Tuesday, February 27, 2018

Chaudhavi Mehfil hai yeh bar aasatane Fatema(sa)

सबसे आला    है जहां में   गुलसिताने  फातिमा
नूरे हक़    से    जगमगाता  है    जहाने फातिमा
मादरे हसनैन    का    कोई    ममासिल  ही नहीं
हर ज़माने    में है यह    बेमिस्ल   शाने फातिमा
दर्जी़ बनके   आता है    रिज़वाने जन्नत भी यहां
होता है   सच्चा यकी़नन   हर  घुमाने   फातिमा
रहनुमाए    दिनो दुनिया   हुज्जते  परवरदिगार
सारे आलम   के लिए    है  खानदाने   फातिमा
जो कभी पढ़ते     नहीं है   आयते    कुरान  की
लानतें    होती है  उन पर अज़ लिसाने फातिमा
योमे पैदाइश    मनाने    मोमिनो    आए  हैं हम
चौदहवीं महफिल है यह बर आसताने फातिमा
हम पे भी  ज़ीशान    बरसेगी   खुदा की रहमतें
जिंदगी    गुज़रे    अगर दर   साएबाने फातिमा

✍ ज़ीशान आज़मी

سب سے   اعلی ہے  جہاں میں  گلستانِ فاطمہ
نورِ حق    سے     جگمگاتا    ہے    جہانِ فاطمہ
مادرِ حسنین     کا کوئی     مماثل     ہی نہیں
ہر   زمانے    میں   ہے   یہ بے مثل شانِ فاطمہ
درزی   بن    کے آتا ہے رضوانِ جنّت بھی یہاں
ہوتا     ہے     سچا    یقیناً     ہر    گمانِ فاطمہ
رہنمائے      دین    و   دنیا    حجتِ   پروردگار
سارے   عالم    کے    لئے   ہے    خاندانِ فاطمہ
جو کبھی    پڑھتے    نہیں    ہے آیتِ قرآن کی
لعنتیں   ہوتی   ہے    ان   پر     از لسانِ فاطمہ
یومِ پیدائش      منانے   مومنوں    آے ہیں ہم
چودھویں    محفل   ہے  یہ   بر آستانِ  فاطمہ
ہم پہ بھی ذیشان برسیں گی خدا کی رحمتیں
زندگی     گزرے      اگر    در    سائبان  ِ فاطمہ

✍ ذیشان آعظمی

Monday, February 26, 2018

Achcha tumhare shaher ka dastoor ho gaya

बनना था    आफिसर     मुझे, मज़दूर हो गया
फ्यूचर     मेरा      तरक़्क़ियों     से दूर हो गया

कुर्सी    पर    बैठ कर     इलेक्शन   के बाद में
नेता     हमारे    शहर     का     मग़रुर हो गया

खामोश हैं   अवाम    तो   यह    ज़ुल्म  हो रहे
इंसान   क्या    ज़माने   का   मजबूर   हो गया

सच बात कहता हूं कि हर एक शख्स शहर का
नेता    तुम्हारे    राज    से    रंजूर    हो    गया

अपना   के    रास्ते    सभी     शैतां  के देखिए
इंसान    मंजिलो     से    बहुत    दूर   हो गया

सुनते    नहीं     शिकायतें    नेता,    कमाल है
अच्छा तुम्हारे    शहर     का    दस्तूर  हो गया

ज़ीशान    शहर वाले    दुआ   देंगे    एक दिन
मेरा    अगर    मुतालबा     मंजूर     हो   गया

✍ ज़ीशान आज़मी

بننا    تھا   آفیسر    مجھے،    مزدور ہو گیا
فیوچر    مرا    ترقیوں    سے     دور  ہوگیا
کرسی  پہ بیٹھ کر  وہ الیکشن کے بعد میں
نیتا     ہمارے    شہر    کا     مغرور  ہو گیا
خاموش    ہے    عوام    تو   یہ ظلم ہو رہے
انسان    کیا    زمانے    کا    مجبور   ہو گیا
سچ بات کہتا ہوں کہ ہر اک شخص شہر کا
نیتا   تمہارے   راج   سے    رنجور    ہو گیا
اپنا کے   راستے   سبھی شیطاں کے دیکھئے
انسان    منزلوں    سے   بہت   دور   ہو گیا
سنتے     نہیں    شکایتیں    نیتا    کمال ہے
اچھا    تمہارے    شہر    کا   دستور  ہو گیا
ذیشان    شہر والے    دعا    دینگے  ایک دن
میرا    اگر      مطالبہ      منظور     ہو   گیا

