Monday, December 24, 2018

Yeh dil to koi kaam bhi hone nahi deta

हंसने    नहीं  देता     मुझे     रोने     नहीं देता
नेता वह    मुझे     चैन    से    सोने  नहीं देता

शादाब हो जिस काम से इस शहर का गुलशन
वह   बीज भी    नेता     मुझे  बोने   नही देता

मासूमों के होठों    की     हंसी     छीन  रहा है
बच्चों के     वह हाथों में   खिलौना   नहीं देता

कानून है    कैसा के     है     मजबूर   सहाफी
नेता के    गिरेबान     को     टोने     नहीं  देता

एक बार जो  मिल जाए किसी झूठ के दम पर
नेता कभी     उस    कुर्सी को   खोने नहीं देता

खुद चाहता    है खाता    रहे लूट    के  दौलत
नेता वह    कभी     दूसरा     होने    नहीं देता

जज़्बात में   ज़ीशान न  सुनना कभी दिल की
यह दिल    तो कोई   काम   भी होने नहीं देता

✍ ज़ीशान आज़मी

ہنسنے نہیں     دیتا    مجھے  رونے  نہیں دیتا
نیتا وہ   مجھے   چین   سے سونے  نہیں دیتا

شاداب ہو   جس   کام سے  اس شہر کا گلشن
وہ بیج  بھی نیتا   مجھے     بونے  نہیں  دیتا

معصوموں کے ہونٹوں کی ہنسی چھین رہا ہے
بچوں   کے وہ ہاتھوں  میں کھلونے نہیں دیتا

قانون   ہے   کیسا کے   ہے    مجبور   صحافی
نیتا کے    گریبان     کو    ٹونے     نہیں   دیتا

اک  بار جو مل جائے  کسی جھوٹ کے دم پر
نیتا  کبھی   اس  کرسی کو  کھونے نہیں دیتا

خود چاہتا    ہے کھاتا   رہے   لوٹ    کے دولت
نیتا وہ    کبھی    دوسرا    ہونے  نہیں    دیتا

جذبات    میں   ذیشان نہ  سننا کبھی دل کی
یہ دل    تو  کوئی کام    بھی ہونے نہیں دیتا

✍ ذیشان آعظمی

Friday, December 14, 2018

Taarikh me Hyder si shujaa-at nahi dekhi

حضرت علی   کی   تم نے امامت نہیں دیکھی
انصاف سے    بھر پور     خلافت نہیں دیکھی

ہر فیصلہ    کرتے    ہیں  وہ قرآن سے پھر بھی
اندھوں نے علی کی کبھی حکمت نہیں دیکھی

کعبہ میں    ولادت    ہی  تو سجدہ ہے خدا کا
حضرت علی    کی ایسی  عبادت نہیں دیکھی

میداں    میں    بنایا    نبی   نے   مولا علی کو
امت تھی   مگر اندھی کہ صورت نہیں دیکھی

دیکھیں    ہیں  بہت سورما  اس دہر میں لیکن
تاریخ   میں    حیدر سی شجاعت نہیں دیکھی

جس    طرح    نبی   کی کی ہے ذیشان علی نے
ایسی  کبھی    دنیا  میں حفاظت نہیں دیکھی

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, November 29, 2018

Ya Rab dua hai daulat e afkaar bakhsh de


बच्चे हमारे    नाम     करें    मुल्के हिंद का
उनके दिलों को इल्म का  अनवार बख्श दे

इल्मो   हुनर से  अपने जो शम्सो क़मर बने
इस मुल्क  के जवां का वो रफतार बक्श दे

जो   काम   करने   वाली   हो हिंदुस्तान में
या रब    हमें तो   ऐसी वो सरकार बख्श दे

मैं इत्तेहाद   चाहता     हूं     मुल्के   हिंद में
या रब दुआ   है दौलते  अफकार   बख्श दे

