Sunday, December 31, 2017

Diwaar se purana Calendar utaar de

परवरदिगार    अब  कोई   लश्कर उतार दे
सीने में ज़ालिमों के  जो नश्तर उतार दे

शैतान है    लहू में, नये    दौर    मे    खुदा
हर दिल  में इल्मे दीं का     समंदर उतार दे

परवरदिगार    मुझको    बचा ले हराम  से
रिज़क़े हलालम  जिस्म   के अंदर उतार दे

समझोगे    आप कैसे यह   है सहरे शायरी
एक एक को बोतलों में सुखनवर उतार  दे

ख़ौफे इलाही तुझ   पे अगर कर गई असर
शर का ख़्याल जितना है सर पर, उतार दे

एक साल जिंदगी का  तेरी हो गया है कम
दीवार   से   पुराना     कैलेंडर     उतार दे

ज़ीशान से   उलझना  नहीं ज़ालिमों कभी
दुश्मन के वह   कलेजे   में खंजर उतार दे

✍ ज़ीशान आज़मी

موج غزل عالمی مشاعرہ نمبر 89 میں فی
البدیہہ عالمی طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

پروردگار      اب     کوئی   لشکر اتار دے
سینے میں  ظالموں کے جو نشتر اتار دے

شیطان  ہے  لہو   میں  نئے دور میں خدا
ہر دل  میں   علمِ دیں  کا سمندر اتار دے

پروردگار    مجھ   کو  بچا لے حرام   سے
رزقِ حلال    جسم    کے    اندر   اتار دے

سمجھوگے  آپ کیسے یہ ہے سحرِ شاعری
اک اک  کو  بوتلوں  میں  سخنور اتار دے

خوفِ الہی   تجھ   پہ   اگر   کر گئی اثر
شر کا   خیال    جتنا    ہے سر پر اتار دے

اک سال   زندگی    کا تری   ہو گیا ہے کم
دیوار    سے    پرانا      کلینڈر    اتار  دے

ذیشان    سے  الجھنا نہیں ظالموں کبھی
دشمن    کے وہ کلیجہ میں خنجر اتار دے

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, December 30, 2017

Ek sham kabhi humko suhani nahi milti

Maloni me rahta hoon rawani nahi milti
Is hasti ko jeene  ki   nishani   nahi milti

Maloni ki aabo hawa na paak huwi hai
Ek sham kabhi humko suhani nahi milti

Khaliq ko jawani ki ebadat hi pasand hai
Do baar kabhi bande,  jawaani nahi milti

Kachre   me traffic me  sabhi  jeete lekin
Logo ki   yaha   soch   siyaani nahi  milti

Zeeshan jaha zindagi khush hal thi meri
Afsos   wo maloni    purani   nahi     milti

✍ Zeeshan Azmi

موجِ سخن کے تحت 219 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی آن لائن محفلِ مشاعرہ
میں میری کاوش :

مالونی میں    رہتا ہوں    روانی   نہیں ملتی
اس ہستی    کو جینے  کی نشانی نہیں ملتی

مالونی    کی   آب و ہوا   نا پاک      ہوئی ہے
اک شام    کبھی   ہم  کو  سہانی   نہیں لگتی

خالق   کو   جوانی   کی   عبادت ہی پسند ہے
دو بار    کبھی     بندے،   جوانی   نہیں ملتی

کچرے میں ٹرافک میں سبھی جیتے ہے لیکن
لوگو   کی یہاں   سوچ    سیانی   نہیں  ملتی

ذیشان   جہاں    زندگی خوشحال تھی  میری
افسوس    وہ    مالونی    پرانی   نہیں  ملتی

✍ ذیشان آعظمی

Friday, December 29, 2017

Pasbaani ka mazaa jaata raha

Mulk   me   rahbar    naya aataa raha
Pet   apne logon    ka     bharta    raha

Jhoota    wada    roz    kar   ke aaj tak
Na samajh    logon ko    bahlata raha

Kaam   me      ek    bhi    nahi     mere
Par wo   schemey   nayee  laata raha

Na pasand    ration gharibo   ko diya
Khud   magar  ration A1 khaata raha

Apne faide    ke liye    sarkaar-e-man
Bas    naye     qanoon   banwata raha

CCTV      lagne      se     ab      dekhiye
Pasbaani   ka   mazaa    jaata     raha