✍ ذیشان آعظمی

Friday, February 23, 2018

Tune to bakhsh di hame zillat ki zindagi

ए दोस्त यह भी कोई है इज़्ज़त की ज़िंदगी
नफरत की  जिंदगी,  अदावत   की जिंदगी
लोगों ने   समझा ही   नही   मेरी हयात को
तेरे लिए  है    मेरी   मोहब्बत    की जिंदगी
जंगल में  जा के बसना ही  बेहतर लगे मुझे
इस शहर में  कहां  है  शराफत  की जिंदगी
इस दौर    से   बचाए    खुदारा    हमें कोई
दुश्वार   हो   गई    है राहत    की    जिंदगी
शैतान का   हिसार है मस्जिद के आसपास
किस तरह बच सकेंगी  इबादत की जिंदगी
नेता  हमारा बन के   किया   दरबदर   हमें
तू ने तो बख्श दी हमें ज़िल्लत  की ज़िंदगी
ज़ीशान   शुक्र करता   हूं परवरदिगार   का
अच्छी गुज़र   रही है   क़नाअत की जिंदगी

✍ ज़ीशान आज़मी

سائبان آنلائن ہفتہ وار فی البدیہہ طرحی
مشاعرہ میں میری کاوش :

اے دوست یہ بھی کوئی ہے عزت کی زندگی
نفرت کی   زندگی   یہ   عداوت   کی زندگی
لوگو  نے   سمجھا   ہی نہیں میری حیات کو
تیرے    لئے    ہے  میری   محبت کی   زندگی
جنگل میں   جا کے  بسنا ہی بہتر لگے مجھے
اس شہر   میں  کہاں  ہے شرافت  کی زندگی
اس دور   سے   بچائے    خدارا   ہمیں  کوئی
دشوار   ہو  گئی   ہے یہ راحت   کی   زندگی
شیطان   کا   حصار   ہے مسجد کے آس پاس
کس   طرح بچ   سکیں گی عبادت کی زندگی
نیتا   ہمارا   بن    کے    کِیا    در  بدر    ہمیں
تو نے تو بخش   دی   ہمیں   ذلت کی زندگی
ذیشان   شکر     کرتا    ہوں     پروردگار   کا
اچھی    گزر    رہی     ہے  قناعت  کی زندگی

✍ ذیشان آعظمی

Monday, February 19, 2018

Phir yeh milte hain to ghamkhaar nazar aate hain

جا بجا   دین   کے    غدار   نظر    آتے ہیں
لوگ    باطل    کے    طرفدار  نظر آتے ہیں
غم ہمیں  پہلے یہ  دیتے ہیں سیاست والے
پھر یہ   ملتے ہیں تو غمخوار نظر آتے ہیں
پہلے   اخبار میں  تصویر چھپا کرتی تھی
آج   تصویروں   میں  اخبار   نظر آتے ہیں
دوستو    کیسے   علاج  اپنا کرائے ان سے
ڈاکٹر   خود بھی   تو   بیمار نظر آتے ہیں
دیس کا حال  ذرا غور سے دیکھو صاحب
لوگ    سرکار    سے   بیزار  نظر   آتے ہیں
ظلم  ہوتا ہے مگر  لوگ ہیں خاموش یہاں
یہ  فقط   کہنے کو      بیدار  نظر آتے ہیں
تو نے ذیشان لکھا دل سے جو اشعار یہاں
بس وہی   عوج    پہ   اشعار نظر آتے ہیں
✍ ذیشان آعظمی

