब्बत का दिल पर यकी़नन।

मुझे इंतज़ार उनका है मुद्दतों से
हर एक पल मेरा दिल है मुज़त़र  यकी़नन।

भला कैसे समझे, कोई शेर मेरा
है लबरेज़ गागर में सागर यकी़नन।

जरुर आयेगी मिलने ज़ीशान एक दिन
वह मेहमान बन के तेरे घर यकी़नन।

✍ ज़ीशान आज़मी

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Thursday, August 17, 2017

शायद हमें मिल जाए खुदा रात गए तक

Mauj e Ghazal online Mushaira
मौजे ग़जल ऑनलाइन मुशायरा पर मेरी अदना काविश:

आपस में एक तूफान उठा रात गए तक
वह साथ हमारे थे खफा रात गए तक

कहते रहे हम प्यार मोहब्बत की कहानी
दिल उनका मगर जलता रहा रात गए तक

आंखों में नमी दर्दे जिगर सोने न देगा
यूं प्यार में मिलती है सज़ा रात गए तक

बर्बाद ना कर हुस्न पर तू अपनी जवानी
सोने नहीं दे उनकी अदा रात गए तक

कुरआं की तिलावत भी, नमाजे भी पड़ेंगे
शायद हमें मिल जाए खुदा रात गए तक

इंसानों की रूहे भी तडप जाए जो पढ़कर
ज़ीशान ने वह हाल लिखा रात गए तक

✍ ज़ीशान आज़मी

آپس میں اک طوفان اٹھا رات گئے تک
وہ ساتھ ہمارے تھے خفا رات گئے تک

کہتے رہے ہم پیار محبت کی کہانی
دل ان کا مگر جلتا رہا رات گئے تک

آنکھوں میں نمی، دردِ جگر سونے نہ دےگا
یوں پیار میں ملتی ہے سزا رات گئے تک

برباد نہ کر حسن پہ تو اپنی جوانی
سونے نہیں دے ان کی ادا رات گئے تک

قرآں کی تلاوت بھی، نمازیں بھی پڑھیں گے
شاید ہمیں مل جائے خدا رات گئے تک

انسانوں کی روحیں بھی تڑپ جائیں جو پڑھ کر
ذیشان نے وہ حال لکھا رات گئے تک

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, August 15, 2017

बड़ी कीमती है मोहब्बत वतन की

 I wish you all a happy 71st Independence Day (India).
Patriotic poem:

दिलो जाँ से प्यारी है इज़्ज़त वतन की
बड़ी कीमती है मोहब्बत वतन की

अगर वक्त़ आया तो जाँ अपनी देंगे
के लाजि़म है हम सब पे नुसरत वतन की

निगाहें झुकाने की आदत बनालो
यकी़नन बहन माँ हैं औरत वतन की

है अहले वतन से यह मेरी गुज़ारिश
करें वह न पामाल हुरमत वतन की

उठो! अपने बच्चों को स्कूल भेजो
के तालीम है सच्ची दौलत वतन की

हमारी भी क़िस्मत में होगी तरक़्क़ी
अगर दूर हो जाये ग़ुरबत वतन की

क़लम की ज़ुबां से ऐ ज़ीशान मैं ने
हमेशा ही की है हिफाज़त वतन की

✍ ज़ीशान आज़मी

دل و جاں سے پیاری ہے عزّت وطن کی
بڑی قیمتی ہے محبّت وطن کی

اگر وقت آیا تو جاں اپنی دیں گے
کہ لازم ہے ہم سب پہ نصرت وطن کی

نگاہیں جھکانے کی عادت بنالو
یقیناً بہن ماں ہے عورت وطن کی

ہے اہل وطن سے یہ میری گزارش
کریں وہ نہ پامال حرمت وطن کی

اٹھو! اپنے بچوں کو اسکول بھیجو
کہ تعلیم ہے سچّی دولت وطن کی

ہماری بھی قسمت میں ہوگی ترقی
اگر دور ہوجائے غربت وطن کی

قلم کی زباں سے اے ذیشان میں نے
ہمیشہ ہی کی ہے حفاظت وطن کی

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, 15th August 2017

Sunday, August 13, 2017

सुकून दो क़रार दो, मेरा वतन संवार दो।

Happy 71st independence day - 2017

ज़ीशान आज़मी की तरफ से सभी भारतीय, देश वासियों को
स्वतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
जय हिंद.

