Friday, December 22, 2017

Kya rang badalti hai zamane ki fiza bhi

इन्सान की फितरत में है उलफत भी वफा भी
शैतान की जानिब    से मगर   होती   दग़ा भी

खाते हो ग़िज़ा जितनी रखो इतनी   ही खाली
लाज़िल है इसी वज़्न   में पानी   भी  हवा भी

इंसां के लिए ज़हर   ही क्या   था  नहीं काफी
इस दौर मे    पहुंचाती   है नुक़सान    दवा भी

मैं     कैसे     कहूं     तुझको मुसलमान बतादे
शैतान     भी    है दिल    में तेरे और खुदा भी

ऐ अहले    नज़र देग    गिरगिट    की तरह से
क्या रंग    बदलती है ज़माने    की  फिज़ा भी

ज़ीशान    अगर रब की रज़ा   चाहिए तुझको
हर पल कीए    जा नेक अमल  और दुआ भी

✍ ज़ीशान आज़मी

سائبان ہفتہ وار فی البدیہہ طرحی مشاعرہ
میں میری کاوش :
انسان کی فطرت میں ہے الفت بھی وفا بھی
شیطان کی   جانب   سے  مگر ہوتی دغا بھی

کھاتے    ہو غذا   جتنی  رکھو  اتنی ہی خالی
لازم ہے   اسی وزن   میں پانی  بھی ہوا بھی

انساں کے   لئے زہر ہی    کیا  تھا   نہیں کافی
اس دور میں    پہنچاتی ہے نقصان  دوا بھی

میں کیسے   کہوں تجھکو   مسلمان   بتادے
شیطان بھی ہے   دل میں تیرے اور خدا بھی

اے اہل نظر دیکھ   یہ   گرگٹ  کی طرح سے
کیا رنگ   بدلتی ہے    زمانے    کی   فضا بھی

ذیشان    اگر رب    کی رضا   چاہئے  تجھکو
ہر پل   کئے    جا نیک   عمل   اور    دعا بھی

✍ ذیشان آعظمی

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