Wednesday, January 15, 2020

Dimak ki misl mujhko muhabbat ne kaha liya

तूफ़ान  एक  दर्द   का   हम   ने   उठा लिया
मजबूर  हम  थे  इस लिये  आंसू   बहा लिया

सब कुछ लुटा दिया था मुनाफिक़ के प्यार में
दिमक की मिस्ल मुझको मुहब्बत ने खा लिया 

पाया   हूँ   इत्मीनान     खुदा    क़सम   बहुत
सर    जब   भी वालदैन  के आगे झुका लिया

अब नौकरी   कहाँ है,   कहाँ    कारोबार   भी
बेकार खुद   को    हम   ने  तवंगर बना लिया

ज़ीशान   मैं    घिरा हूं   दरिंदों   के    दरमियां
दुश्मन   ने मेरे    शहर  को  जंगल बना लिया

✍ ज़ीशान आज़मी

طوفان   ایک   درد   کا   ہم  نے  اٹھا لیا
مجبور    ہم   تھے   اس  لئے آنسو بہا لیا

سب کچھ لٹا دیا تھا منافق کے پیار میں
دیمک کی مثل مجھکو محبت نے کھا لیا

پایا ہوں   اطمنان    خدا   کی  قسم بہت
سر جب بھی  والدین کے  آگے   جھکا لیا

اب نوکری   کہاں ہے   کہاں  کاروبار بھی
بیکار    خود   کو   ہم   نے   تونگر  بنا لیا

ذیشان میں گھرا ہوں درندوں کے درمیاں 
دشمن  نے  میرے  شہر   کو  جنگل بنا لیا

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, January 8, 2020

Mumbai ke musafir hai anjaan nikalte hai

इस मौत    की नगरी   में इंसान    निकलते हैं
मुंबई के    मुसाफिर हैं  अनजान निकलते  हैं
इस शहर में   चारों जानीब मौत का कबज़ा है
बे खौफ    मगर घर    से नादान   निकलते हैं
बीमारी   मे  मरते है      मरते    हैं    ट्राफिक में
जीने को    यहां फिर भी  अरमान निकलते हैं
टूटी हुई    सड़को   पर जब    हादसा होता है
दुनिया   से कई  इन्सां   बेजान    निकलते  हैं
सरकार नहीं सुनती हम सब की शिकायत को
क्या    हफ्ता वसूली   के इमकान निकलते हैं
मै देखता हूं    अकसर   लोगों   की  परेशानी
जब   घर से   निकलते हैं,   हैरान निकलते हैं
ज़ालिम के मज़ालिम से लड़ने के लिए घर से
कुछ लोग ही मुश्किल से ज़ीशान  निकलते हैं
✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز کا 20 واں عالمی آن لائن
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش :

اس موت   کی   نگری میں   انسان نکلتے ہیں
ممبئی   کے    مسافر   ہیں    انجان نکلتے ہیں
اس شہر میں چاروں جانب موت کا قبضہ ہے
بے خوف    مگر گھر    سے    نادان   نکلتےہیں
بیماری   میں مرتے  ہیں  مرتے ہیں ٹرافک میں
جینے کو     یہاں پھر   بھی ارمان   نکلتے ہیں
ٹوٹی ہوئی   سڑکوں    پر جب  حادثہ  ہوتا ہے
دنیا سے    کئی انساں    بے جان    نکلتے   ہیں
سرکار نہیں سنتی ہے ہم سب  کی شکایت  کو
کیا   ہفتہ    وصولی کے     امکان     نکلتے ہیں
میں دیکھتا    ہوں   اکثر   لوگو   کی   پرشانی
جب گھر    سے   نکلتے  ہیں حیران نکلتے  ہیں
ظالم کے    مظالم   سے لڑنے    کے  لئے گھر سے
کچھ    لوگ   ہی مشکل سے ذیشان  نکلتے ہیں
✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, January 7, 2020

MusalmaN ko dushman juda kar rahe hain

हमारे    लिए    जो दुआ     कर   रहे हैं

वही    लोग    हम से    वफा कर  रहे हैं

अगर वक्त     बर्बाद    करते    हैं  बच्चे
तो जानो   जवानी    फना कर     रहे हैं

यह फिरक़ो की  दीवार  हतमी उठाकर
मुसलमां  को   दुश्मन   जुदा  कर रहे हैं

मैं करता अमल हूं वह करते हैं बकबक
मै क्या कर रहा   हूं वह क्या  कर रहे हैं

मुझे पूछना   है यह    ज़ीशान    सबसे
खुदा के लिए    आप    क्या कर  रहें हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

