Thursday, December 26, 2019

फिर यह न कहो मैंने तो नियत नहीं देखी


क्या आयते    कुरआन की  अज़मत नहीं देखी
लिख्खें   हुए जुमलों   की बलाग़त   नहीं देखी

मस्जिद में   नमाज़ी    की गई   आदतें    देखी
क़ुरआन   कभी पढ़ने   की आदत   नहीं देखी

इस दौर में जाहिल की फक़त होती है इज़्ज़त
आलिम की यहां थोड़ी  भी इज़्ज़त नहीं देखी

हर शख्स  से ब्योपार   करो सोच   समझकर
फिर यह   न कहो मैंने   तो नियत   नहीं देखी

इंसान को नवाज़ा   है हर एक   शै से खुदा ने
उसने कभी   अपनी छुपी ताकत    नहीं देखी

कातिल है जाहालत का हर एक नूर खुदा का
सूरज ने   कभी   रात की ज़ुलमत नहीं   देखी

फरमाने   खुदा कहता है जन्नत  की तरफ आ
ज़ीशान   मगर    लोगों ने   जन्नत    नहीं देखी

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز 18  ویں  بین الا قوامی فی البدیہہ طرحی مشاعرے میں میری ادنٰی کاوش:

کیا آیتِ قرآن     کی    عظمت    نہیں دیکھی
لکھّے ہوئے    جملوں کی  بلاغت نہیں دیکھی

مسجد میں   نمازی کی  کئی عادتیں  دیکھی
قرآن کبھی    پڑھنے  کی عادت  نہیں دیکھی

اس دور میں    جاہل کی فقط  ہوتی ہے عزت
عالم کی یہاں تھوڑی بھی عزت  نہیں دیکھی

ہر شخص سے   بیوپار   کرو سوچ سمجھ کر
پھر یہ نہ کہو     میں نے تو نیّت نہیں دیکھی

انساں   کو نوازا    ہے    ہر اک شے سے خدا نے
اس نے کبھی اپنی چھپی طاقت نہیں دیکھی

قاتل ہے جہالت   کا   ہر اک      نور      خدا کا
سورج نے   کبھی رات کی ظلمت نہیں دیکھی

فرمانِ خدا      کہتا       ہے   جنت کی طرف آ
ذیشان مگر     لوگوں     نے جنت نہیں دیکھی

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, December 25, 2019

Khuda ko chorhne wala haraas rahta hai

Mauje Sukhan ke tahat 214 wee'n bainul aqwaami fil badiha tarhi mushayera me meri kavish:

Khuda ko chorhne wala haraas rahta hai
Umeed tod ke har dam    udaas rahta hai

Nahi samajhta hai wo shakhs pyaas ka matlab
Ke jiske haath labaalab  gilaas rahta hai

Khuda ka fazl hai ke puri   umr   ay aurat
Teri hayat ka shauhar  libaas    rahta hai

Fuzool kharch na karna tu maal ko bande
Hisaab pura tere Rab   ke paas    rahta hai

Wo aadmi ka  to  bekaar    hai   yaha jeena
Badalti duniya me jo bad hawaas rahta hai

Khuda ko bhool gaya tha jaha'n kabhi mai bhi
Usi jagah   pe    sitaara shanaas rahta hai

Dil o dimaag se Zeeshan maine maana hai
Napi tuli hi zubaa'n par mithaas rahta hai

✍ Zeeshan Azmi

موجِ سخن کے تحت214 ویں بین الاقوامی
فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

خدا    کو چھوڑ نے     والا     ہراس    رہتا ہے
امید توڑ    کے      ہر دم       اداس     رہتا ہے

نہیں سمجھتا ہے وہ شخص پیاس کا مطلب
کہ جس     کے ہاتھ   لبالب     گلاس  رہتا ہے

خدا کا فضل ہے کہ      پوری  عمر اے عورت
تری     حیات     کا شوہر     لباس      رہتا ہے

فضول خرچ       نہ کرنا تو      مال کو بندے
حساب پورہ    ترے رب    کے پاس    رہتا ہے

وہ آدمی      کا تو بیکار       ہے یہاں    جینا
بدلتی دنیا      میں    جو  بد حواس رہتا ہے