मौजे ग़ज़ल, आलमी तरही मुशायरा

मिला के हाथ प्यार दो, मेरा वतन संवार दो।
हर एक को एतबार दो, मेरा वतन संवार दो।

भुला के सारी रंजिशें, उठो ऐ देशवासियों!
चमन को फिर बाहर दो, मेरा वतन संवार दो।

ग़रीब की अमीर से यही तो बस है इल्तजा।
सुकून दो क़रार दो, मेरा वतन संवार दो।

मिटा के दुश्मनी सभी, अना को अपनी छोड़ दो।
लिबासे ज़िद उतार दो, मेरा वतन संवार दो।

ऐ नौजवानों! सर पे अब कफन को बांधकर उठो।
वतन पे जाँ निसार दो, मेरा वतन संवार दो।

उठाओ नेक काम पर क़दम ज़रा संभाल के।
ख़याले बद को मार दो, मेरा वतन संवार।

सलाम सरहदों के पासबां को है ज़ीशान का।
उसे वतन का प्यार दो, मेरा वतन संवार दो।

✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ غزل، عالمی طرحی مشاعرہ

ملا کے ہاتھ پیار دو، مرا وطن سنوار دو
ہر اک کو اعتبار دو، مرا وطن سنوار دو

بھلا کے ساری رنجِشیں، اُٹھو اے دیش واسیو!
چمن کو پھر بہار دو، مرا وطن سنوار دو

غریب کی امیر سے یہی تو بس ہے التجا
سکون دو قرار دو، مرا وطن سنوار دو

مٹا کے دشمنی سبھی انا کو اپنی چھوڑ دو
لباسِ ضد اتار دو، مرا وطن سنوار دو

اے نوجوانو! سر پہ اب کفن کو باندھ کر اٹھو!!
وطن پہ جاں نثار دو، مرا وطن سنوار دو

اٹھاؤ نیک کام پر قدم ذرا سنبھال کے
خیالِ بد کو مار دو، مرا وطن سنوار دو

سلام سرحدوں کے پاسباں کو ہے ذیشان کا
اُسے وطن کا پیار دو، مرا وطن سنوار دو

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, August 12, 2017

ज़ीशान किस लिए तू ऊंचाई चाहता है

टूटा हुआ दिल है गोयाई चाहता है
कहने को हाले दिल वह हरजाई चाहता है।

क्या दास्ताने इश्को उल्फत सुनाऊं तुमको
यह दिल समंदर की गहराई चाहता है।

लिख दूंगा मैं सवानेह उमरी उसकी लेकिन
मेरा यह नफ्स पूरी तन्हाई चाहता है।

मुझ पर सितम किया है कितना ही दिलरुबा ने
फिर भी दिल है उसकी अच्छाई चाहता है।

गिरते हुए बहुत से लोगों को देखा हमने
ज़ीशान किस लिए तू ऊंचाई चाहता है

✍ ज़ीशान आज़मी

ٹوٹا ہوا یہ دل ہے گویائی چاہتا ہے
کہنے کو حالِ دل وہ ہرجائی چاہتا ہے

کیا داستانِ عشق و الفت سناؤں تم کو
یہ دل سمندروں کی گہرائی چاہتا ہے

لکھ دونگا میں سوانح عمری اسی کی لیکن
میرا یہ نفس پوری تنہائی چاہتا ہے

مجھ پر ستم کیا ہے کتنا ہی دلربا نے
پھر بھی یہ دل ہے اس کی اچھائی چاہتا ہے

گرتے ہوئے بہت سے لوگوں کو دیکھاہم نے
ذیشان کس لئے تو اونچائی چاہتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, August 10, 2017