دیا 228 ویں عالمی آن لائن فی البدیہہ
طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

ہمارے    لئے    جو     دعا کر    رہے ہیں
وہی     لوگ     ہم   سے وفا کر رہے ہیں

اگر    وقت    برباد     کرتے    ہیں  بچے
تو    جانو    جوانی    فنا   کر  رہے  ہیں

یہ   فرقوں   کی   دیوار   حتمی  اٹھاکر
مسلماں    کو    دشمن  جدا کر  رہے ہیں

میں کرتا عمل ہوں وہ  کرتے ہیں بک بک
میں کیا  کر رہا ہوں وہ  کیا  کر رہے ہیں

مجھے    پوچھنا ہے یہ  ذیشان سب سے
خدا    کے    لئے آپ    کیا    کر  رہے ہیں

✍ ذیشان آعظمی


Maloni ki aabo hawa na paak huwi hai


Maloni me rahta hoon rawani nahi milti

Is hasti ko jeene  ki   nishani   nahi milti

Maloni ki aabo hawa na paak huwi hai
Ek sham kabhi humko suhani nahi milti

Khaliq ko jawani ki ebadat hi pasand hai
Do baar kabhi bande,  jawaani nahi milti

Kachre   me traffic me  sabhi  jeete lekin
Logo ki   yaha   soch   siyaani nahi  milti

Zeeshan jaha zindagi khush hal thi meri
Afsos   wo maloni    purani   nahi     milti

✍ Zeeshan Azmi

موجِ سخن کے تحت 219 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی آن لائن محفلِ مشاعرہ
میں میری کاوش :

مالونی میں    رہتا ہوں    روانی   نہیں ملتی
اس ہستی    کو جینے  کی نشانی نہیں ملتی

مالونی    کی   آب و ہوا   نا پاک      ہوئی ہے
اک شام    کبھی   ہم  کو  سہانی   نہیں لگتی

خالق   کو   جوانی   کی   عبادت ہی پسند ہے
دو بار    کبھی     بندے،   جوانی   نہیں ملتی

کچرے میں ٹرافک میں سبھی جیتے ہے لیکن
لوگو   کی یہاں   سوچ    سیانی   نہیں  ملتی

ذیشان   جہاں    زندگی خوشحال تھی  میری
افسوس    وہ    مالونی    پرانی   نہیں  ملتی

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, January 1, 2020

Na samajh logon ko bahlata raha


Mulk   me   rahbar    naya aataa raha
Pet   apne logon    ka     bharta    raha

Jhoota    wada    roz    kar   ke aaj tak
Na samajh    logon ko    bahlata raha

Kaam   me      ek    bhi    nahi     mere
Par wo   schemey   nayee  laata raha

Na pasand    ration gharibo   ko diya
Khud   magar  ration A1 khaata raha

Apne faide    ke liye    sarkaar-e-man
Bas    naye     qanoon   banwata raha

CCTV      lagne      se     ab      dekhiye
Pasbaani   ka   mazaa    jaata     raha

Naam ke nikle  sayaasat daa'n sabhi
Uljhanein  Zeeshan   suljhaata   raha

✍ Zeeshan Azmi

دیا 227 ویں عالمی آن لائن فی البدیہہ
طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

ملک    میں    رہبر     نیا     آتا   رہا
پیٹ    اپنے    لوگوں    کا بھرتا رہا

جھوٹا    وعدہ    روز کر  کے آج تک
نا    سمجھ    لوگوں   کو بہلاتا رہا

کام    میں  اک بھی نہیں آئی مرے
پر    وہ    اسکیمیں   نئی   لاتا  رہا

ناپسند   راشن   غریبوں    کو   دیا
خود   مگر   راشن  اےون کھاتا رہا

اپنے  فائدے   کے   لئے   سرکارِ من
بس     نئے     قانون     بنواتا    رہا

سی سی ٹیوی لگنے سے اب دیکھئے
پاسبانی     کا      مزا       جاتا   رہا

نام کے     نکلے    سیاستداں  سبھی
الجھنیں    ذیشان     سلجھاتا    رہا

✍ ذیشان آعظمی