हर एक को इत्तेहाद का देना है मुझको दर्स
ज़ीशान  को   सलिक़ये    गुफतार बख्श दे

✍ ज़ीशान आज़मी

پروردگار    ہم کو    وہ    کردار بخش دے
باطل کے    آگے    جرآت   انکار بخش دے

گلشن   ہمارے    ملک    کا پھولا پھلا رہے
رونق  اسے    تو ایسی   ضیابار بخش دے

بچے    ہمارے   نام   کریں    ملکِ   ہند کا
ان کے دلوں    کو علم   کا انوار بخش دے

علم و ہنر    سے اپنے جو شمس و قمر بنے
اس ملک کے جواں کو وہ رفتار بخش دے

جو کام   کرنے والی    ہو    ہندوستان میں
یا رب ہمیں  تو ایسی وہ سرکار بخش دے

میں اتحاد    چاہتا     ہو    ملکِ ہند   میں
یا رب    دعا ہے    دولت   افکار بخش دے

ہر اک  کو اتحاد کا دینا ہے مجھ کو  درس
ذیشان    کو   سلیقہ   گفتار   بخش   دیے

✍ ذیشان آعظمی

Friday, November 23, 2018

Midhat e Muhammad saw me lutf e madh e Jafar hai

Zainabi Mumbai ke misre par meri adna kaawish
Wiladat e Mustafa (SAW) Aur Imame Jafar a.s aap sab ko Mubarak ho.

खुशबू ए   रिसालत से   यह    जहां    मुअत्तर है
परतुए नबुवत      से   हर     ज़मां     मुनव्वर है

यह जो  आसमां   पर है माहे   रबि   अव्वल का
हर ज़माने   में राहत   हर     खुशी का मज़हर है

आप की   विलादत    से आसमां   ज़मीं   महके
निकहत ए रिसालत    से   हर  ज़मां   मुनव्वर है

एक दुरुद मिलजुलकर पढ़े अहले  महफिल अब
आने वाला    दुनिया    में    मुस्तफा    पयंबर है

वह अमीं है सादिक़ है और अज़ीम ख़िलक़त भी
नूर ए मुस्तफाइ    से    कुल    जहां    मुनव्वर है

जानशीने      पैगंबर     भी इमामे     सादिक़ भी
आगही का     दरवाजा    भी     इमाम जाफर है

क्या  मैं    इलमो     हिकमत    का उन    के छेडूं
आला दर्जे   पर    मौला    यह    मेरा   मुक़र्रर है

शाने जाफरे    सादिक़ में  यह    कहना काफी है
जितने फिक़्ह   के मुखिया    है हर  एक टीचर है

तुम हमारी    ज़ीनत की     वजह बनना ए शीओ
क़ौल मेरे     मौला    का    सायेबान     बनकर है

रूशनास    करवाया   हमको    जिस शरीयत से
फिक़ह जाफरी   है   वह इल्मे    दिं का महवर है

करने दीजिए    मुझको    सादिक़ैन  की मिदहत
मिदहते मोहम्मद   में   लुत्फे    मदहे    जाफर है

ए खुदा मुझे    भी एक    घर आता   हो जन्नत में
मदह गो यह    ज़ीशां  भी आज एक सुखनवर है

✍ ज़ीशान आज़मी

خوشبوئے    رسالت    سے   یہ جہاں معطر ہے
پرتو    نبوت     سے     ہر     زماں    منور   ہے

یہ    جو   آسماں    پر    ہے  ماہ ربیع الاول کا
ہر   زمانے میں  راحت اور خوشی کا مظہر ہے

آپ   کی   ولادت   سے آسماں    زمیں    مہکے
نکہت    رسالت     سے     ہر     زماں معطر ہے

اک   درود   مل جل کر پڑھیے   اہل محفل اب
آنے والا    دنیا    میں    مصطفی     پیمبر  ہے

وہ امیں  ہیں صادق ہیں اور عظیم خلقت بھی
نورِ  مصطفائی    سے    کل    جہاں  منور   ہے