Mujhe wo yaad hai izhaar ki aahat

परेशां कर रही है यार की आहट
भुला सकता नहीं दिलदार की आहट

समाअत पर यह कैसा है नशा तारी
फक़त आए तेरे गुफ्तार की आहट

कोई महफ़िल में ना था दिल परेशां था
तभी खनकी तेरे आसार की आहट

मोहब्बत का असर है या जुदाई का
सुनी दिल ने मेरे सरकार की आहट

कहीं बेचैन मेरी दिलरुबा होगी
सुना है हमने दिल ए अफग़ार की आहट

भूला डाला है वादा आप ने फिर भी
मुझे वह याद है इज़हार की आहट

बिना उसके यहां ज़ीशान को लगती है
यह दुनिया में सभी बेकार की आहट

✍ ज़ीशान आज़मी

پریشاں کر رہی ہے یار کی آہٹ
بھولا سکتا نہیں دلدار کی آہٹ

سماعت پر یہ کیسا ہے نشا طاری
فقط آئے تیرے گفتار کی آہٹ

کوئی محفل میں نا تھا، دل پریشاں تھا
تبھی کھنکی ترے آثار کی آہٹ

محبّت کا اثر ہے یا جدائی کا
سُنی دل نے مرے سرکار کی آہٹ

کہیں بے چین میری دلربا ہوگی
سنا ہے ہم نے دلِ افگار کی آہٹ

بھلا ڈالا ہے وعدہ آپ نے پھر بھی
مجھے وہ یاد ہے اظہار کی آہٹ

بنا اس کے یہاں ذیشان کو لگتی ہے
یہ دنیا میں سبھی بیکار کی آہٹ

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, August 9, 2017

जहां चाहे तू जा मेरी बला से

तवक्को क्या मुझे उस बेवफा से
मेरा दिल जिस ने तोड़ा है दगा़ से

मैं हूं एक दिलजला यारों मुझे है
बड़े शिकवे शिकायत दिलरुबा से

ऐ परदेसी मुझे क्या लेना देना
जहां चाहे तू जा मेरी बला से

दग़ाबाजी कि तेरी  ऱोज़े महशर
शिकायत मैं करूंगा बस खुदा से

वफा की बात ना कर मुझसे हरदम
मैं आ़जिज़ हो गया तेरी वफा से

ज़मीनों आसमां देंगे गवाही
ख़फा ज़ीशान है सर्कश पिया से

✍ ज़ीशान आज़मी

توقع کیا مجھے اُس بے وفا سے
میرا دل جس نے توڑا ہے دغا سے

میں ہوں اک دل جلا یارو مجھے ہیں
بڑے شکوے شکایت دل ربا سے

اے پردیسی مجھے کیا لینا دینا
جہاں چاہے تو جا میری بلا سے

دغابازی کی تیری روزِ محشر
شکایت میں کرونگا بس خدا سے

وفا کی بات نہ کر مجھ سے ہر دم
میں عاجز ہو گیا تیری وفا سے

زمین و آسماں دینگے گواہی
خفا ذیشان ہے سرکش پیا سے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, August 7, 2017

