Tuesday, January 30, 2018

Sab ke sab bhool gaye harfe sadaqat likhna

काम ख़ालिक़ का है हर शख्स की क़िस्मत लिखना
दौलतो रिज़्क़   कभी   इज़्ज़तो   ज़िल्लत  लिखना

ए खुदा    जीते है  मुश्किल    से   तेरी    दुनिया में
नेक इंसान     की    क़िस्मत    में तू जन्नत लिखना

हमको    नफरत ही मिली    जिंदगी   भर लोगों से
दिल के अवराक़ पे, मुश्किल   है मोहब्बत लिखना

किसकी औक़ात    है दुनिया    में लगाए    क़ीमत
यह तो  मुमकिन ही नहीं इश्क़ की  क़ीमत लीखना

आयतें   तेरी मैं    पढ़ता हूं    शब-ओ-रोज़    यहां
मेरी क़िस्मत    में तू महशर   में शफाअत लिखना

जिंदगी फर्श   पे कुछ    इतनी     गिरा    गुज़री है
सब के   सब भूल    गए हरफे सदाक़त   लिखना

कौल सच्चा     है यह     ज़ीशान    मगर  याद रहे
जब भी क़िरतास पे लिखना  तो हक़ीक़त लिखना

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز کا 23 واں عالمی آن لائن
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

کام خالق    کا ہے   ہر شخص کی قسمت لکھنا
دولت و رزق    کبھی    عزت   و    زلّت   لکھنا

اے خدا     جیتے ہے   مشکل سے تری دنیا میں
نیک انسان  کی  قسمت میں   تو    جنّت  لکھنا

ہم کو    نفرت ہی    ملی زندگی   بھر لوگو سے
دل کے    اوراق     پہ   مشکل  ہے محبت لکھنا

کس   کی اوقات    ہے   دنیا   میں لگائے قیمت
یہ تو   ممکن    ہی نہیں عشق کی قیمت لکھنا

آیتیں   تیری   میں پڑھتا ہوں شب و روز یہاں
میری قسمت میں تو محشر میں شفاعت لکھنا

زندگی    فرش    پہ     کچھ  اتنی گرا گزری ہے
سب کے   سب بھول   گئے حرف صداقت لکھنا

قول سچّا   ہے   یہ     ذیشان     مگر    یاد  رہے
جب بھی    قرطاس   پہ لکھنا تو حقیقت لکھنا

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, January 28, 2018

AMF team mahnat karne wali hai

यह सच्चाई के     पथ पर   चलने वाली है
AMF टीम     मेहनत     करने    वाली है

खड़ी है    यह हर     एक  तूफान के आगे
हमारी    टीम क़ायम      रहने      वाली है

भ्रष्टाचार     को बिल्कुल      मिटा      देगी
सबक़     ईमान     का यह     देने वाली है

सभी    हिंदुस्तानी     उसके      भाई     हैं
गले हर    आदमी से    लगने    वाली    है

हर एक मज़लुम के सुख दुख की साथी है
किसी पर    ज़ुल्म क्योंकर  सहने वाली है

मदद     और रहबरी     तालीम कि बच्चों
AMF    से      हमेशा    मिलने वाली  है

हमारी    टीम     का सानी     नहीं    कोई
यह मालोनी     में अव्वल रहने    वाली है

AMF    टीम     में ज़ीशान     वहदत  है
मिटाने    से नहीं     यह मिटने     वाली है

✍ ज़ीशान आज़मी

یہ   سچائی  کے  پت  پر چلنے والی ہے
اے ایم اف    ٹیم محنت  کرنے والی ہے

کھڑی    ہے   یہ  ہر   اک   توفان کے آگے
ہماری      ٹیم     قائم    رہنے    والی ہے

بھرشٹاچار    کو       بلکل      مٹادےگی
سبق     ایمان    کا یہ    دینے    والی ہے

