Monday, July 16, 2018

Jo bhoolna tha mujh ko wahi yaad rah gaya

बचपन में जो    पढ़ा था वही याद रह गया
बाकी सभी   दिमाग से   आज़ाद रह  गया

मंजर अजीब   हमने यह   देखा है दहर में
मतलब परस्त शख्स   ही आबाद  रह गया

उस्ताद की कहां कोई इज़्ज़त है आज कल
लगता यही   है नाम का    उस्ताद रह गया

आदिल थे जितने   लोग यहां  से चले गए
क़ाज़ी के अब लिबास में जल्लाद रह गया

बर्बाद हो   चुके सभी     शैतां के   मक्र से
बतलाव कोन    दहर में अब शाद रह गया

दिल पर दिमाग   पर मेरे अब ज़ोर ना रहा
जो भूलना था   मुझको वही याद रह गया

ज़ीशान तेरी कद्र   किसी    ने नहीं  किया
यह सोचते हुए    ही मैं    नाशाद  रह गया

✍ ज़ीशान आज़मी

بچپن میں  جو پڑھا تھا  وہی یاد رہ گیا
باقی   سبھی     دماغ    سے  آزاد رہ گیا

منظر عجیب ہم نے یہ دیکھا ہے دہر میں
مطلب پرست   شخص   ہی  آباد رہ گیا

استاد کی   کہاں   کوئی  عزت ہے آج کل
لگتا    یہی   ہے نام    کا    استاد رہ گیا

عادل  تھے جتنے  لوگ یہاں سے چلے گئے
قاضی  کے اب    لباس  میں جلاد رہ گیا

برباد ہو چکے سبھی شیطاں کے مکر سے
بتلاؤ کون    دہر   میں    اب  شاد رہ گیا

دل پر،   دماغ پر، مرے   اب   زور نہ رہا
جو بھولنا تھا   مجھ کو  وہی یاد رہ گیا

ذیشان تیری   قدر    کسی  نے نہیں   کیا
یہ سوچتے    ہوئے  ہی  میں ناشاد رہ گیا

✍ ذیشان اعظمی

Tuesday, July 10, 2018

Chup ke tanhaai me ashk bahaa le tu bhi

अब क़दम   साथ    मेरे दोस्त  उठा ले तू भी
नेक    कामों में   मेरा हाथ   बटा    ले तू भी

जिंदगी शहर की    कर दूर   लगा पेड़ शजर
शहर अपना कभी   फूलों से  सजा ले तू भी

तन्हा रहने से    कभी जिंदगी  बस्ती ही नहीं
शादी कर दोस्त के घर अपना बसा ले तू भी

एक   दो हाथों से   होती नहीं  है यह तामीर
हाथ दीवार पे   वहदत की   लगा   ले तू भी

कितने लोगों    ने कटाए   हैं सरों  को अपने
देश के वास्ते   सर अपना   कटा    ले तू भी

दिल दुखाए   हैं सियासत   ने तेरी, लोगों के
छुप के तनहाई में कुछ अश्क बहा ले तू भी

तेरी हस्ती से ज़माना  न कभी   हो ग़ाफिल
ऐसी   पहचान ए  ज़ीशान   बना ले   तू भी

✍ ज़ीशान आज़मी

اب قدم    ساتھ مرے   دوست اٹھا لے تو بھی
نیک کاموں    میں  مرا   ہاتھ   بٹا  لے تو بھی

گندگی   شہر   کی   کر   دور   لگا   پیڑ  شجر
شہر اپنا کبھی پھولوں   سے   سجا لے تو بھی

تنہا رہنے   سے کبھی    زندگی  بستی ہی نہیں
شادی کر   دوست   کہ گھر اپنا بسا لے تو بھی

ایک دو   ہاتھوں  سے  ہوتی نہیں ہے یہ تعمیر
ہاتھ    دیوار   پہ وحدت    کی  لگا لے تو بھی

کتنے لوگوں   نے   کٹایئے   ہیں    سرو کو اپنے
دیس  کے  واسطے   سر   اپنا   کٹا لے  تو بھی

دل دکھائے   ہیں  سیاست نے  تیری لوگوں کے
چھپ کے تنہائی میں کچھ اشک بہا لے تو بھی

تیری   ہستی    سے  زمانہ  نہ  کبھی  ہو  غافل
ایسی   پہچان    اے   ذیشان   بنا لے   تو بھی

✍ ذیشان اعظمی

Tuesday, July 3, 2018

Dil ka maamala hai koi dil lagi nahi

ख़ौफे खुदा    नहीं तो    कोई बंदगी नहीं
बंदा नहीं जो शख्स  तो वह आदमी नहीं

नूरे खुदा से  मिलती है दुनिया को रोशनी
रोशन हैं घर   सभी के मगर  रोशनी नहीं

रखता हूं   मैं सलाम दुआ  लोगों से मगर
खुदगर्ज़   आदमी   से मेरी   दोस्ती  नहीं

है दुश्मन ए   खुदा से मेरी   दुश्मनी बड़ी
बाक़ी मेरी किसी   से कोई  दुश्मनी नहीं

उलझी हुई है आज भी शायर की शायरी
हर शेर मे गुलू   है    मगर   सादगी  नहीं

जिक्रे खुदा में करता   हूं मैं जिंदगी  बसर
दिल का  मामला   है कोई  दिल्लगी नहीं

हक़ का बयान करना सितमगर के सामने
ज़ीशान यह    तेरी    कोई  दीवानगी नहीं

✍ ज़ीशान आज़मी

خوفِ خدا  نہیں    تو کوئی   بندگی نہیں
بندہ نہیں   جو   شخص تو وہ آدمی نہیں

نورِ خدا سے   ملتی ہے    دنیا  کو روشنی
روشن ہیں گھر سبھی کے مگر روشنی نہیں

رکھتا ہوں  میں سلام دعا لوگوں سے مگر
خود غرض   آدمی سے مری دوستی نہیں

ہے د شمنِ  خدا سے    مری  دشمنی    بڑی
باقی مری   کسی  سے کوئی دشمنی  نہیں

الجھی ہوئی ہے آج بھی شاعر کی  شاعری
ہر شعر میں   غلو ہے   مگر   سادگی  نہیں

ذکرِ خدا   میں  کرتا ہوں میں زندگی  بسر
دل    کا معاملہ   ہے کوئی   دل لگی  نہیں

حق کا    بیان    کرنا    ستمگر   کے سامنے
ذیشان یہ    تری     کوئی   دیوانگی  نہیں

✍ ذیشان اعظمی