Tuesday, May 29, 2018

Huwi hai jahaaN me wiladat Hasan ki

महिना यह    लाया   बशारत हसन की
हुई है जहां   में    विलादत    हसन की

यह अहले तशय्यो पे  अहसां नहीं क्या
मिली उनको रमज़ां में रुयत  हसन की

अमल करता हूं  उनके अक़वाल पर मैं
रगों में   बसी   है    मोहब्बत हसन की

खिलाते    हैं राहे    खुदा में  वह खाना
गरीबों में    बटती   है दौलत हसन की

वह ज़हरे दग़ा    से     हुए   पारा पारा
भुलाये ना   भूले   शहादत   हसन की

ज़माने को   मालूम है   यह अज़ल से
है ज़ीशान के दिल में चाहत हसन की

✍ ज़ीशान आज़मी

مہینہ     یہ     لایا     بشارت حسن کی
ہوئی ہے    جہاں میں  ولادت حسن کی

یہ    اہلِ تشیع   پہ   احساں    نہیں کیا
ملی ان کو رمضاں میں رویت حسن کی

عمل  کرتا   ہوں ان     کے اقوال پر میں
رگوں میں   بسی   ہے  محبت حسن کی

کھلاتے   ہیں   راہِ خدا میں    وہ  کھانا
غریبوں میں   بٹتی ہے دولت حسن کی

وہ زہرِ دغا      سے     ہوئے    پارہ  پارہ
بھلائے    نہ    بھولے  شہادت  حسن کی

زمانے    کو    معلوم    ہے   یہ  ازل سے
ہے ذیشان کے دل میں  چاہت حسن کی

✍ ذیشان اعظمی

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