Saturday, November 11, 2017

Kaha zahra ne ro ro kar mere dilbar ka Chehlum hai

ज़मीनो आसमां रोते हैं कि सरवर का चहलुम है
मेरे मौला मेरे आक़ा मेरे रहबर का चहलुम है

सकीना ज़ैनबो कुलसुम के हमराह मजलिस में
कहा ज़हरा ने रो-रो कर मेरे दिलबर का चहलुम है

जिगर छलनी हुआ जिसके सबब से उम्मे फरवा का
अज़ादारों यह वह शहज़ाद ए शब्बर का चहलुम है

बहाओ अश्क मजलिस में वो एक नन्हे मुजाहिद पर
रूबाब आती है पुरसे को अली असग़र का चहलुम है

अज़ादारों करो मातम वह हमशक्ले पयंबर का
यहां लैला भी आयी हैं अली अकबर का चहलुम है

ग़मे सरवर मे ज़ैनब को जो बच्चे याद ना आए
उन्हीं औनो मोहम्मद के कटे दो सर का चहलुम है

कटाए बाज़ु जिस ने अलक़मा पर दीन की खातिर
सकीना के चचा वह मोनिसो यावर का चहलुम है

अज़ादारों मेरे हिंदुस्तां ने यह शरफ पाया
यहां ज़ीशान घर घर पर बहत्तर घर का चहलुम है

✍ ज़ीशान आज़मी

زمین و آسماں روتے ہیں کہ سرور کا چہلم ہے
مرے   مولا   مرے   آقا   مرے رہبر کا چہلم ہے

سکینہ   زینب  و  کلثوم کے ہمراہ مجلس  میں
کہا   زہرا  نے  رو رو کر میرے دلبر کا چہلم  ہے

جگر چھلنی ہوا جس کے سبب سے امّ فروا  کا
عزاداروں   یہ   وہ  شہزادئے  شبّر کا چہلم  ہے

بہاو  اشک مجلس میں وہ اک ننھے مجاہد  پر
رباب آتی  ہے  پرسہ کو علی اصغر کا چہلم  ہے

عزاداروں کرو   ماتم   وہ  ہم   شکل  پیمبر  کا
یہاں  لیلی  بھی آئی  ہیں علی اکبر کا چہلم  ہے

غم  سرور میں زینب   کو  جو بچے یاد نہ  آئے
انھیں عون و محمد کے کٹے دو سر کا چہلم ہے

کٹائے   بازو جس نے علقمہ   پر دین  کی خاطر
سکینہ کے  چچا   وہ  مونس و یاور کا چہلم ہے

عزاداروں  مرے   ہندوستاں  نے  یہ شرف  پایا
یہاں   ذیشان گھر گھر  پہ بہتر گھر کا چہلم ہے

✍ ذیشان آعظمی

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