Naam ke nikle  sayaasat daa'n sabhi
Uljhanein  Zeeshan   suljhaata   raha

✍ Zeeshan Azmi

دیا 227 ویں عالمی آن لائن فی البدیہہ
طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

ملک    میں    رہبر     نیا     آتا   رہا
پیٹ    اپنے    لوگوں    کا بھرتا رہا

جھوٹا    وعدہ    روز کر  کے آج تک
نا    سمجھ    لوگوں   کو بہلاتا رہا

کام    میں  اک بھی نہیں آئی مرے
پر    وہ    اسکیمیں   نئی   لاتا  رہا

ناپسند   راشن   غریبوں    کو   دیا
خود   مگر   راشن  اےون کھاتا رہا

اپنے  فائدے   کے   لئے   سرکارِ من
بس     نئے     قانون     بنواتا    رہا

سی سی ٹیوی لگنے سے اب دیکھئے
پاسبانی     کا      مزا       جاتا   رہا

نام کے     نکلے    سیاستداں  سبھی
الجھنیں    ذیشان     سلجھاتا    رہا

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, December 28, 2017

Suraj ne kabhi raat ki zulmat nahi dekhi

क्या आयते    कुरआन की  अज़मत नहीं देखी
लिख्खें   हुए जुमलों   की बलाग़त   नहीं देखी

मस्जिद में   नमाज़ी    की गई   आदतें    देखी
क़ुरआन   कभी पढ़ने   की आदत   नहीं देखी

इस दौर में जाहिल की फक़त होती है इज़्ज़त
आलिम की यहां थोड़ी  भी इज़्ज़त नहीं देखी

हर शख्स  से ब्योपार   करो सोच   समझकर
फिर यह   न कहो मैंने   तो नियत   नहीं देखी

इंसान को नवाज़ा   है हर एक   शै से खुदा ने
उसने कभी   अपनी छुपी ताकत    नहीं देखी

कातिल है जाहालत का हर एक नूर खुदा का
सूरज ने   कभी   रात की ज़ुलमत नहीं   देखी

फरमाने   खुदा कहता है जन्नत  की तरफ आ
ज़ीशान   मगर    लोगों ने   जन्नत    नहीं देखी

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز 18  ویں  بین الا قوامی فی البدیہہ طرحی مشاعرے میں میری ادنٰی کاوش:

کیا آیتِ قرآن     کی    عظمت    نہیں دیکھی
لکھّے ہوئے    جملوں کی  بلاغت نہیں دیکھی

مسجد میں   نمازی کی  کئی عادتیں  دیکھی
قرآن کبھی    پڑھنے  کی عادت  نہیں دیکھی

اس دور میں    جاہل کی فقط  ہوتی ہے عزت
عالم کی یہاں تھوڑی بھی عزت  نہیں دیکھی

ہر شخص سے   بیوپار   کرو سوچ سمجھ کر
پھر یہ نہ کہو     میں نے تو نیّت نہیں دیکھی

انساں   کو نوازا    ہے    ہر اک شے سے خدا نے
اس نے کبھی اپنی چھپی طاقت نہیں دیکھی

قاتل ہے جہالت   کا   ہر اک      نور      خدا کا
سورج نے   کبھی رات کی ظلمت نہیں دیکھی

فرمانِ خدا      کہتا       ہے   جنت کی طرف آ
ذیشان مگر     لوگوں     نے جنت نہیں دیکھی

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, December 24, 2017

Ab tujhe intezaar hai kiska

Aadmi      Soghwar           Hai      Kiska
Duniya Mein     Etebaar     Hai    Kiska

Main Musafir Hoon Tanha Manzil Ka
Dosh par Mere    Baar      Hai      Kiska

Sab Nazar Aate Hai Matlabi Hum  Ko
Dahar     Mein Aaj    Yaar   Hai    Kiska

Arzoo      Khatm      Hi     Nahi        Hoti
Aadmi       Ko Khumaar    Hai      Kiska

