Monday, December 11, 2017

Sham-e-haq bujhane ko aandhiya tarasti hain

आज     औरतें   क्यों   क़ाज़ी मियां    तरसती है
अदल के लिए     मां   और     बेटियां तरसती है

लूट कर     गरीबों     को, ऐश   में    हुकूमत   है
आबो दाना     पाने     को  बस्तियां    तरसती है

सब हरे भरे     आंगन    के मेरे    शजर    उजड़े
अब चमन को गुलशन की तितलियाँ  तरसती है

या अली कदम बोसी   के    लिए तेरी    अब भी
मुनसफी    हुकूमत की    पगड़ियां     तरसती है

दहर में    ज़ियारत को,   एक हुसैन  की पयहम
चप्पे-चप्पे     की    सारी   हस्तियां    तरसती है

नूर ए हक़ तो   रोशन है    और रहेगा  रोशन ही
शमऐ हक़    बुझाने    को    आंधीयां तरसती है

क्या उरूज    पर है ज़ीशान   यह  तेरी क़िस्मत
यह मुक़ाम    पाने   को    पसतियां   तरसती है

✍ ज़ीशान आज़मी

آج عورتیں  کیوں قاضی  میاں ترستی ہیں
عدل کے لئے    ماں  اور  بیٹیاں ترستی ہیں

لوٹ کر غریبوں کو عیش میں حکومت ہے
آب و دانہ  پانے    کو    بستیاں ترستی ہیں

سب ہرے بھرے آنگن کے مرے شجر اجڑے
اب چمن کو  گلشن  کی تتلیاں ترستی ہیں

یا علی    قدم بوسی   کے لئے تری اب بھی
منصفی   حکومت کی پگڑیاں ترستی ہیں

دھر میں زیارت   کو اک  حسین کی پیہم
چپے چپے کی  ساری   ہستیاں ترستی ہیں

نورِ حق تو  روشن ہے اور رہےگا روشن ہی
شمعِ حق بجھانے  کو آندھیاں ترستی ہیں

کیا عروج    پر ہے    ذیشان یہ تری قسمت
یہ مقام    پانے کو    پستیاں    ترستی ہیں

✍ ذیشان آعظمی

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