Sunday, December 31, 2017

Diwaar se purana Calendar utaar de

परवरदिगार    अब  कोई   लश्कर उतार दे
सीने में ज़ालिमों के  जो नश्तर उतार दे

शैतान है    लहू में, नये    दौर    मे    खुदा
हर दिल  में इल्मे दीं का     समंदर उतार दे

परवरदिगार    मुझको    बचा ले हराम  से
रिज़क़े हलालम  जिस्म   के अंदर उतार दे

समझोगे    आप कैसे यह   है सहरे शायरी
एक एक को बोतलों में सुखनवर उतार  दे

ख़ौफे इलाही तुझ   पे अगर कर गई असर
शर का ख़्याल जितना है सर पर, उतार दे

एक साल जिंदगी का  तेरी हो गया है कम
दीवार   से   पुराना     कैलेंडर     उतार दे

ज़ीशान से   उलझना  नहीं ज़ालिमों कभी
दुश्मन के वह   कलेजे   में खंजर उतार दे

✍ ज़ीशान आज़मी

موج غزل عالمی مشاعرہ نمبر 89 میں فی
البدیہہ عالمی طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

پروردگار      اب     کوئی   لشکر اتار دے
سینے میں  ظالموں کے جو نشتر اتار دے

شیطان  ہے  لہو   میں  نئے دور میں خدا
ہر دل  میں   علمِ دیں  کا سمندر اتار دے

پروردگار    مجھ   کو  بچا لے حرام   سے
رزقِ حلال    جسم    کے    اندر   اتار دے

سمجھوگے  آپ کیسے یہ ہے سحرِ شاعری
اک اک  کو  بوتلوں  میں  سخنور اتار دے

خوفِ الہی   تجھ   پہ   اگر   کر گئی اثر
شر کا   خیال    جتنا    ہے سر پر اتار دے

اک سال   زندگی    کا تری   ہو گیا ہے کم
دیوار    سے    پرانا      کلینڈر    اتار  دے

ذیشان    سے  الجھنا نہیں ظالموں کبھی
دشمن    کے وہ کلیجہ میں خنجر اتار دے

✍ ذیشان آعظمی

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