जा बजा    दिन के    गद्दार    नज़र   आते  हैं
लोग    बातिल    के तरफदार    नज़र आते हैं
ग़म हमें    पहले    यह देते हैं   सियासत वाले
फिर    मिलते हैं    तो   ग़मखार नज़र आते हैं
पहले    अखबार में    तस्वीर छपा   करती थी
आज तस्वीरों    में    अखबार   नज़र आते हैं
दोस्तों   कैसे   इलाज अपना    कराए   उनसे
डॉक्टर   खुद भी    तो    बीमार नज़र आते हैं
देश   का हाल    जरा   गौर   से देखो   साहब
लोग   सरकार    से   बेज़ार    नज़र   आते हैं
ज़ुल्म होता   है मगर   लोग हैं   खामोश  यहां
यह फ़क़त  कहने को   बेदार  नज़र   आते हैं
तूने ज़ीशान लिखा दिल से जो अशआर  यहां
बस वही   औज पर   अशआर नज़र आते  हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

Saturday, February 17, 2018

Ek bhi shaher me gar zauq e nazar baqi hai

शायरी बाक़ी    है,गर   इल्मो  हुनर    बाक़ी है
दिल में दिलदार के    उर्दू का   असर  बाक़ी है

मंजिलें पाने का   तुम, हमसे    हुनर   ना पूछो
जिंदगी कट गई    पर अब भी  सफर बाक़ी है

खानए काबा    को   आया था  मिटाने लेकिन
अब्राहा मिट   गया    अल्लाह का घर बाक़ी है

छुप नहीं सकता    कोई  भी   सियासी  चेहरा
एक भी शहर मे    गर  ज़ौक़े  नज़र   बाक़ी है

ख़त्म कर डाली है अफवाहों ने आधी दुनिया
अब तो ज़ीशान  सवेरे   की   खबर   बाक़ी है

✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ سخن کے تحت 226  ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں مری کاوش:

شاعری   باقی    ہے گر    علم و ہنر   باقی ہے
دل    میں    دل دار   کے اردو کا اثر باقی ہے

منزلیں   پانے    کا تم،  ہم  سے ہنر نہ پوچھو
زندگی  کٹ  گئی پر   اب  بھی سفر باقی ہے

خانئے   کعبہ    کو    آیا     تھا   مٹانے   لیکن
ابرہہ مٹ  گیا    ، اللہ کا     گھر     باقی    ہے

چھپ نہیں سکتا ہے کوئی بھی سیاسی چہرہ
ایک بھی   شہر  میں گر    ذوقِ  نظر  باقی ہے

ختم   کر ڈالی    ہے  افواہوں    نے آدھی دنیا
اب   تو    ذیشان   سویرے   کی خبر باقی ہے

✍ ذیشان آعظمی
Sun 18th Feb 2018:

Friday, February 16, 2018

Log kahte hain zindagi kam hai

आज दुनिया   में हर खुशी कम है
क्योंकि   सरकार   की सईं कम है
काम  होता   नहीं   है कुछ अच्छा
क्या हुकूमत की पोख़तगी कम है
रहनुमा   बन गए   अवाम  के जो
देखिए  उनकी   अक़्ल ही कम है
नेक आमाल   करना चाहिए अब
हम मे ईमां    की रोशनी   कम है
कल महकते थे लाखों फूल मगर
आज फूलों    की ताज़गी कम है
अपने आमाल    का ख्याल रखो
उम्र दुनिया में    लोगों की कम है
कीजिए    हमसे    प्यार की बातें
लोग   कहते हैं    जिंदगी  कम है
उनके दुश्मन   नहीं हुआ    करते
जिन की   ज़ीशान दोस्ती  कम है

✍ ज़ीशान आज़मी

234 ویں دیا آن لائن مشاعرے  کیلئے
یکجا کلام پیش ہے:

آج دنیا    میں   ہر   خوشی کم ہے
کیونکہ    سرکار   کی سعی کم ہے
کام    ہوتا    نہیں    ہے کچھ اچھا
کیا    حکومت کی    پُختگی کم ہے
رہنما بن    گئے    عوام    کے   جو
دیکھئے   ان کی    عقل ہی کم ہے
نیک    اعمال    کرنا    چاہئے   اب
ہم میں    ایماں کی روشنی کم ہے
کل مہکتے تھے لاکھوں پھول مگر
آج   پھولوں    کی    تازگی کم ہے
اپنے    اعمال     کا    خیال  رکھو
عمر    دنیا    میں  لوگو کی کم ہے
کیجئے    ہم   سے   پیار  کی باتیں
لوگ   کہتے   ہیں    زندگی  کم ہے
ان کے    دشمن   نہیں    ہوا  کرتے
جن  کی    ذیشان   دوستی کم ہے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, February 12, 2018

