Monday, November 12, 2018

Mujh ko saanpo se dar nahi lagta

हर जगह पर   शजर  नहीं लगता
हर शजर    में   समर नहीं लगता

घर   के     माहौल  से    परेशां हूं
अब  मुझे घर भी  घर नहीं लगता

खुद  को  मजबूर  जो समझता है
हमको वह  बा खबर नहीं  लगता

शायरी तोहफा है खुदा का फक़त
यह किसी  का  हुनर  नहीं लगता

झूठ हर  बात पर   जो कहता  है
शख्स वह मुतबर      नहीं लगता

मैं तो  जिंदा हूं ज़हर  पी पी  कर
मुझको सांपों से डर  नहीं लगता

सोच   ज़ीशान   शेर  और   कोई
अच्छा मिसरा  अगर  नहीं लगता

✍ ज़ीशान आज़मी

ہر    جگہ    پر   شجر   نہیں لگتا
ہر شجر    میں    ثمر    نہیں لگتا

گھر کے   ماحول سے پریشاں ہوں
اب مجھے گھر بھی گھر نہیں لگتا

خود   کو  مجبور  جو سمجھتا ہے
ہم کو    وہ    با خبر    نہیں   لگتا

شاعری    تحفہ  ہے   خدا  کا فقط
یہ  کسی    کا     ہنر     نہیں  لگتا

جھوٹ    ہر بات    پر جو کہتا ہے
شخص   وہ     معتبر    نہیں  لگتا

میں تو زندہ    ہوں زہر پی پی کر
مجھ کو سانپوں سے ڈر نہیں لگتا

سوچ     ذیشان  شعر    اور  کوئی
اچھا    مصرع    اگر    نہیں   لگتا

✍ ذیشان آعظمی

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