Sunday, October 8, 2017

Log saath aate gaye aur karwa banta gaya

मेरी काविश से ज़मीनो आसमां बनता गया
भाईचारे का वतन में आशियां बनता गया

शायरी और मौलवी की बद ख्याली के सबब
फिरक़ा हर दो मज़हबो के दरमियां बनता गया

झूठ की शिद्दत बहुत है राहे बातिल पर मगर
नेक नीय्यत से चला मैं साएबां बनता गया

आदमी को क्या खबर थी जुर्म जो करता रहा
नामए आमाल में उस का निशां बनता गया

मंजिलें मकसूद का था मैं मुसाफिर मज़तरिब
हम सफर जब पास आया तो समां बनता गया

आप बीती मैं सबसे अपनी बयां करता रहा
रफता रफता ज़िन्दगी का तरजुमां बनता गया

एक कदम मैं ने रखा तन्हा खिलाफे ज़ुल्म तो
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

दोस्तो मौजे ग़ज़ल का आसरा जब तक रहा
शेर मे ज़ीशान के मिसरा रवां बनता गया

✍ ज़ीशान आज़मी

میری کاوش سے زمین و آسماں بنتا گیا
بھائی چارے کا وطن میں آشیاں بنتا گیا

شاعری اور مولوی کی بد خیالی کے سبب
فرقہ ہر دو مذہبوں کے درمیاں بنتا گیا

دھوپ کی شدّت بہت ہے راہِ باطل پر مگر
نیک نیّت سے چلا میں سائباں بنتا گیا

آدمی کو کیا خبر تھی جرم جو کرتا رہا
نامئے اعمال میں اس کا نشاں بنتا گیا

منزلِ مقصود کا تھا میں مسافر مضطرب
ہم سفر جب پاس آیا تو سماں بنتا گیا

آپ بیتی میں سب سے اپنی بیاں کرتا رہا
رفتہ رفتہ زندگی کا ترجماں بنتا گیا

اک قدم میں نے رکھا تنہا خلاف ظلم تو
لوگ ساتھ آتے گئے اور کارواں بنتا گیا

دوستوں موجِ غزل کا آسرا جب تک رہا
شعر میں ذیشان کے مصرع رواں بنتا گیا

✍ ذیشان آعظمی

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