جانشین   پیغمبر    بھی     امام   صادق   بھی
آگہی     کا      دروازہ    بھی   امام  جعفر  ہے

کیا میں علم و حکمت کا ان کے تزکرہ چھیڑوں
اعلی    درجے      پر  مولا     یہ مرا   مقرر  ہے

شانِ  جعفرِ  صادق    میں   یہ    کہنا  کافی ہے
جتنے   فقہ کے مکھیا  ہیں، ہر اک  کا  ٹیچر  ہے

تم ہماری    زینت    کی   وجہ   بننا  اے شیعو!
قول  میرے       مولا   کا    سائبان   بن  کر ہے

روشناس   کروایا  ہم   کو   جس   شریعت سے
فقہ جعفری   ہے   وہ ، علم   دیں  کا  محور ہے

کرنے دیجئے   مجھ   کو  صادقین کی   مدحت
مدحتِ   محمد  میں     لطف   مدح  جعفر  ہے

اے خدا مجھے بھی اک گھر عطا  ہو جنت میں
مدح گو یہ   ذیشاں  بھی آج ایک   سخنور  ہے

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, November 20, 2018

Madine ke chiraagoN se shanaasaai zaroori hai

इबादत   के    लिए    ईमाने    यकताई    ज़रूरी है
हर एक इंसां  मे इल्मे  दीं    की    गहराई ज़ुरूरी है

नबी के क़ौल पर  चलना   बड़ा  आसान है लेकिन
कभी पाकीज़गी की और दिल की बिनाई ज़ुरूरी है

अगर अख़लाक़   आला चाहिये   तुम को जमाने में
मोहम्मद की   इताअत   करना भी   भाई ज़ुरूरी है

नबी की जिंदगी पढ़ कर वही  तालीम हासिल कर
हर एक इनसां के अंदर  उन की अच्छाई  ज़ुरूरी है

खुदा का क़ुर्ब हासिल   करना है   तो जाग रातों में
इबादत     के    लिए    ऐ  बंन्दे तन्हाई    ज़ुरूरी है

अगर नूरे हिदायत    मुस्तफा  का    चाहिए तुमको
मदीने के    चिरागों     से      शनासाई     ज़ुरुरी है

लबो को खोल दे तू जान की हरगिज़ न कर परवाह
अगर हक़   के    लिए    ज़ीशान    गोयाई ज़ुरुरी है

✍ ज़ीशान आज़मी

عبادت   کے     لئے    ایمانِ یکتائی    ضروری ہے
ہراک انساں میں علمِ دیں کی گہرائی ضروری ہے

نبی    کے      قول      پر   چلنا بڑا آسان ہے لیکن
کبھی    پاکیزگی  اور  دل کی بینائی ضروری ہے

اگر اخلاق    اعلی    چاہئے    تم    کو زمانے میں
محمد کی    اطاعت  کرنا بھی بھائی ضروری ہے

نبی کی   زندگی    پڑھ  کر وہی تعلیم حاصل کر
ہر اک   انساں کے  اندر ان کی اچھائی ضروری ہے

خدا کا قرب حاصل   کرنا  ہے تو جاگ راتوں میں
عبادت   کے   لئے    اے بندے   تنہائی  ضروری ہے

اگر   نورِ ہدایت    مصطفی     کا    چاہئے  تم کو
مدینے     کے    چراغوں  سے شناسائی ضروری ہے

لبوں کو  کھول دے تو جان کی ہرگز نہ کر پرواہ
اگر   حق کے    لئے    ذیشان   گویائی ضروری ہے

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, November 18, 2018

Dhoop hai qayamat ki saaibaaN nahi koi

ہے یقیں     محبت کا      یہ گماں  نہیں کوئی
عشق ہی    حقیقت     ہے  داستاں نہیں کوئی

اے صنم    ترا جلوہ     ہے مرے     تخیّل میں
تم ہو دل کی دھڑکن میں اور وہاں نہیں کوئی

