Tuesday, May 22, 2018

Khul gaye Rab ke khazane maahe RamazaN aa agaya

मुत्तक़ी हमको   बनाने   माहे रमज़ां    आ गया
नारे दौज़ख़   से बचाने   माहे रमज़ां    आ गया

आसमां पर   चांद जब  हमको नज़र आने लगा
खुल गए रब   के खज़ाने   माहे  रमज़ां आ गया

अपने ख़ालिक़ की इबादत आज से तू खूब कर
घर से    शैतां को   भगाने  माहे रमज़ां आ गया

क़द्र की   रातों में    बनता है मुकद्दर   लोगों का
लोगों की   किस्मत  जगाने माहे रमज़ां आ गया

क्यों नहीं होगी   तिलावत रात दिन क़ुरआन की
रोज़ेदारों   को     पढ़ाने   माहे रमज़ां   आ गया

याद      आती   है     शहादत    हैदरे क़र्रार की
आंसू हम   सबके   बहाने माहे रमज़ां आ गया

अपने  रब  की रहमतों   को देख ले  ज़ीशान तू
फिर   गुनाहों   को जलाने  माहे रमज़ां आ गया

✍ ज़ीशान आज़मी

متقی   ہم     کو     بنانے    ماہِ رمضاں آ گیا
نارِ دوزخ    سے    بچانے    ماہِ رمضاں  آ گیا

آسماں   پر   چاند   جب   ہم کو نظر آنے لگا
کھل گئے   رب کے   خزانے  ماہِ رمضاں آ گیا

اپنے خالق   کی   عبادت آج سے تو خوب کر
گھر سے شیطاں کو بھگانے ماہِ رمضاں آ گیا

قدر کی   راتوں  میں بنتا ہے مقدر لوگوں کا
لوگوں  کی  قسمت جگانے ماہِ رمضاں آ گیا

کیوں   نہیں  ہوگی تلاوت رات دن قرآن کی
روزہ داروں    کو   پڑھانے  ماہِ رمضاں آ گیا

یاد   آتی    ہے    شہادت     حیدرِ قرار   کی
آنسو ہم    سب کے   بہانے  ماہِ رمضاں آ گیا

اپنے رب کی رحمتوں کو دیکھ لے ذیشان تو
پھر  گناہوں   کو    جلانے   ماہِ رمضاں آ گیا

✍ ذیشان اعظمی

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