Saturday, February 17, 2018

Ek bhi shaher me gar zauq e nazar baqi hai

शायरी बाक़ी    है,गर   इल्मो  हुनर    बाक़ी है
दिल में दिलदार के    उर्दू का   असर  बाक़ी है

मंजिलें पाने का   तुम, हमसे    हुनर   ना पूछो
जिंदगी कट गई    पर अब भी  सफर बाक़ी है

खानए काबा    को   आया था  मिटाने लेकिन
अब्राहा मिट   गया    अल्लाह का घर बाक़ी है

छुप नहीं सकता    कोई  भी   सियासी  चेहरा
एक भी शहर मे    गर  ज़ौक़े  नज़र   बाक़ी है

ख़त्म कर डाली है अफवाहों ने आधी दुनिया
अब तो ज़ीशान  सवेरे   की   खबर   बाक़ी है

✍ ज़ीशान आज़मी

موجِ سخن کے تحت 226  ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں مری کاوش:

شاعری   باقی    ہے گر    علم و ہنر   باقی ہے
دل    میں    دل دار   کے اردو کا اثر باقی ہے

منزلیں   پانے    کا تم،  ہم  سے ہنر نہ پوچھو
زندگی  کٹ  گئی پر   اب  بھی سفر باقی ہے

خانئے   کعبہ    کو    آیا     تھا   مٹانے   لیکن
ابرہہ مٹ  گیا    ، اللہ کا     گھر     باقی    ہے

چھپ نہیں سکتا ہے کوئی بھی سیاسی چہرہ
ایک بھی   شہر  میں گر    ذوقِ  نظر  باقی ہے

ختم   کر ڈالی    ہے  افواہوں    نے آدھی دنیا
اب   تو    ذیشان   سویرے   کی خبر باقی ہے

✍ ذیشان آعظمی
Sun 18th Feb 2018:

No comments:

Post a Comment

Your comments are appreciated and helpful. Please give your feedback in brief.