عاشقی    میں    انساں کو کب  سکون ملتا ہے
دل کے    لاکھ  دشمن ہیں  مہرباں  نہیں کوئی

تیرے حسن    کے چرچے  ہیں اگر جو دنیا میں
مجھ سا بھی   زمانے میں نو جواں نہیں کوئی

برق    نے    جلا   ڈالا    جو   مرا نشیمن   تھا
زیرِ آسماں    میں    ہوں   ہے مکاں نہیں کوئی

تنہا   یہ    سفر     اپنا     دور ہے     بہت منزل
دھوپ ہے    قیامت    کی    سائباں نہیں کوئی

عاشقی    تو    اے ذیشان     نام ہے  جدائی کا
اپنی     آزمائش     کا     امتحاں    نہیں  کوئی

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, November 17, 2018

Mil kar jalaao aag me putla yazeed ka

क्या पूछता    है मुझसे     तू   क़िस्सा  यज़ीद का
फितनागिरी     में हाथ    था      लम्बा यज़ीद का

फतवो     से कर रहा    है जो   गुमराह क़ौम को
बेशक    वही    ज़लील है     नुत्फा    यज़ीद का

फितना    खड़ा करेगा    जो    मिंबर पे   बैठकर
वो  मौलवी    है     चाहने     वाला     यज़ीद का

गुमराह    शायरी     का जो     फानूस   बन गया
उस्ताद वो      कहां    वोह है    चेला  यज़ीद का

जिसको    नहीं    है शायरी    का इम्तियाज़ कुछ
बेशक    वही    ज़लील  है    बच्चा    यज़ीद का

बदबू से    घुटने लगता    था  इंसानियत का दम
गिरता था    जब    जहां भी पसीना   यज़ीद का

किरदार     दाग़दार    था    मलऊन   शख्स का
खुद जान जाओ     कैसा था   शजरा यज़ीद का

हबशि गुलाम    सामने     फिज़्ज़ा के    आ गए
दरबार   में ही हिल     गया    तख्ता   यज़ीद का

देखा जलाल    फिज़्ज़ा    का जैसे   ही वह लईं
बजने लगा    था वैसे      ही बाजा    यज़ीद का

इस कद्र    ज़ुल्मो   जौर     किया   था यज़ीद ने
बैठा     नहीं    था तख़्त     पे बेटा    यज़ीद का

तालीम    अच्छी पाई    थी मोमिन   से इसलिए
ठुकरा     दिया था     बेटे ने तख़्ता    यज़ीद का

क्यों कर सलाम     भेजो ना    मुख्तार को भला
चुन-चुन के    मार डाला    चमचा     यज़ीद का

शैतां के     पैरोकार   थे अजदाद    बद    नसब
कितना    नजिस है    देखिये  शजरा यज़ीद का

वो बदनसीब शख्स था देखिए गुमनाम मर गया
किस को   पता   कहां था   जनाज़ा  यज़ीद का

फरज़नदे फातिमा    की    हुकूमत को देख कर
बेचैन     होगा    कब्र में     मुर्दा       यज़ीद का

गर ईद     तुम  नवी    कि मनाने    को आये हो
मिलकर    जलाओ   आग में पुतला यज़ीद का

बय्यत का     हाथ काट      के   ज़ीशान देखिए
दफना दिया     हुसैन ने    फितना    यज़ीद का

✍ ज़ीशान आज़मी

کیا پوچھتا ہے مجھ سے تو قصہ یزید کا
فتناگری    میں     ہاتھ    تھا لمبا یزید کا

فتووں سے    کر رہا ہے جو گمراہ قوم کو
بے شک    وہی   ذلیل ہے    نطفہ  یزید کا

فتنہ کھڑا کرے    گا  جو منبر پر بیٹھ کر
وہ    مولوی    ہے     چاہنے   والا  یزید کا

گمراہ    شاعری    کا جو   فانوس  بن گیا
استاد وہ   کہاں    وہ    ہے   چیلا یزید کا