سبھی    ہندوستانی    اس کے بھائی ہیں
گلے     ہر آدمی     سے       لگنے والی ہے

ہراک مظلوم کے  سکھ دکھ کی ساتھی ہے
کسی      پر ظلم    کیوں کر  سہنے والی ہے

مدد  اور   رہبری     تعلیم   کی   بچوں
اے ایم اف   سے   ہمیشہ ملنے والی ہے

ہماری   ٹیم    کا  ثانی    نہیں     کوئی
یہ  مالونی    میں اول   رہنے   والی ہے

اے سیم اف ٹیم میں ذیشان وحدت ہے
مٹانے   سے    نہیں    یہ  مٹنے والی ہے

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, January 24, 2018

Aabad rahe amn ka gulzaar watan me

अब खत्म करो   आपसी    तकरार वतन में
ज़ाहिर करो बस प्यार   का इज़हार वतन में

यह अह्द करे दिल से कि अपनों को संवारे
ढूंढे से भी मिल  पाए   ना बदकार  वतन में

हर शक्स को अब काम मिले काम हो ऐसा
बैठा   न रहे    कोई    भी बेकार    वतन में

हम साफ रखें     देश हमारा    यह वतन है
ताकि न मरे       कोई भी    बीमार वतन में

रिशवत से भी हो पाक यह अब देश हमारा
हर शक्स का    बेदाग़ हो किरदार  वतन में

नेताजी अगर काम     को ईमां    से  करेंग
महंगाई की गिर जाएगी    दीवार  वतन में

आओ सभी करते हैं दुआ मिलके खुदा से
आबाद रहे   अम्न का    गुलज़ार वतन में

पूछो ना मुझे लेन   का और देन का सौदा
ज़ीशान बहुत  काला है   व्यापार वतन में

✍ ज़ीशान आज़मी

اب   ختم  کرو    آپسی     تکرار     وطن میں
ظاہر    کرو    بس    پیار   کا اظہار وطن میں

یہ عہد   کریں دل   سے کہ اپنوں کو سنوارے
ڈھونڈے سے بھی مل پائے نہ بدکار وطن میں

ہر شخص   کو اب    کام    ملے    کام ہو ایسا
بیٹھا نہ رہے    کوئی    بھی  بیکار وطن میں

ہم صاف    رکھیں   دیس    ہمارا یہ وطن ہے
تاکہ نہ مرے   کوئی      بھی بیمار وطن میں

رشوت سے بھی ہو پاک    یہ   اب دیس ہمارا
ہر شخص  کا   بے داغ    ہو   کردار وطن میں

نیتاجی    اگر   کام    کو     ایماں سے کرینگے
مہنگائی کی گر   جائیگی  دیوار    وطن میں

آؤ   سبھی کرتے     ہیں   دعا مل کے خدا سے
آباد    رہے     امن     کا     گلزار     وطن میں

پوچھو    نہ مجھے   لین کا اور دین کا سودا
ذیشان   بہت    کالا ہے    بیوپار     وطن میں

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, January 23, 2018

Khud se sawaal karte hai har baar kya karein

मसनद पे सारे    बैठे हैं बेकार    क्या करें
करते हैं   रहनुमाई का    इज़हार क्या करें

इल्मो हुनर की अब कोई इज़्ज़त नहीं रही
बैठे हुए   हैं घर में जो   फनकार क्या करें

झांसे में  उनके     आते    हैं ईमानदार भी
झूठों के     आगे कोई   वफादार क्या करें

मजबूर हो    के सुनता है वह इल्तेजा मेरी
एहसां तले   दबा हो    तो इंकार  क्या करें

हर वक्त    बेवकूफ    ही कहते   रहे अगर
मजलिस में आने वाले समझदार क्या करें

कोई    जवाब है    नहीं मेरे    सवाल  का
खुद से सवाल   करते हैं हर बार क्या करें

ज़ीशान जब खुदा की मदद साथ साथ हो
जीना हमारा   मोअतरिज़ दुश्वार  क्या करें

✍ ज़ीशान आज़मी

ہفت روزہ فیس بُک ٹائمز کے ۲۲ وییں عالمی
آنلاین فی ای البدیہہ طرحی مشاعرے بتاریخ
۲۲ جنوری ۲۰۱۷ کے لئے میری طبع آزمائی

مسند پہ    سارے بیٹھے   ہیں بیکار کیا کریں
کرتے ہیں    رہنمائی     کا   اظہار     کیا کریں

علم و ہنر کی     اب کوئی      عزت نہیں رہی
بیٹھیں ہوئے ہیں گھر میں جو فنکار کیا کریں

جھانسے   میں ان کے   آتے ہیں ایمان دار بھی
جھوٹوں کے     آگے کوئی    وفادار   کیا کریں

