Friday, January 11, 2019

Phool ko toot kar har simt bikhar jana hai

हक़ पे ज़ां देना है   या हक़   से  मुकर जाना है
फैसला खुद ही  तू कर तुझ को किधर जाना है

ज़िंदगी हक़ से  जियो,  हक़ को बयां करते रहो
हम मुसलमां हैं, मुसलमान   ही   मर   जाना है

अपनी मर्ज़ी   को भला    थोपने  से क्या होगा
क्या कभी बाप    ने बच्चों   का   हुनर जाना है

कोशिशें करता    ही जा के  यह कोई बात नही
तालिबे इल्म    को    नाकामी   से डर जाना है

लूटता क्यों    है गरीबो    को तू   करके कब्ज़ा
काम कर   नेक तू,   घर रब   के अगर जाना है

कब तलक शाख पे खिलता ही रहेगा एक दिन
फूल को टूट   के हर   सिम्त    बिखर  जाना है

आज़माइश का  सफर है यह सफर दुनिया का
हम को   हंसते   हुए   ज़ीशान   गुज़र जाना है

✍ ज़ीशान आज़मी

حق پہ جاں  دینا ہے یا حق سے مکر جانا ہے
فیصلہ خود ہی تو کر تجھ کو کدھر جانا ہے

زندگی   حق سے جیو حق کو بیاں کرتے رہو
ہم مسلماں ہیں، مسلمان   ہی    مر  جانا ہے

اپنی مرضی   کو بھلا   تھوپنے سے کیا ہوگا
کیا کبھی   باپ   نے    بچوں   کا ہنر جانا ہے

کوششیں   کرتا ہی جا کہ یہ کوئی بات نہیں
طالبِ علم   کو    نا کامی    سے   ڈر جانا ہے

لوٹتا کیوں   ہے غریبوں   کو تو کر کے قبضہ
کام   کر نیک   تو، گھر   رب کی  اگر جانا ہے

کب تلک    شاخ   پہ  کھلتا ہی رہے گا اک دن
پھول کو    ٹوٹ   کے ہر سمت بکھر جانا ہے

آزمائش   کا   سفر    ہے   یہ   سفر    دنیا کا
ہم   کو ہنستے    ہوئے    ذیشان  گزر جانا ہے

✍ ذیشان آعظمی

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