Tuesday, July 10, 2018

Chup ke tanhaai me ashk bahaa le tu bhi

अब क़दम   साथ    मेरे दोस्त  उठा ले तू भी
नेक    कामों में   मेरा हाथ   बटा    ले तू भी

जिंदगी शहर की    कर दूर   लगा पेड़ शजर
शहर अपना कभी   फूलों से  सजा ले तू भी

तन्हा रहने से    कभी जिंदगी  बस्ती ही नहीं
शादी कर दोस्त के घर अपना बसा ले तू भी

एक   दो हाथों से   होती नहीं  है यह तामीर
हाथ दीवार पे   वहदत की   लगा   ले तू भी

कितने लोगों    ने कटाए   हैं सरों  को अपने
देश के वास्ते   सर अपना   कटा    ले तू भी

दिल दुखाए   हैं सियासत   ने तेरी, लोगों के
छुप के तनहाई में कुछ अश्क बहा ले तू भी

तेरी हस्ती से ज़माना  न कभी   हो ग़ाफिल
ऐसी   पहचान ए  ज़ीशान   बना ले   तू भी

✍ ज़ीशान आज़मी

اب قدم    ساتھ مرے   دوست اٹھا لے تو بھی
نیک کاموں    میں  مرا   ہاتھ   بٹا  لے تو بھی

گندگی   شہر   کی   کر   دور   لگا   پیڑ  شجر
شہر اپنا کبھی پھولوں   سے   سجا لے تو بھی

تنہا رہنے   سے کبھی    زندگی  بستی ہی نہیں
شادی کر   دوست   کہ گھر اپنا بسا لے تو بھی

ایک دو   ہاتھوں  سے  ہوتی نہیں ہے یہ تعمیر
ہاتھ    دیوار   پہ وحدت    کی  لگا لے تو بھی

کتنے لوگوں   نے   کٹایئے   ہیں    سرو کو اپنے
دیس  کے  واسطے   سر   اپنا   کٹا لے  تو بھی

دل دکھائے   ہیں  سیاست نے  تیری لوگوں کے
چھپ کے تنہائی میں کچھ اشک بہا لے تو بھی

تیری   ہستی    سے  زمانہ  نہ  کبھی  ہو  غافل
ایسی   پہچان    اے   ذیشان   بنا لے   تو بھی

✍ ذیشان اعظمی

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