Monday, November 6, 2017

Roz apne saye ko bahar bhatakta dekhna

दिल को ठनी है क्या तु ने यों तड़पता देखना
क्या तेरी खाहिश है मुझको रोज़ रोता देखना

याद कर लेना मेरे आंसुओं के सैलाब को
जब कभी आंगन में तुम सावन बरसता देखना

दिल तेरा पत्थर नहीं है तो, गुजारिश है मेरी
याद करना हम को भी जब कोई मरता देखना

याद करना हम को या फिर लौट आना वतन
जब परिंदों को कभी अंबर पे उड़ता देखना

इसलिए नाराज है मुझसे हमेशा के लिए
उसको है दिल में मेरे खंजर उतरता देखना

ख्वाब में आ जाना मिलने मुझको के अच्छा नहीं
रोज़ अपने साये को बाहर भटकता देखना

मांग लेना उसको रब से जब कभी ज़ीशान तू
एक तारा आसमां से नीचे गिरता देखना

✍ ज़ीशान आज़मी

سخن کے تحت 211 ویں بین الاقوامی فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش

دل کو ٹھانی ہے کیا تو نے یوں تڑپتا دیکھنا
کیا تری خواہش ہے مجھ کو روز روتا دیکھنا

یاد کر لینا مرے آنسوؤں کے سیلاب کو
جب کبھی آنگن میں تم ساون برستا دیکھنا

دل ترا پھتّر نہیں ہے تو گزارش ہے میری
یاد کرنا ہم کو بھی جب کوئی مرتا دیکھنا

یاد کرنا ہم کو یا پھر لوٹ ہی آنا وطن
جب پرندوں کو کبھی امبر پہ اڑتا دیکھنا

اس لئے ناراض ہے مجھ سے ہمیشہ کے لئے
اس کو ہے دل میں مرے خنجر اترتا دیکھنا

خاب میں آ جانا ملنے مجھ کو کہ اچھا نہیں
روز اپنے سائے کو باہر بھٹکتا دیکھنا

مانگ لینا اس کو رب سے جب کبھی ذیشان تو
ایک تارا آسماں سے نیچے گرتا دیکھنا

✍ ذیشان آعظمی

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