مجبور ہو     کے سنتا     ہے     وہ   التجا مری
احساں     تلے     دبا ہو    تو     انکار کیا کریں

ہر وقت      بے وقوف     ہی کہتے      رہے اگر
مجلس     میں آنے    والے سمجھدار کیا کریں

کوئی    جواب     ہے نہیں    میرے   سوال کا
خود   سے    سوال    کرتے ہیں ہر بار کیا کریں

ذیشان    جب    خدا کی   مدد ساتھ ساتھ ہو
جینا    ہمارا  معترض     دشوار      کیا  کریں

✍ ذیشان آعظمی

Kab se ek dasht ke gubaar me hai

बिलयक़ीं    मौत के   हिसार में है
जिंदगी किस के   अख्तियार में है

बस    क़यामत   में होगा फैसला
अब  अदालत कहा   दियार में है

देख चर्चा     मेरी   शुजाअत का
कब से    दश्त के      गु़बार में है

सच किताबों में रह    गए लेकिन
झूठ    सारे ही      इश्तेहार   में है

कब उठेगा    ज़मीर   सोया हुआ
आंखें    ज़ीशान    इंतज़ार   में है

✍ ज़ीशान आज़मी

سائبان ہفتہ واری فی البدیہہ طرحی
مشاعرہ میں میری کاوش:

بالیقیں    موت کے حصار میں ہے
زندگی    کس  کے اختیار میں ہے

بس    قیامت    میں  فیصلہ ہوگا
اب عدالت    کہاں    دیار  میں ہے

دیکھ   چرچا مری      شجاعت کا
کب سے اک دشت کے غبار میں ہے

سچ   کتابوں   میں    رہ گئے لیکن
جھوٹ سارے   ہی اشتہار میں ہے

کب    اٹھےگا     ضمیر   سویا  ہوا
آنکھیں    ذیشان    انتظار میں ہے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, January 22, 2018

Kabhi kabhar shikari shikaar hota hai

بزمِ سخنوراں کی 103 ویں ہفتہ واری
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

सरो पे जिसके गुनाहों का बार होता है
उसे तो जीने का ही बस कुमार होता है
سرو پہ    جس کے گناہوں   کا بار ہوتا ہے
اسے تو    جینے کا ہی   بس خمار ہوتا ہے

खुदा का शुक्र मैं जब तक अदा नहीं करता
सुकून जाता है दिल बेक़रार होता है
خدا کا    شکر میں جب تک ادا نہیں کرتا
سکون    جاتا    ہے دل    بے  قرار ہوتا ہے

लिखा जो करता है अशआर हक़ शनासी का
कसम खुदा की वह शायर शुमार होता है
لکھا جو    کرتا ہے اشعار  حق شناسی کا
قسم خدا    کی وہ    شاعر  شمار ہوتا ہے

नए ज़माने की सूरत तो देखिए साहब
कभी कभार शिकारी शिकार होता है
نئے زمانے کی   صورت تو دیکھئے صاحب
کبھی کبھار     شکاری     شکار     ہوتا ہے

मुसीबतों में जो काम आए हर घड़ी मेरे
वही तो अस्ल में ज़ीशान यार होता है
مصیبتوں میں جو کام آئے ہر گھڑی میرے
وہی تو    اصل میں     ذیشان  یار ہوتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, January 16, 2018

Bana di majliso ki kaainaat Zainab (sa) ne

बचाया दिन को    दिन और   रात ज़ैनब ने
उठाई    कर्बला में    मुश्किलात   ज़ैनब ने

कभी ना छोड़ना दामन नमाज का    लोगों
पढ़ी है    रंजो अलम     में सलात ज़ैनब ने

अली के लहजे में दरबारे    शाम में आकर
कि इनकेशाफ यज़ीदों कि ज़ात   ज़ैनब ने

ज़माने वालों को मेंबर से   आज बतलाओ
जहां-जहां जो कीं है हक़ की बात ज़ैनब ने

कोई यज़ीद सा    ज़ालिम न  र उठाएगा
सितमगरों को दी है    ऐसी मात    ज़ैनब ने

बीछा के फरशे अज़ा देखिए यज़ीद के घर
बना दी मजलिसों की   कायनात ज़ैनब ने

यही     अक़ीदा है ज़ीशान    का हमेशा से
अता की फरशे   अज़ा को हयात ज़ैनब ने

✍ ज़ीशान आज़मी

بچایا دین     کو دن    اور       رات زینب نے
اٹھائی     کربلا     میں     مشکلات زینب نے