خدا کو بھول گیا تھا جہاں  کبھی میں بھی
اسی جگہ  پہ       ستارہ شناس       رہتا ہے

دل و دماغ        سے ذیشان  میں نے مانا ہے
نپی تلی ہی      زباں     پر مٹھاس    رہتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

गर दिल में मुसलमां के अल्लाह का डर है

गर दिल  में मुसलमां    के अल्लाह   का डर है

फिर मौत का इसको नहीं कुछ ख़ौफो खतर है

इस्लाम ही    मज़हब   है  पसंदीदा    खुदा का
बस इ सके इलावा   तो सभी    दिन    ज़रर है

मोमिन कभी    धोखा नहीं देता    है किसी को
अल्लाह  से    डरता है के   तक़वे का असर है

माबूद  को वह    देख नहीं   सकता है हरगिज़
दुनिया   में अगर   बंदे    की कमज़ोर नज़र है

बदनाम   हुआ   जाता है    इस्लाम    मुसलमां
दुनिया   को सिखा दीन अगर सीने में जिगर है

बंदो का यह  अल्लाह   से मदर के   शिकम में
क्या-क्या हुए   पैमाने वफ़ा   किसको खबर है

ज़ीशान   ज़माने   में करूं    किस    पे भरोसा
जिस चोर को   देखो  वही मस्जिद का सदर है

✍ ज़ीशान आज़मी

بزمِ سخنوراں کی 98/ ویں ہفتہ واری فی البدیہہ طرحی مشاعرہ میں میری کاوش:

گر   دل    میں    مسلمان    کے    اللہ   کا  ڈر ہے
پھر موت کا اس کو نہیں کچھ خوف و خطر ہے

اسلام    ہی    مذہب    ہے    پسندیدہ    خدا   کا
بس    اس    کے   علاوہ   تو  سبھی دین ضرر ہے

مومن   کبھی    دھوکا   نہیں   دیتا  ہے کسی کو
اللہ     سے   ڈرتا    ہے    کہ    تقوے     کا  اثر  ہے

معبود     کو    وہ    دیکھ   نہیں   سکتا  ہے ہرگز
دنیا    میں    اگر    بندے    کی    کمزور    نظر ہے

بدنام      ہوا     جاتا       ہے      اسلام     مسلماں
دنیا    کو    سکھا دین   اگر    سینے  میں جگر ہے

بندوں     کا    یہ    اللہ    سے   مادر کے شکم میں
کیا   کیا   ہوئے    پیمان  وفا    کس   کو   خبر ہے

ذیشان    زمانے     میں   کروں     کس پہ بھروسہ
جس    چور کو   دیکھوں وہی مسجد کا  صدر ہے

✍ ذیشان آعظمی

Friday, December 20, 2019

बुनियादे ज़ुल्मो ज़ोर हिला देना चाहिए


बुनियादे ज़ुल्मो ज़ोर     हिला     देना    चाहिए
अब तो सितमगरों     को      सज़ा देना चाहिए

तकलीफ    दूर होगी     कभी तो     गरीबों  की
मसनद    से ज़ालिमों    को हटा  देना    चाहिए

आदमी     का    खून पिया     जाती है   फक़त
बुग़ज़ो हसद    की आग   बुझा    देना   चाहिए

शैतां के   रास्ते    पे    हमेशा   जो     चलते   हैं
इस दह्र को अब    उसकी    सज़ा  देना चाहिए

तकलीफ का सबब है यह नफरत की आग भी
दिल में जो  कुछ हो    बात बता    देना चाहिए

ज़ीशान यह हदिस है,   इज़्ज़त    बड़ों की कर
बच्चे   अगर    है छोटे,    दुआ    देना   चाहिए