Tera     Parwardigaar   Sath    To    Hai
Ab      Tujhe      Intezaar     hai      Kiska

Dosto      Se      Khafa    Tu    Lagta Hai
Dil Pe       Zeeshan   Waar Hai     Kiska

✍ Zeeshan Azmi

دیا 144 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ
میں میری کاوش:

آدمی   سوگوار   ہے   کس  کا
دنیا  میں   اعتبار ہے   کس کا

میں  مسافر  ہوں تنہا منزل کا
دوش پر میرے  بار ہے کس کا

سب نظر   آتے مطلبی    ہم کو
دہر میں   آج   یار ہے   کس کا

آرزو   ختم   ہی    نہیں   ہوتی
آدمی    کو    خمار  ہے کس کا

تیرا     پروردگار    ساتھ تو ہے
اب  تجھے    انتظار ہے کس کا

دوستو سے   خفا  تو لگتا   ہے
دل پہ   ذیشان وار ہے کس کا

✍ ذیشان آعظمی

Friday, December 22, 2017

Kya rang badalti hai zamane ki fiza bhi

इन्सान की फितरत में है उलफत भी वफा भी
शैतान की जानिब    से मगर   होती   दग़ा भी

खाते हो ग़िज़ा जितनी रखो इतनी   ही खाली
लाज़िल है इसी वज़्न   में पानी   भी  हवा भी

इंसां के लिए ज़हर   ही क्या   था  नहीं काफी
इस दौर मे    पहुंचाती   है नुक़सान    दवा भी

मैं     कैसे     कहूं     तुझको मुसलमान बतादे
शैतान     भी    है दिल    में तेरे और खुदा भी

ऐ अहले    नज़र देग    गिरगिट    की तरह से
क्या रंग    बदलती है ज़माने    की  फिज़ा भी

ज़ीशान    अगर रब की रज़ा   चाहिए तुझको
हर पल कीए    जा नेक अमल  और दुआ भी

✍ ज़ीशान आज़मी

سائبان ہفتہ وار فی البدیہہ طرحی مشاعرہ
میں میری کاوش :
انسان کی فطرت میں ہے الفت بھی وفا بھی
شیطان کی   جانب   سے  مگر ہوتی دغا بھی

کھاتے    ہو غذا   جتنی  رکھو  اتنی ہی خالی
لازم ہے   اسی وزن   میں پانی  بھی ہوا بھی

انساں کے   لئے زہر ہی    کیا  تھا   نہیں کافی
اس دور میں    پہنچاتی ہے نقصان  دوا بھی

میں کیسے   کہوں تجھکو   مسلمان   بتادے
شیطان بھی ہے   دل میں تیرے اور خدا بھی

اے اہل نظر دیکھ   یہ   گرگٹ  کی طرح سے
کیا رنگ   بدلتی ہے    زمانے    کی   فضا بھی

ذیشان    اگر رب    کی رضا   چاہئے  تجھکو
ہر پل   کئے    جا نیک   عمل   اور    دعا بھی

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, December 20, 2017

Yazid zulm tera aansooN se haar gaya

यज़ीदी ग़लबा    बहत्तर  सरों से हार गया
वह प्यासे करबला के बेकसों से हार गया

ग़मे हुसैन   है ज़िन्दा,   हुसैन     जीत गये
यज़ीद ज़ुल्म   तेरा आंसुओं   से हार गया

✍ ज़ीशान आज़मी

یزیدی غلبہ    بہتر    سروں   سے ہار گیا
وہ پیاسے کربلا کے بے کسوں سے ہار گیا

غمِ حسین   ہے   زندہ،  حسین جیت گئے
یزید ظلم  تیرا    آنسؤں     سے    ہار گیا

✍ ذیشان آعظمی

Dile shikasta hamara bikharne wala hy

ہماری آنکھوں  سے آنسو نکلنے والا ہے
خدا  ہی  جانے  کیا کیا گزر نے والا ہے

تری   جدائی   سے  اب  ٹوٹ  کر برابر
دلِ شکستہ   ہمارا    بکھر   نے  والا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, December 19, 2017