کبھی     نہ چھوڑنا     دامن    نماز  کا لوگو
پڑھی ہیں     رنج و الم میں صلات زینب نے

علی کی     لہجے   میں   دربارِ شام میں آکر
کی      انکشاف    یزیدوں  کی ذات زینب نے

زمانے والوں   کو منبر     سے      آج    بتلاؤ
جہاں جہاں جو کی ہے حق کی بات زینب نے

کوئی     یزید    سا     ظالم نہ   سر اٹھائےگا
ستم گروں کو دی     ہے ایسی مات زینب نے

بچھا    کے فرشِ عزا     دیکھئے یزید کے گھر
بنادی مجلسوں     کی      کائنات     زینب نے

یہی    عقیدہ       ہے ذیشان     کا ہمیشہ سے
عطا کی        فرشِ عزا     کو حیات زینب نے

✍ ذیشان آعظمی

Bana di majliso ki kaainaat Zainab (sa) ne

बचाया दिन को     हर एक   रात ज़ैनब ने
उठाई    कर्बला में    मुश्किलात   ज़ैनब ने

कभी ना छोड़ना दामन नमाज का हरगिज़
पढ़ी है    रंजो अलम     में सलात ज़ैनब ने

अली के लहजे में दरबारे    शाम में आकर
कि इनकेशाफ यज़ीदों कि ज़ात   ज़ैनब ने

ज़माने वालों को मेंबर से   आज बतलाओ
जहां-जहां जो कीं है हक़ की बात ज़ैनब ने

कोई यज़ीद सा    ज़ालिम न  कर उठाएगा
दिया   ज़ालिमों को   ऐसी मात    ज़ैनब ने

बीछा के फरशे अज़ा देखिए यज़ीद के घर
बना दी मजलिसों की   कायनात ज़ैनब ने

यही अज़ल    से है ज़ीशान    का अक़ीदा
अता की फरशे   अज़ा को हयात ज़ैनब ने

✍ ज़ीशान आज़मी

بچایا دین     کو ہر     ایک      رات زینب نے
اٹھائی     کربلا     میں     مشکلات زینب نے

کبھی     نہ چھوڑنا     دامن    نماز  کا ہر گز
پڑھی ہیں     رنج و الم میں صلات زینب نے

علی کی     لہجے   میں   دربارِ شام میں آکر
کی      انکشاف    یزیدوں  کی ذات زینب نے

زمانے والوں   کو منبر     سے      آج    بتلاؤ
جہاں جہاں جو کی ہے حق کی بات زینب نے

کوئی     یزید    سا     ظالم نہ   سر اٹھائےگا
دیا ہے      ظالموں     کو ایسی مات زینب نے

بچھا    کے فرشِ عزا     دیکھئے یزید کے گھر
بنادی مجلسوں     کی      کائنات     زینب نے

یہی      ازل      سے    ہے ذیشان     کا عقیدہ
عطا کی        فرشِ عزا     کو حیات زینب نے