✍ ज़ीशान आज़मी

Wednesday, December 18, 2019

शेर कहते हो तो हर बात तुम्हारी निकले


शेर कहते   हो तो हर बात  तुम्हारी निकले
आप पर बीती  है जो   दास्तां सारी निकले

क़िरअते क़ुरां सिखाएं   मेरे बच्चों को कोई
क़ौम मे   ऐसा कोई एक   तो क़ारी निकले

नागहानी में   कभी ज़ाकिरो   मुल्लाओ के
हमने ईमान  टटोला तो वह   नारी  निकले

यह हक़ीक़त  है के होते   हैं दिखावे  वाले
दहर में जितने  थे मशहूर  भिकारी निकले

तजरिबा है कि  जहां तक गई है मेरी नज़र
जिस्मो दौलत के  कई लोग पुजारी निकले

एक पल्ले पे  मुसन्निफ  की लदी थी पोथी
मेरे दो   शेर   मगर दूजे   पे भारी   निकले

मरने के बाद   ही मालूम हुआ   है मुझको
मेरे क़ातिल तो   मेरे अपने  हवारी निकले

यह दुआ करते रहो  अपने खुदा से हरदम
जान  इस्लाम   पे ज़ीशान  हमारी  निकले

✍ ज़ीशान आज़मी

فیس بک ٹائمز ہفتہ وار فی البدیہہ 17
 واں طرحی عالمی آن لائن مشاعرہ  میں
 میری یکجا کاوش :

شعر   کہتے  ہو  تو  ہر بات   تمہاری نکلے
آپ پر بیتی  ہیں جو داستاں ساری  نکلے

قرئتِ قرآں سکھائے مرے بچوں کو کوئی
قوم   میں  ایسا کوئی ایک تو قاری نکلے

ناگہانی   میں   کبھی ذاکر و ملّا ؤں  کے
ہم   نے    ایمان  ٹٹولا   تو  وہ  ناری نکلے

یہ حقیقت ہے کہ ہوتے ہیں دکھاوے والے
دہر میں  جتنے تھے مشہور  بھکاری نکلے

تجربہ ہے کہ جہاں تک گئی ہے میری نظر
جسم و دولت کے  کئ  لوگ پجاری  نکلے

ایک پلہ  پہ مصنف   کی لدی تھی پوتھی
میرے دو شعر  مگر  دوجے پہ بھاری نکلے

مرنے کے  بعد  ہی معلوم ہوا  ہے  مجھکو
میرے قاتل تو   مرے  اپنے   حواری نکلے

یہ دعا کرتے   رہو   اپنے  خدا  سے ہر دم
جان   اسلام  پہ ذیشان     ہماری     نکلے

✍ ذیشان آعظمی

Tuesday, November 12, 2019

Karbala ki fatha ka naghma sunaya jayega

کون   پہلا    کون   چوتھا    یہ بتایا جائے گا
قصہ  لوگوں    کو   خلافت کا سنایا جائے گا

آخری    مولا    کو   تو    تشریف لانے دیجئے 
برملا سب    کو    غدیرِ خم    دکھایا جائے گا

کون مومن   کون  کافر چھوڑیئے ان باتوں کو
جب   قیامت    ہوگی    یہ بھی بتایا جائے گا

ممبروں    سے   تو  اے ملّا چاہے جو تقریر کر
تیرا سر    مہدی   کے   آنے   پر   اڑایا جائے گا
 
بے تکی کرتے تھے جو دنیا میں شعر و شاعری
اس کو محشر میں بس شیطاں بلایا جائے گا

ہوگا جب اسلام غالب کل کے کل مذہب پہ تب
کربلا    کی    فتح    کا   نغمہ   سنایا جائے گا

لشکرِ مہدی    میں شامل ہوگا تو بھی بالیقیں 
قبر   سے  ذیشان  جب تجھ کو اٹھایا جائے گا

✍ ذیشان آعظمی




Saturday, October 26, 2019

Baqaa e dahr hai qaim hai gar azaa e Hussain (a.s)