جس کو نہیں   ہے شاعری کا  امتیاز کچھ
بے شک   وہی    ذلیل  ہے    بچہ   یزید کا

بدبو سے  گھٹنے  لگتا تھا انسانیت  کا دم
گرتا  تھا جب   جہاں بھی  پسینہ یزید کا

کردار داغدار    تھا  ملعون    شخص   تھا
خود جان    جاؤ کیسا   تھا شجرا یزید کا

حبشی غلام    سامنے     فضہ    کے  آ گئے
دربار میں    ہی    ہل    گیا   تختہ یزید کا

دیکھا جلال   فضہ کا   جیسے ہی وہ لعیں
بجنے    لگا تھا    ویسے    ہی باجا یزید کا

اس   قدر   ظلم و جور   کیا تھا یزید نے
بیٹھا    نہیں    تھا تخت پہ  بیٹا یزید کا

تعلیم اچھی پائی تھی مومن سے اس لئے
ٹھوکرا   دیا   تھا  بیٹے نے تختہ  یزید کا

کیوں کر  سلام بھیجو نہ مختار کو بھلا
چن چن    کے مار  ڈالا تھا چمچا یزید کا

شیطاں کے  پیروکار  تھے اجداد بد نصب
کتنا نجس   ہے    دیکھئے  شجرا یزید کا

وہ بد نصیب    شخص  تھا گمنام مر گیا
کس    کو پتا   کہاں   تھا  جنازہ یزید کا

فرزندِ فاطمہ   کی  حکومت کو دیکھ کر
بے چین    ہوگا    قبر   میں مردہ یزید کا

گر عید    تم نوی   کی   منانے  کو آئے ہو
مل  کر   جلاؤ   آگ    میں    پتلا یزید کا

بیعت    کا ہاتھ  کاٹ کے ذیشان دیکھئے
دفنا     دیا     حسین    نے  فتنہ یزید کا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, November 12, 2018

Mujh ko saanpo se dar nahi lagta

हर जगह पर   शजर  नहीं लगता
हर शजर    में   समर नहीं लगता

घर   के     माहौल  से    परेशां हूं
अब  मुझे घर भी  घर नहीं लगता

खुद  को  मजबूर  जो समझता है
हमको वह  बा खबर नहीं  लगता

शायरी तोहफा है खुदा का फक़त
यह किसी  का  हुनर  नहीं लगता

झूठ हर  बात पर   जो कहता  है
शख्स वह मुतबर      नहीं लगता

मैं तो  जिंदा हूं ज़हर  पी पी  कर
मुझको सांपों से डर  नहीं लगता

सोच   ज़ीशान   शेर  और   कोई
अच्छा मिसरा  अगर  नहीं लगता

✍ ज़ीशान आज़मी

ہر    جگہ    پر   شجر   نہیں لگتا
ہر شجر    میں    ثمر    نہیں لگتا

گھر کے   ماحول سے پریشاں ہوں
اب مجھے گھر بھی گھر نہیں لگتا

خود   کو  مجبور  جو سمجھتا ہے
ہم کو    وہ    با خبر    نہیں   لگتا

شاعری    تحفہ  ہے   خدا  کا فقط
یہ  کسی    کا     ہنر     نہیں  لگتا

جھوٹ    ہر بات    پر جو کہتا ہے
شخص   وہ     معتبر    نہیں  لگتا

میں تو زندہ    ہوں زہر پی پی کر
مجھ کو سانپوں سے ڈر نہیں لگتا

سوچ     ذیشان  شعر    اور  کوئی
اچھا    مصرع    اگر    نہیں   لگتا

✍ ذیشان آعظمی

Dosara naam hai woh bhi meri tanhai ka

मौक़ा जब   हम को   मिलेगा कभी गोयाई का
हम पता देंगे   ऐ वाज़     सुखन    आराई  का

कड़वी इंसान की  फितरत   ही हुआ करती है
ज़ाएक़ा शीरीं   हुआ    करता है    सच्चाई का