✍ ذیشان آعظمی

Hum se izhaar e madduaa na huwa

काम सड़कों पर वहशियाना हुआ
फेरी वालों का  सब ठीकाना हुआ

यह हुकूमत की काहिली के सबब
कब्ज़ा  सड़कों पे  ग़ासेबाना हुआ

हर    तरफ   गंदगी   पड़ी है यहां
मेरा नापाक    आशियाना   हुआ

कश्ती   पर था यक़ीन,   डूब गई
पासबां इस   का नाखुद ना हुआ

इल्म ही    सच्चा    साथी है तेरा
मरने के बाद    भी जुदा ना हुआ

रह गए   सब  अधूरे    काम मगर
हम से  इज़हारे मद्दुआ    ना हुआ

जब कभी दर्दे दिल की बात लिखी
शेर   ज़ीशान    का    यगाना हुआ

✍ ज़ीशान आज़मी

کام   سڑکوں    پہ وحشیانہ ہوا
پھیری والوں کا سب ٹھکانہ ہوا

یہ حکومت  کی کاہلی کے سبب
قبضہ   سڑکوں پہ غاصبانہ  ہوا

ہر طرف    گندگی  پڑی ہے یہاں
میرا       ناپاک     آشیانہ     ہوا

کشتی   پر تھا  یقین، ڈوب گئی
پاسباں    اس کا   نا خدا  نہ ہوا

علم ہی   سچا   ساتھی    ہے ترا
مرنے   کے   بعد بھی جدا نہ ہوا

رہ گئے   سب ادھورے   کام مگر
ہم    سے    اظہارِ مدعا     نہ ہوا

جب کبھی دردِ دل کی بات لکھی
شعر     ذیشان    کا     یگانہ  ہوا

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, January 14, 2018

Ajsaam kaise kaise qabaon me rakh diye

इमान    कैसे-कैसे    खुदाओ    मे रख दिए
इंसां ने  अपनी  आखेरत दाओं में  रख दिए

किस तरह  इत्तेहाद का परचम  उठेगा अब
लोगों ने अपना   नफ्स अनाओ में रख दिए

कैसे बुलंद होगा    सर दुनिया    में आपका
हसती को जब अमीरों के पांव में राख दिए

इंसाफ आज    आप हुकूमत     का देखिये
अजसाम कैसे-कैसे     क़बाऔ में रख दिए

ज़ीशान हमको डर   नहीं है   इम्तिहान का
मां-बाप ने   हमें तो    दुवाओं में   रख दिए
✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ سخن کے تحت 221 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

ایمان کیسے کیسے    خداؤں    میں رکھ دیئے
انساں نے  اپنی  آخرت داؤں   میں   رکھ دیئے

کس طرح     اتحاد     کا    پرچم    اٹھےگا اب
لوگو نے     اپنا نفس    اناؤں    میں رکھ دیئے

کیسے     بلند ہوگا    سر،    دنیا میں    آپ  کا
ہستی کو جب امیروں کے پاؤں میں رکھ دیئے

انصاف     آج   آپ     حکومت     کا    دیکھئے
اجسام    کیسے کیسے     قباؤں میں رکھ دیئے

ذیشان     ہم کو     ڈر    نہیں    ہے امتحان کا
ماں باپ نے    ہمیں تو   دعاوں میں رکھ دیئے

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, January 13, 2018

Dar o Diwaar chup saadhe huwe hain


नई सरकार    चुप    साधे      हुए हैं
यह सब    बेकार चुप   साधे   हुए हैं

सितम ढाते   फिरें गलियों  मोहल्लों
सरे     दरबार चुप   साधे   हुए    हैं

जिन्हें नुक़सा   का  अपने लगा डर
वही अखबार     चुप    सिधे हुए हैं

जुबां पर    होंगे सब के,    बाद मेरे
अभी अशआर    चुप साधे   हुए हैं

घरों    मे होती     हैं   मनसूबा  बंदी
दरो   दीवार   चुप    साधे     हुए हैं

तफक़्क़ुर सिर्फ एक ज़ीशान का है
सभी   अफकार   चुप  साधे हुए हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

سائبان آنلائن ہفتہ وار فی البدیہہ
طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

نئی سرکار  چپ   سادھے  ہوئے ہیں
یہ سب بےکارچپ سادھے  ہوئے ہیں

ستم ڈھاتے    پھرے گلیوں محلوں
سرِ دربار چپ    سادھے    ہوئے ہیں

جنھیں  نقصان  کا    اپنے   لگا ڈر
وہی اخبار چپ   سادھے  ہوئے ہیں

زباں پر ہونگے   سب کے، بعد مرے
ابھی اشعار چپ  سادھے ہوئے ہیں

گھروں میں ہوتی ہے منصوبہ بندی
در و دیوار  چپ   سادھے ہوئے ہیں

تفکر    صرف    اک    ذیشان کا ہے
سبھی افکار چپ سادھے ہوئے ہیں

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, January 10, 2018

Aashiq e misam e tammar se bach kar rahna

खामेनाई के     हर एक     वार से    बचकर रहना
रहनुमा    हक़ का   है गुफतार    से बचकर रहना

आज ज़ालिम     की हिमायत     में लिखे जाते हैं
मोमिनो हर     बीके    अखबार से बचकर   रहना

बेच देते हैं     यह ईमान     भी      पैसों के   लिए
अपनी ही     क़ौम के    गद्दार     से बचकर रहना

ज़ालिमों पर   यह     बड़े सख्त      हुआ करते हैं
लशकरे   हैदरे    क़र्रार     से     बचकर     रहना