Mete qatil to mere apne hawaari nikle

शेर कहते   हो तो हर बात  तुम्हारी निकले
आप पर बीती  है जो   दास्तां सारी निकले

क़िरअते क़ुरां सिखाएं   मेरे बच्चों को कोई
क़ौम मे   ऐसा कोई एक   तो क़ारी निकले

नागहानी में   कभी ज़ाकिरो   मुल्लाओ के
हमने ईमान  टटोला तो वह   नारी  निकले

यह हक़ीक़त  है के होते   हैं दिखावे  वाले
दहर में जितने  थे मशहूर  भिकारी निकले

तजरिबा है कि  जहां तक गई है मेरी नज़र
जिस्मो दौलत के  कई लोग पुजारी निकले

एक पल्ले पे  मुसन्निफ  की लदी थी पोथी
मेरे दो   शेर   मगर दूजे   पे भारी   निकले

मरने के बाद   ही मालूम हुआ   है मुझको
मेरे क़ातिल तो   मेरे अपने  हवारी निकले

यह दुआ करते रहो  अपने खुदा से हरदम
जान  इस्लाम   पे ज़ीशान  हमारी  निकले

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز ہفتہ وار فی البدیہہ 17
واں طرحی عالمی آن لائن مشاعرہ  میں
میری یکجا کاوش :

شعر   کہتے  ہو  تو  ہر بات   تمہاری نکلے
آپ پر بیتی  ہیں جو داستاں ساری  نکلے

قرئتِ قرآں سکھائے مرے بچوں کو کوئی
قوم   میں  ایسا کوئی ایک تو قاری نکلے

ناگہانی   میں   کبھی ذاکر و ملّا ؤں  کے
ہم   نے    ایمان  ٹٹولا   تو  وہ  ناری نکلے

یہ حقیقت ہے کہ ہوتے ہیں دکھاوے والے
دہر میں  جتنے تھے مشہور  بھکاری نکلے

تجربہ ہے کہ جہاں تک گئی ہے میری نظر
جسم و دولت کے  کئ  لوگ پجاری  نکلے

ایک پلہ  پہ مصنف   کی لدی تھی پوتھی
میرے دو شعر  مگر  دوجے پہ بھاری نکلے

مرنے کے  بعد  ہی معلوم ہوا  ہے  مجھکو
میرے قاتل تو   مرے  اپنے   حواری نکلے

یہ دعا کرتے   رہو   اپنے  خدا  سے ہر دم
جان   اسلام  پہ ذیشان     ہماری     نکلے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, December 18, 2017

Kya kya huwe paimane wafa kis ko khabar hai

गर दिल  में मुसलमां    के अल्लाह   का डर है
फिर मौत का इसको नहीं कुछ ख़ौफो खतर है

इस्लाम ही    मज़हब   है  पसंदीदा    खुदा का
बस इ सके इलावा   तो सभी    दिन    ज़रर है

मोमिन कभी    धोखा नहीं देता    है किसी को
अल्लाह  से    डरता है के   तक़वे का असर है

माबूद  को वह    देख नहीं   सकता है हरगिज़
दुनिया   में अगर   बंदे    की कमज़ोर नज़र है

बदनाम   हुआ   जाता है    इस्लाम    मुसलमां
दुनिया   को सिखा दीन अगर सीने में जिगर है

बंदो का यह  अल्लाह   से मदर के   शिकम में
क्या-क्या हुए   पैमाने वफ़ा   किसको खबर है

ज़ीशान   ज़माने   में करूं    किस    पे भरोसा
जिस चोर को   देखो  वही मस्जिद का सदर है

✍ ज़ीशान आज़मी

بزمِ سخنوراں کی 98/ ویں ہفتہ واری فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

گر   دل    میں    مسلمان    کے    اللہ   کا  ڈر ہے
پھر موت کا اس کو نہیں کچھ خوف و خطر ہے

