Monday, October 23, 2017

Sar e mehfil muhabbat ka payaam ayaa to kya hoga

तेरे होठों पे कुरआं सुबहो शाम आया तो क्या होगा
फरिश्तों का तेरे घर पर सलाम आया तो क्या होगा

बड़ा खुशहाल है तू पानी के दो घूट पी कर भी
तेरे हाथों में जन्नत का जाम आया तो क्या होगा

इबादत मैं भी करता हूं खुदाया तेरी मस्जिद में
अगर सजदे में उसका लब पे नाम आया तो क्या होगा

तिहत्तर फिरक़ों में तक़सीम है उम्मत मोहम्मद की
मुसलमां गर ज़माने का ईमाम आया तो क्या होगा

ग़ज़ल इश्क़ो मुहब्बत उसको की पढ़ा न कर तू महफिल में
सरे महफिल मोहब्बत का पयाम आया तो क्या होगा

न कारे खैर है कुछ भी न अच्छे अमल कोई
खुदा से मिलने का तेरा मुक़ाम आया तो क्या होगा

ख़याले ख़ाम के अशआर न लिख्खा करे कोई
अगर ज़ीशान के आगे कलाम आया तो क्या होगा

✍ ज़ीशान आज़मी

٧٩ ویں موج غزل طرحی مشاعرے میں میری کاوش

ترے ہونٹوں پہ قرآں صبح و شام آیا تو کیا ہوگا
فرشتوں کا ترے گھر پر سلام آیا تو کیا ہوگا

بڑا خوش حال ہے تو پانی کے دو گھونٹ پی کر بھی
ترے ہاتھوں میں گر جنت کا جام آیا تو کیا ہوگا

عبادت میں بھی کرتا ہوں خدایا تیری مسجد میں
اگر سجدے میں اس کا لب پہ نام آیا تو کیا ہوگا

تہتر فرقوں میں تقسیم ہے امّت محمد کی
مسلماں گر زمانے کا امام آیا تو کیا ہوگا

غزل عشق و محبت کی پڑھا نہ کر تو محفل میں
سرِ محفل محبت کا پیام آیا تو کیا ہوگا

نہ کارِ خیر ہے کچھ بھی نہ اچھے عمل کوئی
خدا سے ملنے کا تیرا مقام آیا تو کیا ہوگا

خیالِ خام کے اشعار نہ لکھّا کرے کوئی
اگر ذیشان کے آگے کلام آیا تو کیا ہوگا

✍ ذیشان آعظمی

No comments:

Post a Comment

Your comments are appreciated and helpful. Please give your feedback in brief.