Thursday, April 5, 2018

Sagheer aayaa hai ab zalimo ki khair nahi

कलम के नूर से   अब ज़ुल्मतो   की  खैर नहीं
लिखूं मैं    शेर तो फिर  जाहिलों  की खैर नहीं

हुआ जो काबे में पैदा वह बुत शिकन  है अली
खुदा के   घर में रखें   अब बुतों   की खैर नहीं

बहुत      करीब    ज़ुहूरे इमामे     महदी     है
खुदा    के दीन के   सब दुश्मनों  की खैर नहीं

लबे सग़ीर     पे हथियार    है     तबस्सुम  का
यज़ीदी   फोज के सब बुज़दिलों की खैर  नहीं

यज़ीदी    फौज   में हंगामे    हश्र   है    बरपा
सगी़र आया     है अब ज़ालिमों   की खैर नहीं

लिखेंगे शेर    जो तोहीद    के खिलाफ  अगर
तो समझो हश्र के    दिन शायरों की खैर  नहीं

तेरा तो काम है    ज़ीशान    बस दुआ   करना
खुदा ने चाहा तो फिर   मुश्किलों की खैर नहीं

✍ ज़ीशान आज़मी

قلم کے    نور سے    اب ظلمتوں کی خیر نہیں
لکھوں میں  شعر تو پھر جاہلوں کی خیر نہیں

ہوا جو   کعبہ میں    پیدا وہ بت شکن ہے علی
خدا کے گھر میں رکھے اب بتوں کی خیر نہیں

بہت        قریب     ظہورِ   امامِ    مہدی     ہے
خدا کے   دین   کے سب دشمنوں کی خیر نہیں

لبِ صغیر     پہ      ہتھیار       ہے     تبسم  کا
یزیدی  فوج کے    سب بزدلوں   کی خیر نہیں

یزیدی   فوج   میں    ہنگامِ   حشر    ہے    برپا
صغیر    آیا    ہے اب    ظالموں    کی خیر نہیں

لکھیں   گے   شعر   جو   توحید  کے خلاف اگر
تو سمجھو حشر کے دن شاعروں کی خیر نہیں

ترا    تو     کام     ہے     ذیشان    بس دعا کرنا
خدا  نے   چاہا  تو پھر   مشکلوں کی خیر نہیں

✍ ذیشان آعظمی

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