ऐ खुदा   हमको   बचाना   के तू  सत्तार भी है
कर नहीं   सकते   हैं हम  सामना रुसवाई का

दाल   रोटी  ही    पे दिन    काट दिये हैं हमने
हम पे जब   बोझ पड़ा   है कभी महंगाई का

बात जब    गोशा    नशीनी की हुआ करती है
दूसरा नाम    है वह     भी   मेरी    तन्हाई का

जब भी अशआर   मेरे लोगों  के लब पर आए
राज़  खुलने   लगा ज़ीशान    की   दानाई का

✍ ज़ीशान आज़मी

موقع جب    ہم کو    ملےگا  کبھی  گویائی کا
ہم پتا     دینگے   اے   واعظ    سخن آرائی کا

کڑوی  انسان    کی    فطرت ہی   ہوا کرتی ہے
ذائقہ  شیریں    ہوا    کرتا    ہے     سچائی  کا

اے خدا    ہم کو   بچانا   کہ  تو ستّار بھی ہے
کر نہیں    سکتے ہیں     ہم  سامنا  رسوائی کا

دال روٹی ہی   پہ    دن کاٹ    دیئے ہیں ہم نے
ہم پہ جب     بوجھ پڑا   ہے کبھی مہنگائی کا

بات جب    گوشہ     نشینی    کی ہوا کرتی ہے
دوسرا    نام    ہے     وہ بھی    مری  تنہائی کا

جب بھی  اشعار مرے    لوگوں   کے لب پر آئے
راز     کھلنے      لگا     ذیشان   کی   دانائی کا

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, November 6, 2018

Khwaab achche dekh kar tabeer se darte rahe

بیکس و مظلوم    کی   تقریر   سے  ڈرتے رہے
جتنے ہیں ظالم   سبھی   تذکیر سے  ڈرتے رہے

ہیں بھرے تاریخ کے صفحات اہل ظلم و جور
عالموں کے   وعظ    کی    تاثیر سے ڈرتے رہے

باتیں   تو  قرآن    کی ہی مانتے  ہیں ہاں مگر
مولوی    کی ہم    لکھی  تفسیر سے ڈرتے رہے

ہم ارادہ کر    چکے   تھے  اک حکومت کا مگر
حوصلہ ہوتے   ہوئے    تقدیر   سے    ڈرتے رہے

نفس امارہ  نہ   بڑھ  کر کے  جکڑ لے پاؤں کو
اس لئے ہم   حسن   کی  زنجیر سے ڈرتے رہے

کیا بتائیں    حال   مایوسی   کا اپنا ہم تمہیں
خواب اچھے    دیکھ    کر تعبیر سے ڈرتے رہے

