Saturday, November 17, 2018

Mil kar jalaao aag me putla yazeed ka

क्या पूछता    है मुझसे     तू   क़िस्सा  यज़ीद का
फितनागिरी     में हाथ    था      लम्बा यज़ीद का

फतवो     से कर रहा    है जो   गुमराह क़ौम को
बेशक    वही    ज़लील है     नुत्फा    यज़ीद का

फितना    खड़ा करेगा    जो    मिंबर पे   बैठकर
वो  मौलवी    है     चाहने     वाला     यज़ीद का

गुमराह    शायरी     का जो     फानूस   बन गया
उस्ताद वो      कहां    वोह है    चेला  यज़ीद का

जिसको    नहीं    है शायरी    का इम्तियाज़ कुछ
बेशक    वही    ज़लील  है    बच्चा    यज़ीद का

बदबू से    घुटने लगता    था  इंसानियत का दम
गिरता था    जब    जहां भी पसीना   यज़ीद का

किरदार     दाग़दार    था    मलऊन   शख्स का
खुद जान जाओ     कैसा था   शजरा यज़ीद का

हबशि गुलाम    सामने     फिज़्ज़ा के    आ गए
दरबार   में ही हिल     गया    तख्ता   यज़ीद का

देखा जलाल    फिज़्ज़ा    का जैसे   ही वह लईं
बजने लगा    था वैसे      ही बाजा    यज़ीद का

इस कद्र    ज़ुल्मो   जौर     किया   था यज़ीद ने
बैठा     नहीं    था तख़्त     पे बेटा    यज़ीद का

तालीम    अच्छी पाई    थी मोमिन   से इसलिए
ठुकरा     दिया था     बेटे ने तख़्ता    यज़ीद का

क्यों कर सलाम     भेजो ना    मुख्तार को भला
चुन-चुन के    मार डाला    चमचा     यज़ीद का

शैतां के     पैरोकार   थे अजदाद    बद    नसब
कितना    नजिस है    देखिये  शजरा यज़ीद का

वो बदनसीब शख्स था देखिए गुमनाम मर गया
किस को   पता   कहां था   जनाज़ा  यज़ीद का

फरज़नदे फातिमा    की    हुकूमत को देख कर
बेचैन     होगा    कब्र में     मुर्दा       यज़ीद का

गर ईद     तुम  नवी    कि मनाने    को आये हो
मिलकर    जलाओ   आग में पुतला यज़ीद का

बय्यत का     हाथ काट      के   ज़ीशान देखिए
दफना दिया     हुसैन ने    फितना    यज़ीद का

✍ ज़ीशान आज़मी

کیا پوچھتا ہے مجھ سے تو قصہ یزید کا
فتناگری    میں     ہاتھ    تھا لمبا یزید کا

فتووں سے    کر رہا ہے جو گمراہ قوم کو
بے شک    وہی   ذلیل ہے    نطفہ  یزید کا

فتنہ کھڑا کرے    گا  جو منبر پر بیٹھ کر
وہ    مولوی    ہے     چاہنے   والا  یزید کا

گمراہ    شاعری    کا جو   فانوس  بن گیا
استاد وہ   کہاں    وہ    ہے   چیلا یزید کا

جس کو نہیں   ہے شاعری کا  امتیاز کچھ
بے شک   وہی    ذلیل  ہے    بچہ   یزید کا

بدبو سے  گھٹنے  لگتا تھا انسانیت  کا دم
گرتا  تھا جب   جہاں بھی  پسینہ یزید کا

کردار داغدار    تھا  ملعون    شخص   تھا
خود جان    جاؤ کیسا   تھا شجرا یزید کا

حبشی غلام    سامنے     فضہ    کے  آ گئے
دربار میں    ہی    ہل    گیا   تختہ یزید کا

دیکھا جلال   فضہ کا   جیسے ہی وہ لعیں
بجنے    لگا تھا    ویسے    ہی باجا یزید کا

اس   قدر   ظلم و جور   کیا تھا یزید نے
بیٹھا    نہیں    تھا تخت پہ  بیٹا یزید کا

تعلیم اچھی پائی تھی مومن سے اس لئے
ٹھوکرا   دیا   تھا  بیٹے نے تختہ  یزید کا

کیوں کر  سلام بھیجو نہ مختار کو بھلا
چن چن    کے مار  ڈالا تھا چمچا یزید کا

شیطاں کے  پیروکار  تھے اجداد بد نصب
کتنا نجس   ہے    دیکھئے  شجرا یزید کا

وہ بد نصیب    شخص  تھا گمنام مر گیا
کس    کو پتا   کہاں   تھا  جنازہ یزید کا

فرزندِ فاطمہ   کی  حکومت کو دیکھ کر
بے چین    ہوگا    قبر   میں مردہ یزید کا

گر عید    تم نوی   کی   منانے  کو آئے ہو
مل  کر   جلاؤ   آگ    میں    پتلا یزید کا

بیعت    کا ہاتھ  کاٹ کے ذیشان دیکھئے
دفنا     دیا     حسین    نے  فتنہ یزید کا

✍ ذیشان آعظمی

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