اسلام    ہی    مذہب    ہے    پسندیدہ    خدا   کا
بس    اس    کے   علاوہ   تو  سبھی دین ضرر ہے

مومن   کبھی    دھوکا   نہیں   دیتا  ہے کسی کو
اللہ     سے   ڈرتا    ہے    کہ    تقوے     کا  اثر  ہے

معبود     کو    وہ    دیکھ   نہیں   سکتا  ہے ہرگز
دنیا    میں    اگر    بندے    کی    کمزور    نظر ہے

بدنام      ہوا     جاتا       ہے      اسلام     مسلماں
دنیا    کو    سکھا دین   اگر    سینے  میں جگر ہے

بندوں     کا    یہ    اللہ    سے   مادر کے شکم میں
کیا   کیا   ہوئے    پیمان  وفا    کس   کو   خبر ہے

ذیشان    زمانے     میں   کروں     کس پہ بھروسہ
جس    چور کو   دیکھوں وہی مسجد کا  صدر ہے

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, December 16, 2017

Kabhi kabhi to rawayat se inheraaf karein

पढ़े लिखों   से गुज़ारिश   है काम  साफ करें
कि जहल   दूर करें   ईल्म   इनकेशाफ   करें

समझ में आएगी हर बात इल्मो हिकमत की
दिलों   को   पहले   बुराई से लोग साफ करें

तू कामयाब   है मरने    से पहले    दुनिया में
अगर तुझे     तेरे मां    और    बाप माफ करें

सभी     है भाई मुसलमान     एक  उम्मत से
यह अच्छी   बात नहीं है कि इख़तेलाफ करें

सिवा कलामे खुदा के नहीं    है कुछ फीसद
कभी-कभी  तो रवायतय   से इनहेराफ करें

हमारे  घर में   है ज़ीशान  पानी की क़िल्लत
बुरा ना मानो  तो हम    चाय हाफ हाफ करें

✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ سخن 217 ویں بین الاقوامی فی البدیہہ
طرحی آن لائن بین الاقوامی مشاعرے میں
میری یکجا کاوش :

پڑھے لکھوں سے گزارش ہے کام صاف کریں
کہ   جہل   دور    کریں    علم انکشاف کریں

سمجھ میں آئیگی ہر بات علم و حکمت کی
دلوں کو   پہلے  برائی   سے لوگ صاف کریں

تو   کامیاب  ہے مرنے  سے   پہلے   دنیا  میں
اگر تجھے   ترے   ماں اور باپ   معاف کریں

سبھی ہیں   بھائی   مسلمان   ایک امّت سے
یہ  اچھی  بات نہیں   ہے  کہ  اختلاف کریں

سوا کلامِ خدا کے    نہیں   ہے کچھ فی صد
کبھی کبھی   تو روایت    سے انحراف کریں

ہمارے گھر   میں  ہے   ذیشان  پانی کی قلّت
برا   نہ  مانو   تو   ہم    چائی ہاف ہاف کریں

✍ ذیشان آعظمی

Friday, December 15, 2017

Ba har unwaan, muhabbat ko bahare zindagi kahye

ख़ता से बचते हो जिस   दिन उसे रोज़े खुशी कहये
खुदा के रास्ते    पर चलने वाले    को   ज़की कहये

अगर है   जिंदगी   खुदगर्ज़ तो   है मौत से   बदतर
फिदा हो   दूसरों पर जिंदगी    तो   जिंदगी   कहये

बुराई  सबके अंदर   है ख़ता    से कौन    बच पाया
सहे जो   दोस्त का   हर ऐब   उसको  दोस्ती कहये

खुदा के ख़ौफ से जो शक्स डरता है हर एक लम्हा
तो ऐसी   जिंदगी   को   आप   बेशक बंदगी कहये

सुकूने क़ल्ब    देती      है    हमें   राहे मोहब्बत की
ब हर उनवां,    मोहब्बत को    बहारे जिंदगी कहये

ख़ुदा के नूर से    ज़ुल्म का     साया     दूर होता है
हदायत रब की  जानिब से  मिले  तो रोशनी कहये