काट     सकते हैं गला हक़    की ज़ुबां से बातिल
आशिक़े     मिसमे तम्मार    से   बचकर    रहना

पीठ पर वार न  लग जाए     मुनाफिक़  का तुम्हें
तेज़ ज़ीशान     वह    तलवार से    बचकर रहना

✍ ज़ीशान आज़मी

خامنہ ئی    کے ہراک     وار سے  بچ کے رہنا
رہنما حق کا     ہے    گفتار    سے بچ کے رہنا

آج ظالم کی حمایت    میں  لکھے جاتے ہیں
مومنوں ہر     بکے اخبار    سے    بچ کر رہنا

بیچ دیتے ہیں یہ ایمان بھی پیسوں کے لئے
اپنی ہی     قوم کے     غدار سے  بچ کر رہنا

ظالموں     پر یہ   بڑے سخت ہوا کرتے ہیں
لشکرِ حدرِ        قرار سے       بچ  کر     رہنا

کاٹ سکتے  ہیں گلا حق کی زباں سے باطل
عاشقِ میثمِ   تمّار    سے    بچ    کر      رہنا

پیٹ پر وار    نہ لگ جائے   منافق کا تمھیں
تیز   ذیشان    وہ   تلوار    سے   بچ کر رہنا

✍ ذیشان آعظمی

Aashiq e misam e tammar se bach kar rahna

खामेनाई के     हर एक     वार से    बचकर रहना
रहनुमा    हक़ का   है गुफतार    से बचकर रहना

आज ज़ालिम     की हिमायत     में लिखे जाते हैं
मोमिनो हर     बीके    अखबार से बचकर   रहना

बेच देते हैं     यह ईमान     भी      पैसों के   लिए
अपनी ही     क़ौम के    गद्दार     से बचकर रहना

ज़ालिमों पर   यह     बड़े सख्त      हुआ करते हैं
लशकरे   हैदरे    क़र्रार     से     बचकर     रहना

काट     सकते हैं गला हक़    की ज़ुबां से बातिल
आशिक़े     मिसमे तम्मार    से   बचकर    रहना

पीठ पर वार न  लग जाए     मुनाफिक़  का तुम्हें
तेज़ ज़ीशान     वह    तलवार से    बचकर रहना

✍ ज़ीशान आज़मी

خامنہ ئی    کے ہراک     وار سے  بچ کے رہنا
رہنما حق کا     ہے    گفتار    سے بچ کے رہنا

آج ظالم کی حمایت    میں  لکھے جاتے ہیں
مومنوں ہر     بکے اخبار    سے    بچ کر رہنا

بیچ دیتے ہیں یہ ایمان بھی پیسوں کے لئے
اپنی ہی     قوم کے     غدار سے  بچ کر رہنا

ظالموں     پر یہ   بڑے سخت ہوا کرتے ہیں
لشکرِ حدرِ        قرار سے       بچ  کر     رہنا

کاٹ سکتے  ہیں گلا حق کی زباں سے باطل
عاشقِ میثمِ   تمّار    سے    بچ    کر      رہنا

پیٹ پر وار    نہ لگ جائے   منافق کا تمھیں
تیز   ذیشان    وہ   تلوار    سے   بچ کر رہنا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, January 8, 2018

Jab ghar se nikalte hain, Hairaan nikalte hain

इस मौत    की नगरी   में इंसान    निकलते हैं
मुंबई के    मुसाफिर हैं  अनजान निकलते  हैं

इस शहर में   चारों जानीब मौत का कबज़ा है
बे खौफ    मगर घर    से नादान   निकलते हैं

बीमारी     मरते है      मरते    हैं    ट्राफिक में
जीने को    यहां फिर भी  अरमान निकलते हैं

टूटी हुई    सड़को   पर जब    हादसा होता है
दुनिया   से कई  इन्सां   बेजान    निकलते  हैं

सरकार नहीं सुनती हम सब की शिकायत को
क्या    हफ्ता वसूली   के इमकान निकलते हैं

मै देखता हूं    अकसर   लोगों   की  परेशानी
जब   घर से   निकलते हैं,   हैरान निकलते हैं

ज़ालिम के मज़ालिम से लड़ने के लिए घर से
कुछ लोग ही मुश्किल से ज़ीशान  निकलते हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز کا 20 واں عالمی آن لائن
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