شاعری ذیشان کچھ توحید کی دشمن بھی ہے
شاعروں کی   اس   لئے     تحریر سے ڈرتے رہے

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, November 4, 2018

Ghol kar pee gaye saare gham eak dum

کھا گئے   بے وفائی میں غم  ایک دم
آنکھیں ہونے   لگی   میری نم ایک دم

کتنی قربانی   اس    کے لئے دے چکے
قصہ   وہ  کیا سنائیں گے ہم ایک دم

پوچھتا ہے کوئی ہم سے تو کہتے ہیں
اس نے ڈھائے ہیں ہم پر ستم ایک دم

بے وفا    کا    بھلا   ذکر ہم  کیا کریں
گھول   کر پی گئے سارے غم ایک دم

مجھ    کو    ذیشان  برباد وہ کر دیا
عاشقی    میں  جو اٹھا قدم ایک دم

✍ ذیشان آعظمی

Dil me apne ulfat e karbobala rakhte hain hum

دل میں اپنے اُلفتِ کرب و بلا رکھتے ہیں ہم

ہم علی والے ہی پائیں گے قیامت میں فلاح
کشتی ئے دینِ خدا کا نا خدا رکھتے ہیں ہم

کوئی کیا بہکا ئے گا دینِ خدا سے دوستوں
قلب میں عشقِ علی کو پارسا رکھتے ہیں ہم

حشر کا ڈر کیا ہمیں، ہم ہیں عزادارِ حسین
ہر گھڑی دل میں نبی کا لاڈلا رکھتے ہیں ہم

✍ ذیشان آعظمی

Har aadmi neta se pareshaan bahut hain

ماں باپ    کا    اولاد    پہ احسان بہت ہیں
افسوس    اسی    بات  سے انجان بہت ہیں

کیوں پڑتا ہے چکر میں کتابوں کی مسلماں
قرآن    ہدایت     کے     لئے    مان بہت ہیں

عاقل ہو اگر دوست  تو جاہل سے رہو دور
جاہل سے    خطاکاری    کا امکان  بہت ہیں

اس شہر    میں    آرام  نہیں چین نہیں ہے
ہر آدمی    نیتا    سے     پرشان     بہت ہیں

در در    پہ    کیا کرتے ہیں فریاد یہاں لوگ
اس دنیا    میں لگتا ہے کے بھگوان بہت ہیں

کیا حال ہوا   دیکھ   تو نظروں کو اٹھا کر
شیشے کے    مکانات   میں   گلدان بہت ہیں

مشکل سے   کرتا ہوں یہاں رب کی عبادت
شیطان میرے    شہر میں  ذیشان بہت ہیں

✍ ذیشان اعظمی

Saturday, November 3, 2018

Maanga tha jis ne haath usey sar diya gaya

بیٹا   ہر    اک  حسین کا حق پر    دیا گیا
اکبر دیا    گیا     کبھی     اصغر    دیا گیا

اسلام     کی    بقا کے   لئے دیکھئے    ذرا
آباد       فاطمہ     کا بھرا   گھر    دیا گیا

دردِ غمِ یتیمی     سکینہ    کو   شام   تک
بعدِ حسین       ہائے      برابر      دیا   گیا

ارمان     تھا     جہاد    کا سجاد    کو مگر
بیمار    کربلا    میں     اسے    کر    دیا گیا

منظر بدل    نہ جائے   مقاتل   کا اس   لئے
عبّاس    کے  جہاد    کو    رد     کر دیا گیا

تخت    یزید     ہل    گیا   دربارِ شام  میں
بیمارِ    کربلا    کو    جو     منبر    دیا گیا

کیوں شرم سار ہوتے نہ کوفہ کے لوگ سب
خطبہ  علی  کے  لہجے    میں بہتر دیا گیا

کوئی نہیں   ہے   شرط عزائے حسین  میں
ہر اک  کو اذن     ماتم     سرور     دیا  گیا

باطل کے منہ پہ گر یہ طمانچہ نہیں تو کیا
مانگا  تھا جس  نے  ہاتھ   اسے  سر دیا گیا

المختصر   یہ   کہتا ہے    ذیشان   کی قلم
دیں    کے   لئے  ہی   زہرہ    کا دلبر دیا گیا

✍ ذیشان اعظمی

बेटा हर    एक हुसैन    का हक़ पर दिया गया
अकबर दिया    गया कभी  असगर दिया गया

इस्लाम की बक़ा    के     लिए     देखिए ज़रा
आबाद फातिमा     का भरा     घर दिया गया

दर्दे ग़मे यतीमी,       सकीना    को शाम तक
बादे     हुसैन      हाय    बराबर     दिया गया

अरमान था जिहाद   का     सज्जाद को मगर
बीमार    करबला   में उसे    कर    दिया गया

मन्ज़र बदल न जाये मक़ातिल   का इस लिए
अब्बास के    जिहाद को   रद कर  दिया गया

तख्ते यज़ीद    हिल गया    दरबारे     शाम मे
बिमारे करबला   को जो   मिम्बर    दिया गया

क्यों शर्मसार    होते    ना   कूफे के लोग सब
खु़त्बा अली के    लहजे में  बेहतर दिया गया