खुदा के फज़्ल से ज़ीशान बिल्कुल   ख़ैरियत से है
आली जनाब!  कैसी  है  तबीयत   आप की कहये

✍ ज़ीशान आज़मी

225 ویں دیا عالمی آن لائن فی البدیہہ طرحی
مشاعرہ میں میری کاوش:

خطا سے بچتے ہو جس دن اسے روزِ خوشی کہئے
خدا    کے راستے     پر چلنے     والے کو زکی کہئے

اگر ہے زندگی    خود غرض    تو ہے موت سے بدتر
فدا ہو  دوسروں     پر زندگی    تو  زندگی    کہئے

برائی سب    کے    اندر ہے   خطا سے کون بچ پایا
سہے جو دوست کا ہر   عیب اس کو دوستی کہئے

خدا کے خوف  سے جو شخص ڈرتا ہے ہراک لمحہ
تو ایسی  زندگی     کو    آپ  بے شک بندگی کہئے

سکونِ قلب   دیتی     ہے    ہمیں    راہِ محبت کی
بہ  ہر عنواں    محبت    کو    بہار    زندگی  کہئے

خدا کے   نور سے   ظلمت کا   سایا   دور   ہوتا ہے
ہدایت رب   کی جانب   سے  ملے تو روشنی کہئے

خدا کے   فضل سے   ذیشان  بلکل خیریت سے ہے
جنابِ عالی    کیسی    ہے    طبیعت  آپ کی کہئے

✍ ذیشان آعظمی

Hazaar baar hame wo sulag ke milta rahe

हवस    माल की और    ना फरेबो   धोखा रहे
यह शहर काश मेरा ग़ुल की तरह महकता रहे

ख्याल      रखना     बुझाए ना बेवफा     कोई
हमारे शहर     में वफा का   चिराग़ जलता रहे

हमारे     शहर का    माहौलय    ऐसा हो जाए
बिना    तज़ाद के    बाशिंदा रोज़  मिलता रहे

यह अच्छी    बात नहीं दोस्तों    हमारे   लिए
के देखते    रहे मुह चाहे    कोई     मरता  रहे

यह कैसी फितरते निसवां है सीधी होती नहीं
ख़फा    रहेगी   मियां से   वह चाहे सीधा रहे

मेरी    दुआ है खुदा     ऐसा     वक्त ना आये
हज़ार बार     हमें वह सुलग   के मिलता रहे

वह कामयाब     है ज़ीशान    हर   ज़माने में
जो बार बार       खुदा  से दुआ     करता रहे

✍ ज़ीशान आज़मी

سائبان ادب و ثقافت کے ہفتہ وار فی البدیہہ
طرحی نشست میں میری کاوش:

ہوس مال کی   اور نہ   فریب و دھوکا    رہے
یہ شہر کاش     مرا گل  کی  طرح مہکتا رہے

خیال  رکھنا    بجھائے     نہ    بے وفا    کوئی
ہمارے     شہر میں     وفا  کا  چراغ جلتا رہے

ہمارے    شہر     کا ماحول     ایسا    ہو جائے
بنا تضاد      کے باشندہ      روز      ملتا    رہے

یہ اچھی     بات نہیں      دوستوں ہمارے لئے
کہ      دیکھتے    رہے منہ چاہے کوئی مرتا رہے

یہ کیسی فطرتِ نسواں ہے سیدھی ہوتی نہیں
خفا رہیگی میاں    سے وہ     چاہے سیدھا رہے

مری   دعا ہے      خدا ایسا      وقت      نہ آئے
ہزار بار ہمیں       وہ      سلگ      کے  ملتا رہے

وہ   کامیاب       ہے   ذیشان    ہر    زمانے میں
جو بار بار خدا     سے   دعائیں          کرتا رہے

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, December 14, 2017

Fizaa kabhi na kabhi hum pe maherbaa hogi

न सोच    यह तेरी   फरयाद    राएगा होगी
ज़मीं से    आह उठेगी    तो   आसमां होगी

हमारे   साथ    बुराई   जो की    हुकूमत ने
यह बारगाहे     खुदा   में सभी   अयां होगी

