Monday, October 15, 2018

Kabhi jab haath me ghalib ka deewan lete hain

पुरानी यादों की    जानिब    सभी    रुझान लेते हैं
कभी जब हाथ   में ग़ालिब   का हम दीवान लेते हैं

बड़े चालाक    होते   हैं भरोसा सोच     कर करना
सियासत  करने    वाले ही हमारी    जान   लेते हैं

हिफाजत करती    है ईमान   का भी दोस्ती अच्छी
बुरे गर दोस्त    हो अपने तो    वह ईमान    लेते हैं

हिदायत के लिए    क्यों तुम  किताबें ढूंढते फिरते
हिदायत पाने    वाले     हाथों में    कुरान   लेते हैं

तुम्हारे मक्र  पर खामोश   रहना उनकी   आदत है
मुनाफिक़ की हकीक़त क्या है मोमिन जान लेते हैं

बदलकर चेहरा धोके बाज़ जितना  सामने आ जा
हुनर रखते   हैं जो     इंसान वह    पहचान लेते हैं

ना कुछ ख़ौफ रखते हैं न कुछ डरते   हैं दुनिया से
खुदा को अपना जो जीशान सब कुछ मान लेते हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

پرانی   یادوں    کی جانب   سبھی رجحان لیتے ہیں
کبھی   جب ہاتھ   میں غالب  کا ہم دیوان لیتے ہیں

بڑے   چالاک    ہوتے  ہیں    بھروسہ   سوچ کر کرنا
سیاست    کرنے   والے    ہی    ہماری   جان لیتے ہیں

حفاظت   کرتی   ہے    ایمان  کا بھی دوستی اچھی
برے گر    دوست     ہو اپنے    تو وہ ایمان لیتے ہیں

ہدایت    کے   لئے کیوں   تم کتابیں  ڈھونڈتے پھرتے
ہدایت   پانے   والے    ہاتھوں    میں   قرآن لیتے ہیں

تمہارے مکر   پر خاموش    رہنا ان    کی عادت   ہے
منافق کی    حقیقت     کیا ہے   مومن جان لیتے ہیں

بدل کر    چہرا     دھوکے    باز    جتنا     سامنے آجا
ہنر رکھتے ہیں     جو انسان     وہ    پہچان لیتے ہیں

نہ کچھ خوف رکھتے ہیں نہ کچھ ڈرتے ہیں دنیا سے
خدا کو اپنا جو   ذیشان  سب  کچھ    مان لیتے ہیں

✍ ذیشان اعظمی

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