Monday, January 8, 2018

Jab ghar se nikalte hain, Hairaan nikalte hain

इस मौत    की नगरी   में इंसान    निकलते हैं
मुंबई के    मुसाफिर हैं  अनजान निकलते  हैं

इस शहर में   चारों जानीब मौत का कबज़ा है
बे खौफ    मगर घर    से नादान   निकलते हैं

बीमारी     मरते है      मरते    हैं    ट्राफिक में
जीने को    यहां फिर भी  अरमान निकलते हैं

टूटी हुई    सड़को   पर जब    हादसा होता है
दुनिया   से कई  इन्सां   बेजान    निकलते  हैं

सरकार नहीं सुनती हम सब की शिकायत को
क्या    हफ्ता वसूली   के इमकान निकलते हैं

मै देखता हूं    अकसर   लोगों   की  परेशानी
जब   घर से   निकलते हैं,   हैरान निकलते हैं

ज़ालिम के मज़ालिम से लड़ने के लिए घर से
कुछ लोग ही मुश्किल से ज़ीशान  निकलते हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز کا 20 واں عالمی آن لائن
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

اس موت   کی   نگری میں   انسان نکلتے ہیں
ممبئی   کے    مسافر   ہیں    انجان نکلتے ہیں

اس شہر میں چاروں جانب موت کا قبضہ ہے
بے خوف    مگر گھر    سے    نادان   نکلتےہیں

بیماری   میں مرتے  ہیں  مرتے ہیں ٹرافک میں
جینے کو     یہاں پھر   بھی ارمان   نکلتے ہیں

ٹوٹی ہوئی   سڑکوں    پر جب  حادثہ  ہوتا ہے
دنیا سے    کئی انساں    بے جان    نکلتے   ہیں

سرکار نہیں سنتی ہے ہم سب  کی شکایت  کو
کیا   ہفتہ    وصولی کے     امکان     نکلتے ہیں

میں دیکھتا    ہوں   اکثر   لوگو   کی   پرشانی
جب گھر    سے   نکلتے  ہیں حیران نکلتے  ہیں

ظالم کے    مظالم   سے لڑنے    کے  لئے گھر سے
کچھ    لوگ   ہی مشکل سے ذیشان  نکلتے ہیں

✍ ذیشان آعظمی

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