اس موت   کی   نگری میں   انسان نکلتے ہیں
ممبئی   کے    مسافر   ہیں    انجان نکلتے ہیں

اس شہر میں چاروں جانب موت کا قبضہ ہے
بے خوف    مگر گھر    سے    نادان   نکلتےہیں

بیماری   میں مرتے  ہیں  مرتے ہیں ٹرافک میں
جینے کو     یہاں پھر   بھی ارمان   نکلتے ہیں

ٹوٹی ہوئی   سڑکوں    پر جب  حادثہ  ہوتا ہے
دنیا سے    کئی انساں    بے جان    نکلتے   ہیں

سرکار نہیں سنتی ہے ہم سب  کی شکایت  کو
کیا   ہفتہ    وصولی کے     امکان     نکلتے ہیں

میں دیکھتا    ہوں   اکثر   لوگو   کی   پرشانی
جب گھر    سے   نکلتے  ہیں حیران نکلتے  ہیں

ظالم کے    مظالم   سے لڑنے    کے  لئے گھر سے
کچھ    لوگ   ہی مشکل سے ذیشان  نکلتے ہیں

✍ ذیشان آعظمی

Mera qabila samandar hai, zaat darya hai

खुदा का बंदा  हूं मैं, मेरा   क़िबला काबा  है
मैं हम्द उसकी ही करता हूं कि वह अच्छा है

मैं मौज   हूं   कि मुसलसल   मेरी  रवानी है
मेरा   क़बीला   समंदर है,    ज़ात  दरिया है

यही वह ज़ात है जिसको खुदा ने बन्दा कहा
ज़माना देख! मोहम्मद(स)  का नाम ऊंचा है

खयाल जिंदगी    भर पाको साफ रखना तू
के कामयाब है   वह जिसने अच्छा सोचा है

खुलूसे दिल से किया  नेक काम जिसने भी
उसी का देखिये    ज़ीशान आज   चरचा है

✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ سخن کے تحت 220 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

خدا کا بندہ   ہوں   میں،    میرا  قبلہ کعبہ ہے
میں حمد اس کی ہی کرتا ہوں کہ وہ اچھا ہے

میں   موج    ہوں   کہ مسلسل مری روانی ہے
مرا     قبیلہ    سمندر ہے،      ذات    دریا    ہے

یہی وہ    ذات   ہے جس  کو خدا نے بندہ کہا
زمانہ     دیکھ    محمد(ص)   کا نام اونچا ہے

خیال زندگی    بھر    پاک و صاف    رکھنا تو
کہ   کامیاب ہے   وہ   جس نے اچھا سوچا ہے

خلوصِ دل  سے   کِیا نیک    کام جس نے بھی
اسی کا    دیکھئے     ذیشان    آج    چرچا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, January 7, 2018

Mai kya kar raha hoo Woh kya kar rahe hain

हमारे    लिए    जो दुआ     कर   रहे हैं
वही    लोग    हम से    वफा कर  रहे हैं

अगर वक्त     बर्बाद    करते    हैं  बच्चे
तो जानो   जवानी    फना कर     रहे हैं

यह फिरक़ो की  दीवार  हतमी उठाकर
मुसलमां  को   दुश्मन   जुदा  कर रहे हैं

मैं करता अमल हूं वह करते हैं बकबक
मै क्या कर रहा   हूं वह क्या  कर रहे हैं

मुझे पूछना   है यह    ज़ीशान    सबसे
खुदा के लिए    आप    क्या कर  रहें हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

دیا 228 ویں عالمی آن لائن فی البدیہہ
طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

ہمارے    لئے    جو     دعا کر    رہے ہیں
وہی     لوگ     ہم   سے وفا کر رہے ہیں

اگر    وقت    برباد     کرتے    ہیں  بچے
تو    جانو    جوانی    فنا   کر  رہے  ہیں

یہ   فرقوں   کی   دیوار   حتمی  اٹھاکر
مسلماں    کو    دشمن  جدا کر  رہے ہیں

میں کرتا عمل ہوں وہ  کرتے ہیں بک بک
میں کیا  کر رہا ہوں وہ  کیا  کر رہے ہیں

مجھے    پوچھنا ہے یہ  ذیشان سب سے
خدا    کے    لئے آپ    کیا    کر  رہے ہیں

✍ ذیشان آعظمی