इस्लाम को हुसैन  ने मरने नहीं दिया

बातिल का सर हुसैन ने उठने नहीं दिया
परचम खुदा के दिन का झुकने नहीं दिया

मज़लूमियत ने शाह की ल्लाह आज तक
ज़ालिम का हौसला कभी उठने नहीं दिया

दे कर लहू ईमाम ने बख़शी है ज़िंदगी
इस्लाम को हुसैन  ने मरने नहीं दिया

अ़रशे बरीं पे इस को रखा है हुसैन ने
इंसानियत को फर्श पे गिरने नहीं दिया

उलझा दिया है कौ़म को रसमो रवाज ने
कुरान कब पढ़ू इसे पढ़ने नहीं दिया

असग़र का मोजेज़ा है ज़माना यह जान ले
अब तक किसी यज़ीद को हंसने नहीं दिया

ग़फलत ने सामई़न की ज़ीशान देखिए
ज़ाकिर के कुफरो शिर्क को रुकने नहीं दिया

✍ ज़ीशान आज़मी

باطل کا سر حسین نے اٹھنے نہیں دیا
پرچم خدا کے دین کا جھکنے نہیں دیا

مظلومیت نے شاہ کی واللہ آج تک
ظالم کا حوصلہ کبھی اٹھنے نہیں دیا

دے کر لہو امام نے بخشی ہے زندگی
اسلام کو حسین نے مرنے نہیں دیا

عرش بریں پہ اس کو رکھا ہے حسین نے
انسانیت کو فرش پہ گرنے نہیں دیا

الجھا دیا ہے قوم نے رسم و رواج میں
قرآن کب پڑھوں اسے پڑھنے نہیں دیا

اصعر کا معجزہ ہے زمانہ یہ جان لے
اب تک کسی یزید کو ہنسنے نہیں دیا

غفلت نے سامعین کی ذیشان دیکھئے
ذاکر کے کفر و شرک کو رکنے نہیں دیا

✍ ذیشان آعظمی

Friday, August 4, 2017

आंखें बिछाए राह पर उसकी खड़ा रहा

दिल और दिमाग मेरा यही सोचता रहा
कहनी न थी जो बात वही बोलता रहा

देखे बिना पलट के, मेरी जां चली गई
आंखें बिछाए राह पर उसकी खड़ा रहा

हिजरत पर उसकी, दिल पे असर जाने क्या हुआ
हर वक्त क़ल्ब पर मेरे महशर बपा रहा

वह ग़ैर मुल्क जाके बसे हैं अजी़ब है
क़िस्मत के आईने को मैं बस ताकता रहा

वादे को तूने तोड़ा है तू ही बता मुझे
तू बावफा रही कि मैं बावफा रहा

जिसके सबब वह गुफ्तगु करना ही छोड़ दे
ज़ीशान रात दिन वह खता ढूंढता रहा

✍ ज़ीशान आज़मी

دل اور دماغ میرا یہی سوچتا رہا
کہنی نہ تھی جو بات وہی بولتا رہا

دیکھے بنا پلٹ کے مری جاں چلی گئی
آنکھیں بچھائے راہ پہ اس کی کھڑا رہا

ہجرت پہ اس کی، دل پہ اثر جانے کیا ہوا
ہر وقت قلب پر مرے محشر بپا رہا

وہ غیر ملک جا کے بسے ہیں عجیب ہے
قسمت کے آئینے کو میں بس تاکتا رہا

وعدہ کو تو نے توڑا ہے تو ہی بتا مجھے
تو با وفا رہی کہ میں با وفا رہا

جس کے سبب وہ گفتگو کرنا ہی چھوڑ دے
ذیشان رات دن وہ خطا ڈھونڈتا رہا

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, August 2, 2017

मरने से पहले मैं जाऊं कर्बला मौला रज़ा

Marne se pahle mai jaao karbala maula raza

मदहा का हर लफ्ज़ करता है सना मौला रज़ा
हैं जहां में आला रुतबा आप का मौला रज़ा

आसमां वालों ने मेरी हौसला अफजा़ई की
नाम जब मैंने क़सीदे में लिया मौला रज़ा

शेर था क़ालीन पर, पाकर इशारा यह कहा
दो जहां में हुज्जते रब है मेरा मौला रज़ा

क्या कहूं मैं हाले दिल तकलीफ होती है बहुत
क़ौम का ईमां देखा तो दिल जला मौला रज़ा

ईल्तेजा करता हूं रब से आप के रोज़े पे यह
मरने से पहले मैं जाऊं कर्बला मौला रज़ा

दर हकी़क़त बादे काज़िम रहनुमाई के लिए
हम ग़रीबों का फक़त है आसरा मौला रज़ा

यह खुदा का शुक्र है कि आपके अक़वाल से
रास्ता ज़ीशान को हक़ का मिला मौला रज़ा

✍ ज़ीशान आज़मी

مدح کا ہر لفظ کرتا ہے ثنا مولا رضا
ہے جہاں میں اعلی رتبہ آپ کا مولا رضا

آسماں والو نے میری حوصلہ آفزائی کی
نام جب میں نے قصیدے میں لیا مولا رضا

شیر تھا قالین پر پاکر اشارہ یہ کہا
دو جہاں میں حجّتِ رب ہے مرا مولا رضا

کیا کہوں میں حالِ دل تکلیف ہوتی ہے بہت
قوم کا ایماں دیکھا دل جلا مولا رضا

التجا کرتا ہوں رب سے آپ کے روضہ پہ یہ
مرنے سے پہلے میں جاؤں کربلا مولا رضا

در حقیقت بعدِ کاظم رہنمائی کے لئے
ہم غریبوں کا فقط ہے آسرا مولا رضا

یہ خدا کا شکر ہے کہ آپ کے اقوال سے
راستہ ذیشان کو حق کا ملا مولا رضا

✍ ذیشان آعظمی