زباں پہ اہلِ عزا کی صدا ہے ہائے حسین
شہید ہوگئے کربل میں سر کٹائے حسین

قریب آتے ہیں خیمہ کے دل سنبھلے ہوئے
بے انتہا علی اکبر کا غم اٹھائے حسین

زمین کانپ اٹھی آسماں لرزنے لگا تھا
جب اپنے ہاتھوں میں اصغر کو رن میں لائے حسین 

جواب کیسے سکینہ کو دے سکےگا وہ باپ
جری کو تنہا ہی مقتل میں چھوڑ آئے حسین 

خدا کا شکر ادا کر بچھا کے فرش عزا کا
بقائے دہر ہے قائم ہے گر عزائے حسین

جہاں سے جاتے ہیں ذیشان وہ خدا کے قریب 
منافقوں کے کئی لاکھ زخم کھائے حسین

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, October 2, 2019

Nasha bik raha hai yaha har gali me

धड़ल्ले    से    बिज़नेस  किए जा रहे हैं
चरस, गांजा, एम डी   दिए    जा  रहे हैं

नशा बिक    रहा   है यहां     हर गली में
जवान   और    बच्चे    लिए   जा रहे हैं

चरस  गांजा एम डी न जाने है क्या क्या
वह    कॉलेज के    बच्चे  पिए जा रहे हैं

बुरी लत    नशे की,     नशा   जानलेवा
के    बे मौत    इंसा     मरे    जा   रहे हैं

नशा कर   रहे    कितने   मासूम    बच्चे
न   जाने   वो   कैसे   जिए   जा   रहे हैं

करे तो  करे  क्या यह  सरकारी अफसर
उन्हें   हुक्म    जो है,    किए   जा रहे हैं

थी उम्मीद मां बाप को जिन से अब तक
वोह    ज़ीशान    चर्सी    हुए   जा रहे हैं

✍ ज़ीशान आज़मी

دھڑلے  سے   بزنس   کئے    جا رہے ہیں
چرس   گانجا  ایم ڈی  دئے جا رہے ہیں

نشہ بک   رہا   ہے   یہاں   ہر گلی   میں
جوان   اور    بچے   لئے    جا  رہے  ہیں

چرس گانجا ایم ڈی نہ جانے ہے کیا کیا
وہ    کالج    کے   بچے  پئے جا رہے ہیں

بری    لت    نشے    کی   نشہ جان لیوا
کہ  بے موت  انساں مرے جا رہا ہے ہیں

نشہ  کر     رہے   کتنے    معصوم   بچے
نہ جانے   وہ    کیسے   جئے جا رہے ہیں

کریں   تو   کریں   کیا یہ سرکاری افسر
انھیں   حکم    جو   ہے کئے جا رہے ہیں

تھی امید  ما ں باپ کو جن سے اب تک
وہ   ذیشان  چرسی    ہوئے  جا رہے ہیں

✍ ذیشان آعظمی

Wednesday, July 10, 2019

Hamara dahr me zinda imaam hai ke nahi

रसूले हक़   पे दुरुद ओ  सलाम   है के नहीं
नबी का   आज भी  देखो क़याम है के नहीं

ग़रज़ है  क्या हमें   कोई  किताब पढ़ने की
नबी का  क़ौल  ख़ुदा  का कलाम है के नहीं

अली की बात  तू करता है सुबह शाम मगर
हमें बता    अली   अव्वल  इमाम है के नहीं

बक़ाए अरज़ो  समा   देखकर यह  बतलाव
हमारा   दहर में   जिंदा इमाम    है  के नहीं

मैं अहले बैत की ज़ीशान आशिकी में जिया
बता के मुझ  पे जहन्नम   हराम है   के नहीं

✍ ज़ीशान आज़मी

رسولِ حق   پہ   درود و سلام ہے کے نہیں
نبی کا    آج بھی  دیکھو قیام ہے کے نہیں

غرض ہے   کیا ہمیں کوئی کتاب پڑھنے کی
نبی کا   قول    خدا   کا   کلام ہے کے نہیں

علی کی بات   تو کرتا ہے صبح و شام مگر
ہمیں    بتا     علی    اول امام ہے کے نہیں

بقائے  ارض و سما     دیکھ   کر   یہ بتلاؤ
ہمارا     دہر     میں زندہ امام ہے کے نہیں

میں اہل بیت کی ذیشان عاشقی میں جِیا
بتا کہ   مجھ پہ   جہنم حرام ہے کے نہیں

✍ ذیشان آعظمی

Saturday, June 29, 2019

Baat itni si thi bas jiska fasana ho gaya

राहे हक़  पर   चलते ही   दुश्मन  ज़माना हो गया
अपनी क़िस्मत थी जो बातिल से किनारा हो गया

हम से तुम   अहवाल न  पूछो सियासत दानों का
माले दुनिया के   लिए एक एक  दिवाना हो गया