Tum achche masiha ho shifa kiyo nahi dete

सब रास्ते  बातिल के   मिटा क्यों  नहीं देते
रहबर हमें मनज़िल का पता क्यों नहीं  देते

अल्लाह पर ईमान है,  भरोसा   भी  हमारा
शैतान  अगर तुम   हो दगा़  क्यों  नहीं देते

कमजो़री हुकूमत   की है या दाल में काला
रस्ते   की रुकावट  को   हटा क्यों नहीं देते

फरियाद अगर जाती नहीं उसकी खुदा तक
मज़लूम को सब मिलके दुआ क्यों नहीं देते

खा-खा के में हर  कि़स्म की बीमार हुआ हूं
तुम लोग कोई  अच्छी दवा  क्यों   नहीं देते

रहते हो  मुनाफिक़   की तरह  साथ   हमारे
तुम दिल   की छुपी बात  बता क्यों नहीं देते

शाफी नहीं अपना कोई खालिक़ के इलावा
तुम अच्छे मसीहा हो? शिफा क्यों नहीं देते

ज़ीशान   अगर दोस्तों!    मोहताजे दुआ है
हाथों को   उठाकर के   दुआ क्यों नहीं देते

✍ ज़ीशान आज़मी

آنلائن فیس بک ٹائمز کے زیر اہتمام 25 .ویں بین الا قوامی فی البدیہہ طرحی مشاعرے میں میری کاوش :

سب راستے  باطل کے  مٹا کیوں نہیں دیتے
رہبر    ہمیں منزل کا  پتا   کیوں  نہیں دیتے
اللہ پہ ایمان    ہے     بھروسہ   بھی    ہمارا
شیطان   اگر تم    ہو   دغا کیوں نہیں دیتے
کمزوری   حکومت   کی  ہے یا دال میں کالا
رستے کی   رکاوٹ   کو ہٹا کیوں نہیں دیتے
فریاد اگر   جاتی   نہیں   اس   کی  خدا تک
مظلوم کو سب مل کے دعا کیوں نہیں دیتے
کھا کھا   کے  میں ہر قسم کی بیمار ہوا ہوں
تم لوگ   کوئی   اچھی دوا کیوں نہیں دیتے
رہتے ہو  منافق   کی   طرح   ساتھ    ہمارے
تم دل کی چھپی  بات  بتا کیوں نہیں دیتے
شافی   نہیں   اپنا   کوئی  خالق   کے علاوہ
تم اچھے مسیحا   ہو؟ شفا کیوں نہیں دیتے
ذیشان      اگر   دوستوں!   محتاجِ دعا    ہے
ہاتھوں  کو  اٹھا کر کے دعا کیوں نہیں دیتے

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, February 8, 2018

Jo But Bhi Bahut Soch Kar Banate Hain

Jo Sar Ameero Ki Dahleez Par Jhukate Hain
Kisi Ke Aage Wo Phir Sar Nahi Uthaate Hain

Na Jane Kitne Bade Ho Gaye Hain Do Din Me
Saleeqa Kaam Ka Bachche Hame Sikhate Hai

Samaji Kaam Wo Khud Karte To Nahi Lekin
Sahih Aadami Par Ungliyaa'N Uthaate Hain

Rago Me Jin Ke Lahoo Daudta Hai Shaitaa Ka
Wo Log Hum Se Hamesha Nazar Churate Hain

Tariqa Hum Ko Sikhate Hain Wo Ibaadat Ka
Jo But Bhi Bahut Soch Kar Banate Hain

Khuda Ke Rang Me Jo Rang Jate Hain Zeeshan
Wo Sar Jhukate Nahi Balke Sar Katate Hain

