Monday, April 30, 2018

Zindagi karb e musalsal ke siwa kuch bhi nahi

पा के नेमत   भी अदा शुक्र  किया कुछ भी नहीं
रब से लोगों    ने किया  वादा वफा कुछ भी नहीं

मैंने   क़ुरआन   पढ़ा     और     हिदायत     पाई
दिल के अंधों   ने पढ़ा उनको मिला कुछ भी नहीं

आज  मसनद   पर वही    लोग  नज़र    आते हैं
जिनको ईमान   का अपने  ही पता कुछ भी नहीं

कुछ      मुसलमानों   का ईमान    हुआ    है मुर्दा
पूजते औरों   को हैं और    हया   कुछ   भी नहीं

किस लिए लोगों ने आखिर  मुझे बदनाम किया?
ज़िकरे ख़ालिक़ के सिवा मेरी खता कुछ भी नहीं

आऔ   कुरान    पढे़    मौत    को   भी याद करे
जिंदगी करबे   मुसलसल के सिवा कुछ  भी नहीं

क्यों नहीं    करते   हो ज़ीशान की बातों पे यकीं
बस हक़ीक़त के  सिवा उसने कहा कुछ भी नहीं

✍ ज़ीशान आज़मी

پا کے نعمت    بھی   ادا شکر کیا کچھ بھی نہیں
رب سے   لوگو نے  کیا وعدہ  وفا کچھ بھی نہیں

میں    نے     قرآن      پڑھا    اور    ہدایت    پائی
دل کے اندھوں نے پڑھا ان کو ملا کچھ بھی نہیں

آج   مسند    پہ     وہی     لوگ     نظر     آتے ہیں
جن   کو   ایمان  کا   اپنے ہی پتا کچھ بھی نہیں

کچھ    مسلمانوں    کا    ایمان    ہوا    ہے   مردہ
پوجتے  اوروں کو   ہیں   اور حیا کچھ بھی نہیں

کس لئے    لوگو    نے     آخر     مجھے بدنام کیا؟
ذکرِ خالق    کے   سوا میری  خطا کچھ بھی نہیں

آؤ قرآن   پڑھیں    موت    کو    بھی     یاد  کریں
زندگی    کربِ   مسلسل  کے سوا کچھ بھی نہیں

کیوں    نہیں   کرتے  ہو ذیشان کی باتوں پہ یقیں
بس حقیقت   کے سوا اس نے کہا کچھ بھی نہیں

✍ ذیشان آعظمی

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