अबरे रहमत   तो    बरसता    है   मगर तन्हाई मे
यह ज़ुबां    कैसे कहे    मौसम    सुहाना  हो गया

एक    सवाल    उन से जो पूछा तो  गुस्सा हो गए
बात इतनी  सी थी बस जिस  का फसाना हो गया

बद नसीबी यह   नही   ज़ीशान   तो   क्या है मेरी
एक दिल   था मेरा    वह    भी  शायराना हो गया

✍ ज़ीशान आज़मी

راہِ حق پر   چلتے    ہی    دشمن زمانہ ہو گیا
اپنی قسمت    تھی جو باطل سے کنارہ ہو گیا

ہم سے تم احوال نہ پوچھو سیاست دانوں کا
مالِ دنیا    کے لئے    اک    اک    دِوانہ   ہو گیا

ابرِ رحمت    تو    برستا ہے    مگر  تنہائی میں
یہ زباں    کیسے    کہے   موسم   سہانہ ہو گیا

اک سوال ان سے جو پوچھا تو وہ غصہ ہو گئے
بات اتنی سی  تھی بس  جس کا فسانہ ہو گیا

بد نصیبی    یہ  نہیں    ذیشان   تو کیا ہے مری
ایک دل   تھا میرا   وہ   بھی    شاعرانہ ہو گیا

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, June 16, 2019

Girta hi ja rahaa hai kiyo mey'aar din ba din

इसकीम अच्छी लाती है सरकार दिन-ब-दिन
फिर भी अवाम   इससे है बेज़ार दिन-ब-दिन

मनसब के वास्ते   यह सियासत   की चाह में
बढ़चढ़ के आगे आते हैं हक़दार दिन-ब-दिन

बदहाली  क्यों न आएगी अपने वतन में गर
मसनद    पे बैठे  रहे    बेकार   दिन-ब-दिन

सरकारी     हस्पताल   नहीं    इसलिए यहां
हर सिम्त  बढ़ते जाते हैं बीमार दिन-ब-दिन

अल्लाह    की किताब     तो मौजूद है अभी
गिरता ही जा रहा है क्यों मेआर दिन-ब-दिन

जुल्मों   सितम है   आंखों के  ज़ीशान सामने
मजबूर हूं मैं लिखने को अशआर दिन-ब-दिन

✍ ज़ीशान आज़मी

اسکیم اچھی    لا تی   ہے سرکار دن بہ دن
پھر بھی عوام   اس سے ہے بیزار دن بہ دن

منصب کے واسطے یہ سیاست کی چاہ میں
بڑھ چڑھ کے آگے آ تے ہیں حقدار دن بہ دن

بد حالی کیو نہ آے گی اپنے وطن میں گر
مسند پہ    بیٹھتے    رہے   بیکار دن بہ دن

سرکاری     ہسپتال     نہیں اس لئے   یہاں
ہر سمت بڑھتے جاتے ہیں  بیمار  دن بہ دن

اللہ کی    کتاب    تو     موجود   ہے ابھی
گرتا ہی   جارہا ہے  کیوں  معیار دن بہ دن

ظلم و ستم ہیں آنکھوں کے ذیشان سامنے
مجبور ہوں میں لکھنے کو اشعار دن بہ دن

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, June 13, 2019

Matam kunaaN hai rooh e risalat Baqee me

उजड़ी पड़ी है सालों से तुरबत बक़ीअ में
बिनते नबी पे  कैसी है आफत बक़ीअ में

ढाते  हैं     ज़ुल्म   मानने   वाले रसूल के
कैसे मिलेगी फिर  उन्हें   राहत बक़ीअ में

आते   हैं बार-बार    मुलाक़ात    के लिए
बेशक है  ज़ायेरीन   की जन्नत बक़ीअ में

अफसोस    का मुक़ाम है रोता है आसमां
मातम कुना  है रूह ए रिसालत बक़ीअ में

ज़ीशान  की   दुआ है    खुदा ए क़दीर से
तामिर फिर से जल्द हो तुरबत बक़ीअ में

✍ ज़ीशान आज़मी

اجڑی پڑی ہے  سالوں سے تربت بقیع میں
بنتِ نبی  پہ   کیسی   ہے  آفت بقیع میں

ڈھاتے   ہیں ظلم   ماننے والے   رسول کے
کیسے ملےگی پھر انھیں راحت بقیع میں

آتے    ہیں    بار    بار    ملاقات     کے لئے
بےشک     ہے   زائرین کی جنت بقیع میں

