Tuesday, April 24, 2018

Unhi ki zaat ka aks e khayal hai mujh me

खुदा के  ज़िक्र से कितना  जमाल  है मुझ में
खुदा का  बख्शा हुआ  यह कमाल है मुझ मे

कलामे हक़ को मुसलमान क्यों नहीं पड़ता?
इसी   तरह का   ऐ लोगो सवाल    है मुझ मे

ज़मी पे अर्श से आयत का जब नुज़ूल  हुआ
कहां रसूल (स) ने आला मिसाल है   मुझ मे

मैं हम्द   करता हूं रब्बे   करिम    की  हरदम
ज़माना    देख    लिसाने   बिलालहै मुझ मे

बचाओ    के   लिए    शैतान तेरे    हमलें से
कलामे हक़ की तिलावत की ढाल है मुझ मे

दिलो-दिमाग मे रहती है  मुस्तफा की हदीस
उन्हीं   की  ज़ात का अक्से ख्याल है मुझ मे

हमारी  क़ौम  का ज़ीशान   हाल   क्या होगा
इसी  ख्याल   से   क़ायम मलाल  है मुझ मे

✍ ज़ीशान आज़मी

خدا    کے   ذکر سے کتنا   جمال ہے مجھ میں
خدا   کا    بخشا    ہوا یہ  کمال ہے مجھ میں

کلامِ حق    کو     مسلمان  کیوں نہیں پڑھتا؟
اسی    طرح   کا اے لوگو سوال ہے مجھ میں

زمیں پہ    عرش    سے آیت کا جب نزول ہوا
کہا رسول    نے     اعلی مثال    ہے مجھ میں

میں    حمد     کرتا ہوں   ربِ کریم کی ہر دم
زمانہ      دیکھ   لسانِ بلال    ہے    مجھ میں

بچاؤ   کے    لئے    شیطان    تیرے   حملہ سے
کلامِ حق    کی تلاوت کی ڈھال ہے مجھ میں

دل و دماغ میں  رہتی ہے مصطفی کی حدیث
انھیں کی  ذات  کا  عکسِ خیال ہے مجھ میں

ہماری    قوم    کا    ذیشان  حال     کیا   ہوگا
اسی     خیال     سے   قائم ملال ہے مجھ میں

✍ ذیشان آعظمی

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