Saturday, March 3, 2018

Isi ke gham me ghame-e-zindagi bhool gaye

जवान होते ही   अपनी   हंसी   को भूल गए
मिला वो दर्द   के हम हर खुशी को  भूल गए

जदीद   दौर में वो   वक्त   आ   गया   देखो
वह होके आदमी खुद, आदमी को भूल गए

अमीर   बनने की   लालच में आज के नेता
तो अपने  शहर की   बेचारगी  को भूल गए

यह फन्ने  शायरी तो फन है हक़ बयानी का
दरअस्ल   लोग   यहां   शायरी को भूल गए

हज़ारो हमने   हुकूमत  का   कह्र    देखा है
इसी के   ग़म में, ग़मे   जिंदगी को  भूल गए

कुदूरतो   की यह   ज़ीशान   तिरगी   मे हम
रखें जहां   भी क़दम   रौशनी   को भूल गए

✍ ज़ीशान आज़मी

دیا ادبی گروپ کے ۲۳۵ ویں عالمی آنلاین
فی البدیہہ طرحی مشاعرے بتاریخ
  ۲۳ فروری ۲۰۱۸ کے لئے میری کاوش:

جوان ہوتے  ہی  اپنی  ہنسی کو بھول گئے
ملا وہ  درد کہ ہم ہر خوشی کو بھول گئے

جدید دور   میں   وہ   وقت   آ گیا دیکھو
وہ ہوکے آدمی خود   ،آدمی  کو بھول گئے

امیر    بننے کی    لالچ    میں   آج کے نیتا
تو اپنے شہر کی    بے چارگی کو بھول گئے

یہ فنِّ   شاعری   تو   فن  ہے حق بیانی کا
دراصل   لوگ   یہاں  شاعری کو بھول گئے

ہزاروں   ہم   نے  حکومت کا قہر دیکھا ہے
اسی کے   غم میں غم زندگی کو بھول گئے

کدورتوں  کی   یہ   ذیشان  تیرگی میں ہم
رکھے جہاں بھی قدم روشنی کو بھول گئے

✍ ذیشان آعظمی

No comments:

Post a Comment

Your comments are appreciated and helpful. Please give your feedback in brief.