Wednesday, October 18, 2017

Ab bhi tera hisaab braabar nahi huwa

Ab bhi tera hisaab braabar nahi huwa

खालिक़ का शुक्र के उजागर नहीं हुआ
कुछ अयब तेरा बर सरे मंज़र नहीं हुआ

कुछ नेक काम तूने ज़रा भी किया नहीं
दुनिया में क्या वह लम्हा मयस्सर नहीं हुआ

दुनिया में जिंदगी की हकी़क़त को जान लो
क़यम किसी का यां अबदी घर नहीं हुआ

यह भी खुदा का फज़्ल है मेरे ही वास्ते
दिल को पसंद जो काम था अक्सर नहीं हुआ

जैसे अली और फातिमा की गुजरी जिंदगी
ऐसा किसी भी घर का मुक़द्दर नहीं हुआ

खिदमत में मां तेरी मैं गुज़ारा हूं जिंदगी
अब भी तेरा हिसाब बराबर नहीं हुआ

ज़ीशान ने लिखी है नई नज़्म बेशुमार
कहता है कौन के, वह सुखनवर नहीं हुआ

✍ ज़ीशान आज़मी

خالق کا کر شکر کہ اجاگر نہیں ہوا
کچھ عیب تیرا بر سر منظر نہیں ہوا

کچھ نیک کام تو نے ذرا بھی کیا نہیں
دنیا میں کیا وہ لمحہ میسّر نہیں ہوا

دنیا میں زندگی کی حقیقت کو جان لو
قائم کسی کا یاں ابدی گھر نہیں ہوا

یہ بھی خدا کا فضل ہے میرے ہی واسطے
دل کو پسند جو کام تھا اکثر نہیں ہوا

جیسے علی و فاطمہ کی گزری زندگی
ایسا کسی بھی گھر کا مقدّر نہیں ہوا

خدمت میں ماں تری میں گزارا ہوں زندگی
اب بھی ترا حساب برابر نہیں ہوا

ذیشان نے لکھی ہے نئی نظم بے شمار
کہتا ہے کون کے وہ سخنور نہیں ہوا

✍ ذیشان آعظمی
موج سخن آنلائن مشاعرہ
اکتوبر 2017

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