Monday, January 22, 2018

Kabhi kabhar shikari shikaar hota hai

بزمِ سخنوراں کی 103 ویں ہفتہ واری
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

सरो पे जिसके गुनाहों का बार होता है
उसे तो जीने का ही बस कुमार होता है
سرو پہ    جس کے گناہوں   کا بار ہوتا ہے
اسے تو    جینے کا ہی   بس خمار ہوتا ہے

खुदा का शुक्र मैं जब तक अदा नहीं करता
सुकून जाता है दिल बेक़रार होता है
خدا کا    شکر میں جب تک ادا نہیں کرتا
سکون    جاتا    ہے دل    بے  قرار ہوتا ہے

लिखा जो करता है अशआर हक़ शनासी का
कसम खुदा की वह शायर शुमार होता है
لکھا جو    کرتا ہے اشعار  حق شناسی کا
قسم خدا    کی وہ    شاعر  شمار ہوتا ہے

नए ज़माने की सूरत तो देखिए साहब
कभी कभार शिकारी शिकार होता है
نئے زمانے کی   صورت تو دیکھئے صاحب
کبھی کبھار     شکاری     شکار     ہوتا ہے

मुसीबतों में जो काम आए हर घड़ी मेरे
वही तो अस्ल में ज़ीशान यार होता है
مصیبتوں میں جو کام آئے ہر گھڑی میرے
وہی تو    اصل میں     ذیشان  یار ہوتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

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