Wednesday, August 30, 2017

दुश्मन ने बांधा कसकर मुस्लिम को रस्सियों में

दुश्मन ने बांधा कसकर मुस्लिम को रस्सियों में
क्या रत्ती भर नहीं थी ग़ैरत नमाजियों में।

बेखौफ दीं की खातिर, दुश्मन का ज़ख्म खाकर
मुस्लिम तड़प रहे हैं कूफे की वादियों में।

सज्जाद कब गए थे बतलाए कोई हमको
मजलिस जहां न पहले होती हो शादियों में।

मेहमां नवाज़ी आखिर, कूफे में कौन करता
ना एक मेजबां था मुस्लिम के साथियों में।

क्या लोग साथ देते मज़लूमे कर्बला का
ईमान कूफियों का बिकता है रद्दियौं में।

क्या पूछते हो हम से मज़लूम की मुसीबत
मुस्लिम की देखो ग़ुरबत सरवर के आंसुओं में।

मुस्लिम का साथ छोड़े, गद्दार कूफे वाले
क्यों कर शहीद ना हो? मजलूम बाग़ियौं में।

बस एक शै हुसैनी, होती है आदमी मे
ज़ीशान तू बिछा दे फरशे अज़ा दिलों में।

✍ ज़ीशान आज़मी

دشمن نے باندھا کس کر مسلم کو رسِّیوں میں
کیا رتّی بھر نہیں ہے غیرت نمازیوں میں

بے خوف دیں کی خاطر، دشمن کا زخم کھا کر
مسلم تڑپ رہے ہیں کوفے کی وادیوں میں

سجّاد کب گئے ہیں بتلائے کوئی ہم کو
مجلس جہاں نہ پہلے ہوتی ہو شادیوں میں

مہماں نوازی آخر، کوفے میں کون کرتا
نا ایک میزباں تھا مسلم کے ساتھیوں میں

کیا لوگ ساتھ دیتے مظلومِ کربلا کا
ایمان کوفیوں کا بکتا یے ردّیوں میں

کیا پوچھتے ہو ہم سے مظلوم کی مصیبت
مسلم کی دیکھو غربت سرور کے آنسوؤں میں

مسلم کا ساتھ چھوڑے، غدّار کوفے والے
کیوں کر شہید نا ہو مظلوم باغیوں میں

بس ایک شے حسینی ہوتی ہے آدمی میں
ذیشان تو بچھا دے فرشِ عزا دلوں میں

✍ ذیشان آعظمی

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