✍ Zeeshan Azmi

موجِ سخن کے تحت 224 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

جو سر   امیروں   کی دہلیز پر جھکاتے ہیں
کسی کے   آگے وہ  پھر سر نہیں اٹھاتے ہیں
نہ جانے کتنے   بڑے ہو گئے ہیں دو دن میں
سلیقہ کام   کا بچے   ہمیں    سکھاتے   ہیں
سماجی   کام   وہ  خود کرتے تو نہیں لیکن
صحیح    آدمی    پر    انگلیاں    اٹھاتے ہیں
رگوں میں   جن کے لہو دوڑتا ہے شیطاں کا
وہ لوگ    ہم سے  ہمیشہ    نظر   چراتے ہیں
طریقہ   ہم کو   سکھاتے ہیں   وہ عبادت کا
جو ایک بت  بھی بہت  سوچ   کر بناتے ہیں
خدا کے رنگ میں جو رنگ جاتے ہیں ذیشان
وہ سر   جھکاتے   نہیں   بلکہ سر کٹاتے ہیں

✍ ذیشان آعظمی

Karta Hoo Roz Hamd Teri Aajezi Se Mai

Allah Mutmaeen Hoon Teri Bandagi Se Mai
Karta Hoo Roz Hamd Teri Aajezi Se Mai

Taufeeq Kirdegaar Ki Mil Jaye Gar Mujhe
Har Nek Kaam Karta Rahunga Khushi Se Mai

Ab Badtameez Sare Hi To Masnado'N Pe Hain
Samjhaao Kaha Talak Unhe Shaaestagi Se Mai

Dilchasp Baat Karte Hain, Allah Ki Panah
Hairaan Hoon Munafiqo Ki Kajrawi Se Mai

Imaandaar Dost Ki Shirkat Agar Rahi
Ban Jaunga Yaha Ameer Dosati Se Mai

Har Khamiyo'N Ka To Ahsaas Na Dila
Jana'N Bahut Udaas Hoon Apni Kami Se Mai

Zeeshan Mujhko Door Siyaasat Se Rahne De
Duniya Me Ji Raha Hoon Badi Saadagi Se Mai

✍ Zeeshan Azmi

اللہ مطمئن ہوں تری بندگی سے میں
کرتا ہوں روز حمد تری عاجزی سے میں

توفیق کردگار کی مل جائے گر مجھے
ہر نیک کام کرتا رہونگا خوشی سے میں

اب بدتمیز سارے ہی تو مسندوں پہ ہیں
سمجھاؤ کہاں تلک انہیں شائستگی میں

دلچسپ بات کرتے ہیں اللہ کے پناہ
حیران ہوں منافقوں کی کج روی سے میں

ایماندار دوست کی شرکت اگر رہی
بن جاؤنگا امیر یہاں دوستی سے میں

ہر بار خامیوں کا تو احساس نہ دلا
جاناں بہت اداس ہوں اپنی کمی سے میں

ذیشان مجھکو دور سیاست سے رہنے دے
دنیا میں جی رہا ہوں بڑی سادگی سے میں

✍ ذیشان آعظمی

Monday, February 5, 2018

Aisi zulmat badhi unke ke jane ke baad

دیا عالمی آنلائن فی البدیہہ 232 ویں طرحی
مشاعرہ میں میری کاوش :

اک ضرورت  ہے دنیا  میں آنے  کے بعد
اک معلم     کی اک    عمر پانے کے بعد
ہم نے سیکھی ہیں اخلاق کی خوبیاں
اپنے   استاد    کے   مسکرانے   کے بعد
بالیقیں   رکھتا    ہے     مرتبہ   باپ کا
مجھ کو    شاگرد   اپنا   بنانے  کے بعد
نام عزت    سے    ہی ہم  لیا کرتے ہیں
اپنے  استاد    کا ہر    زمانے    کے بعد
کوئی    شاگرد   لائق   نہیں  ہو سکتا
اپنے  استاد    کو    آزمانے    کے   بعد
عمر بھر ہم   نے کی   سیوا  استاد کی
حق    مگر رہ  گیا  جان جانے کے بعد
ہائے   افسوس    کہ   کے   رقم کر دیا
ایسی ظلمت بڑھی ان کے جانے کے بعد
شاد ہوتا   ہے    ذیشان    استاد  خوب
طالب علم    کی    لو    جلانے کی بعد

✍ ذیشان آعظمی