जहां भी    ज़ुल्म की दीवार    सर उठाएगी
खुदा    के क़ह्र से    टूट  कर   धुआं   होगी

नया है दौर, मोबाइल  का   यह  ज़माना है
खुदा के फज़्ल से  तारीख  अब जवां होगी

छुरी की तरह चलेगी हर एक सितमगर पर
लिखी    हुई  मेरी  यह शायरी    जहां होगी

हमेशा  रहता   नहीं मौसमे   खिज़ा   यारों
फिज़ा कभी ना कभी हम  पे मेहरबां होगी

उठा न पाएगा दुश्मन कभी भी सर अपना
लिखेगा  शायरी   ज़ीशान   तो   गेरां होगी

✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ سخن کے تحت  216 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

نہ سوچ    یہ تری فریاد   رائیگاں ہوگی
زمیں سے آہ اٹھے   گی  تو آسماں ہوگی

ہمارے ساتھ برائی جو کی حکومت نے
یہ بارگاہِ خدا   میں  سبھی عیاں ہوگی

جہاں بھی ظلم  کی دیوار سر اٹھائےگی
خدا کے   قہر   سے ٹوٹ کر دھواں ہوگی

نیا ہے   دور   موبائل    کا   یہ  زمانہ ہے
خدا کے فضل سے تاریخ اب جواں ہوگی

چھری کی طرح چلےگی ہراک ستمگر پر
لکھی ہوئی میری یہ شاعری جہاں ہوگی

ہمیشہ    رہتا    نہیں موسمِ خزاں یاروں
فضا کبھی  نہ کبھی  ہم پہ مہرباں ہوگی

اٹھا نہ پائگا   دشمن  کبھی بھی سر اپنا
لکھے گا   شاعری   ذیشان تو گراں ہوگی

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, December 13, 2017

Humne utaar phenk di hai zanjeer aapki

अख़लाक़े  जिंदगी ही  है तक़दीर आपकी
एक आईने   में लाखों   है तस्वीर आपकी

कागज़ क़लम संभाल के रख्खा करो ज़रा
बेशक    सबूत    होती है तहरीर   आपकी

इस्लाम के जिहाद को समझे हैं  लोग जब
शीरीं जुबां ने   तोड़ी    शमशीर    आपकी

एहसान ना     जताए   हमें रब    के वास्ते
हमने उतार  फेंकी दी हैं  ज़नजीर आपकी

ज़ीशान  छोड़ जाएंगे  दुनिया में आप सब
अशआर  ही दर अस्ल  है जागीर आपकी

✍ ज़ीशान आज़मी

بزمِ سخنوراں 97 ویں ہفتہ واری فی البدیہہ
طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

اخلاقِ زندگی    ہی   ہے     تقدیر آپ کی
اک آئینہ میں لاکھوں ہیں  تصویر آپ کی

کاغذ قلم سنبھال    کے رکھّا    کرو    ذرا
بےشک ثبوت    ہوتی   ہے    تحریر آپ کی

اسلام کے جہاد کو سمجھے ہیں لوگ جب
شیریں زباں    نے   توڑی   شمشیر آپ کی

احسان نہ    جتائے  ہمیں رب کے واسطے
ہم نے اتار     پھینک    دی   زنجیر آپ کی

ذیشان چھوڑ جائیں گے دنیا میں آپ سب
اشعار ہی    در اصل     ہیں جاگیر آپ کی

✍ ذیشان آعظمی

مفعول فاعلات مفاعیل فاعلن
مستفعلن مفاعلن مفعول فاعلن
یہ دونوں افاعیل اس بحر میں لگتے ہیں

Dastar jinhe di hai unhe sar bhi ataa kar

अल्लाह तू लोगों   को मुसीबत   से रिहा कर
खामोश तमाशाई    को    गोयाई   अता कर

शाहिद हूं मैं कितनी    गई   मासूम की जानें
मज़लूम को पुरसा   दें सभी शमा  जला कर

बैठें हैं बिना   धड़ के   यह  कुर्सी पे ऐ लोगो
दसतार जीन्हें दी  है उन्हें  सर भी अता कर