कोई नहीं    है   शर्त       अज़ाए      हुसैन में
हर एक को इज़्ने    मातमे   सरवर दिया गया

बातिल के मुंह पे गर यह  तमाचा नही तो क्या
मांगा था जिस    ने हाथ उसे    सर दिया गया

अल मुख्तसर यह कहता है ज़ीशान की क़लम
दीं के लिए ही ज़हरा   का दिलबर   दिया गया

✍ ज़ीशान आज़मी

Saturday, October 20, 2018

Kya Sakina(s.a) ko aur satana hai

شام    تک    قید   ہو کے جانا ہے
غم     سکینہ    کو  اور اٹھانا ہے

رو نہیں     سکتی     سکینہ   کہ
شمر    کے     پاس     تازیانہ  ہے

صبر     کرنا    سکینہ     ہر  لمحہ
ظلم    کو     دنیا    سے  مٹانا ہے

شمر سہ لونگیں میں  تماچے بھی
کیوں   کے دینِ خدا    بچانا    ہے

کیوں کنیزیں میں مانگتا ہے یزید
کیا     سکینہ    کو   اور ستانا ہے

تھک گئی    جاگ   جاگ   کر بھیا
مجھ    کو  بابا کے  پاس جانا ہے

روئے   ذیشان   اس    تصور  میں
قبر    بی بی    کی  قید  خانہ ہے

✍ ذیشان اعظمی

Monday, October 15, 2018

Kabhi jab haath me ghalib ka deewan lete hain

पुरानी यादों की    जानिब    सभी    रुझान लेते हैं
कभी जब हाथ   में ग़ालिब   का हम दीवान लेते हैं

बड़े चालाक    होते   हैं भरोसा सोच     कर करना
सियासत  करने    वाले ही हमारी    जान   लेते हैं

हिफाजत करती    है ईमान   का भी दोस्ती अच्छी
बुरे गर दोस्त    हो अपने तो    वह ईमान    लेते हैं

हिदायत के लिए    क्यों तुम  किताबें ढूंढते फिरते
हिदायत पाने    वाले     हाथों में    कुरान   लेते हैं

तुम्हारे मक्र  पर खामोश   रहना उनकी   आदत है
मुनाफिक़ की हकीक़त क्या है मोमिन जान लेते हैं

बदलकर चेहरा धोके बाज़ जितना  सामने आ जा
हुनर रखते   हैं जो     इंसान वह    पहचान लेते हैं

ना कुछ ख़ौफ रखते हैं न कुछ डरते   हैं दुनिया से
खुदा को अपना जो जीशान सब कुछ मान लेते हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

پرانی   یادوں    کی جانب   سبھی رجحان لیتے ہیں
کبھی   جب ہاتھ   میں غالب  کا ہم دیوان لیتے ہیں

بڑے   چالاک    ہوتے  ہیں    بھروسہ   سوچ کر کرنا
سیاست    کرنے   والے    ہی    ہماری   جان لیتے ہیں

حفاظت   کرتی   ہے    ایمان  کا بھی دوستی اچھی
برے گر    دوست     ہو اپنے    تو وہ ایمان لیتے ہیں

ہدایت    کے   لئے کیوں   تم کتابیں  ڈھونڈتے پھرتے
ہدایت   پانے   والے    ہاتھوں    میں   قرآن لیتے ہیں

تمہارے مکر   پر خاموش    رہنا ان    کی عادت   ہے
منافق کی    حقیقت     کیا ہے   مومن جان لیتے ہیں

بدل کر    چہرا     دھوکے    باز    جتنا     سامنے آجا
ہنر رکھتے ہیں     جو انسان     وہ    پہچان لیتے ہیں

نہ کچھ خوف رکھتے ہیں نہ کچھ ڈرتے ہیں دنیا سے
خدا کو اپنا جو   ذیشان  سب  کچھ    مان لیتے ہیں

✍ ذیشان اعظمی