Monday, September 4, 2017

इज़हार किया करती हैं झुकती हुई आंखें।

Izhaar kiya karti hai jhukti huwi aankhein

कुछ देख नहीं पाती है तरसी हुई आंखें
क्या ढूंढती है राह में बिखरी हुई आंखें।

आंखों में किया कैद जिसे चांदनी शब मे
है याद मुझे उसकी चमकती हुई आंखें।

बेदार न कर मुझको हंसी ख्वाब से यूं ही
महबूब को ढूंढेगी मसलती हुई आंखें।

सब होता है ऐहसास, ज़ुबां होती है गूंगी
जब हाल बयां करती हैं मलती हुई आंखें।

मालूम नहीं इश्क़ का क्या तुझको इशारा
इज़हार किया करती हैं झुकती हुई आंखें।

घर वाले समझ सकते हैं यह राज़े हकी़क़त
क्या देखती हैं तश्त मे रख्खी हुई आंखें।

जब टूट गई आस तो वह वक़्त भी आया
ठंडी हूई ज़ीशान सुलगती हुई आंखें।

✍ ज़ीशान आज़मी

کچھ دیکھ نہیں پاتی ہیں ترسی ہوئی آنکھیں
کیا ڈھونڈتی ہیں راہ میں بکھری ہوئی آنکھیں

آنکھوں میں کیا قید جسے چاندنی شب میں
ہیں یاد مجھے اس کی چمکتی ہوئی آنکھیں

بیدار نہ کر مجھ کو حسیں خواب سے یوں ہی
محبوب کو ڈھونڈیں گی مسلتی ہوئی آنکھیں

سب ہوتا ہے احساس، زباں ہوتی ہے گونگی
جب حال بیاں کرتی ہیں ملتی ہوئی آنکھیں

معلوم نہیں عشق کا کیا تجھ کو اشارہ
اظہار کیا کرتی ہیں جھکتی ہوئی آنکھیں

گھر والے سمجھ سکتے ہیں یہ رازِ حقیقت
کیا دیکھتی ہیں طشت میں رکھی ہوئی آنکھیں

جب ٹوٹ گئی آس تو وہ وقت بھی آیا
ٹھنڈی ہوئیں ذیشان سلگتی ہوئی آنکھیں

✍ ذیشان آعظمی

No comments:

Post a Comment

Your comments are appreciated and helpful. Please give your feedback in brief.