नुक़सान, खुदा हमको मुनाफिक़ से बड़ा है
दुश्मन हो अगर दोस्त तो तू हमसे जुदा कर

ऊंचा है तेरा सर यह फक़त इन की बदौलत
मां-बाप के आ सामने तू सर  को झुका कर

कुछ दूसरो का    दर्द    अगर दिल में तेरे है
हाथों को उठा   कर तू ए इंसान   दुआ कर

ज़ीशान यह    दुनिया में दगा़ धोका बदी है
इंसान कहां जाएगा   अब जान   बचा कर

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز کے زیر اہتمام 16 ویں بین الا قوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش

اللہ تو    لوگوں کو    مصیبت     سے   رہا کر
خاموش   تماشائی    کو     گویائی   عطا کر

شاہد ہوں میں کتنی گئی معصوم کی جانیں
مظلوم   کو پرسہ    دیں سبھی شمع جلا کر

بیٹھیں ہیں بنا دھڑ کے یہ کرسی پہ اے لوگو
دستار  جنہیں دی ہے  انہیں سر بھی عطا کر

نقصان    خدا   ہم    کو    منافق    سے بڑا ہے
دشمن   ہو   اگر  دوست تو تو ہم سے جدا کر

اونچا   ہے    ترا   سر    یہ فقط ان کے بدولت
ماں باپ   کے    آ سامنے   تو سر کو جھکا کر

کچھ   دوسروں   کا  درد اگر دل میں ترے ہے
ہاتھوں   کو   اٹھا   کر   تو   اے انسان دعا کر

ذیشان یہ   دنیا   میں   دغا ، دھوکہ ،بدی  ہے
انسان کہاں   جائگا    اب     جان   بچا     کر

✍ ذیشان آعظمی

Monday, December 11, 2017

Sham-e-haq bujhane ko aandhiya tarasti hain

आज     औरतें   क्यों   क़ाज़ी मियां    तरसती है
अदल के लिए     मां   और     बेटियां तरसती है

लूट कर     गरीबों     को, ऐश   में    हुकूमत   है
आबो दाना     पाने     को  बस्तियां    तरसती है

सब हरे भरे     आंगन    के मेरे    शजर    उजड़े
अब चमन को गुलशन की तितलियाँ  तरसती है

या अली कदम बोसी   के    लिए तेरी    अब भी
मुनसफी    हुकूमत की    पगड़ियां     तरसती है

दहर में    ज़ियारत को,   एक हुसैन  की पयहम
चप्पे-चप्पे     की    सारी   हस्तियां    तरसती है

नूर ए हक़ तो   रोशन है    और रहेगा  रोशन ही
शमऐ हक़    बुझाने    को    आंधीयां तरसती है

क्या उरूज    पर है ज़ीशान   यह  तेरी क़िस्मत
यह मुक़ाम    पाने   को    पसतियां   तरसती है

✍ ज़ीशान आज़मी

آج عورتیں  کیوں قاضی  میاں ترستی ہیں
عدل کے لئے    ماں  اور  بیٹیاں ترستی ہیں

لوٹ کر غریبوں کو عیش میں حکومت ہے
آب و دانہ  پانے    کو    بستیاں ترستی ہیں

سب ہرے بھرے آنگن کے مرے شجر اجڑے
اب چمن کو  گلشن  کی تتلیاں ترستی ہیں

یا علی    قدم بوسی   کے لئے تری اب بھی
منصفی   حکومت کی پگڑیاں ترستی ہیں

دھر میں زیارت   کو اک  حسین کی پیہم
چپے چپے کی  ساری   ہستیاں ترستی ہیں

نورِ حق تو  روشن ہے اور رہےگا روشن ہی
شمعِ حق بجھانے  کو آندھیاں ترستی ہیں

کیا عروج    پر ہے    ذیشان یہ تری قسمت
یہ مقام    پانے کو    پستیاں    ترستی ہیں

✍ ذیشان آعظمی