افسوس   کا مقام     ہے    روتا ہے آسماں
ماتم کناں    ہے  روحِ رسالت    بقيع  میں

ذیشان     کی دعا    ہے    خداے قدیر سے
تعمیر پھر    سے   جلد ہو تربت بقیع میں

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, June 9, 2019

Ke sach baat kahna hai aadat hamari

खुदा      जानता   है  इबादत    हमारी
मोहब्बत     हमारी    अदावत   हमारी

दुआ रब से   मांगो  वह हाजत रवा है
वह  करता    है  पूरी   जरूरत हमारी

ए हाथों को  फैलाने   वाले  यक़ीं रख
खुदा ही  बदलता  है   क़िस्मत हमारी

वतन के  लिए  जान   हमने  भी दी है
उन्हें  पर   कहां  क़दरो  क़िमत हमारी

हुकूमत का मौक़ा अगर हमको मिलता
दिखा  देते  हम  भी   अदालत  हमारी

कहूं   दूध को दूध,      पानी को पानी
के सच  बात कहना है  आदत हमारी

अगर हम  भी   ज़ीशान  होते ग़नी तो
जहां देखता    फिर  सख़ावत  हमारी

✍ ज़ीशान आज़मी

خدا      جانتا     ہے    عبادت    ہماری
محبت      ہماری     عداوت      ہماری

دعا رب  سے مانگو وہ حاجت  روا ہے
وہ کرتا ہے    پوری     ضرورت  ہماری

اے ہاتھوں کو پھیلانے والے یقیں رکھ
خدا ہی    بدلتا     ہے     قسمت ہماری

وطن    کے  لئے جان ہم نے بھی دی ہے
اُنھیں    پر    کہاں قدر و قیمت ہماری

حکومت   کا    موقع    اگر ہم کو ملتا
دکھا   دیتے ہم    بھی  عدالت   ہماری

کہوں   دودھ  کو  دودھ پانی کو پانی
کہ سچ     بات    کہنا  ہے عادت ہماری

اگر ہم     بھی    ذیشان  ہوتے  غنی تو
جہاں   دیکھتا     پھر   سخاوت ہماری

✍ ذیشان آعظمی

Monday, June 3, 2019

Phir baat mere man ki man me rah gayee

न जाने   उम्र    कौन     से   मदफन में रह गई
एक ज़िंदगी थी    क़िमती   उलझन  में रह गई

मुझको    नहीं था    शौक़ जवानी का हाँ मगर
यह   आरज़ू    मेरी   बचपन    में     रह    गई

यह मुजेज़ा किताबे    खुदा   का    नहीं तो क्या
आयत जो दिल में उतरी वह धड़कन में रह गई

कुछ    बात मैं   कहूं    कि   सभी  टोकने   लगे
फिर बात    मेरे   मन की  मेरे    मन  में रह गई

देखा    था ख्वाब    मैंने  जो अहलो अयाल का
ज़ीशान एक   वो याद   भी    गुलशन में रह गई

✍ ज़ीशान आज़मी

نہ جانے عمر کون    سے   مدفن  میں رہ گئی
اک زندگی تھی    قیمتی الجھن میں رہ گئی

مجھ   کو نہیں  تھا شوق جوانی کا ہاں مگر
یہ ایک    آرزو    مری     بچپن   میں رہ گئی

یہ معجزہ   کتابِ    خدا    کا    نہیں  تو کیا
آیت جو دل میں اتری وہ دھڑکن میں رہ گئی

کچھ   بات میں  کہوں کہ   سبھی ٹوکنے لگے
پھر بات  میرے من کی مرے من میں  رہ گئی

دیکھا تھا  خواب   میں   نے جو اہل و عیال کا
ذیشان اک   وہ     یاد بھی  گلشن میں  رہ گئی

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, May 19, 2019

Aaj bhi batil ke dil me aap ka hai dar Hasan (as)

हर मुसलमां    के हैं मौला,  सिब्ते पैगंबर हसन
दो     जहां के   वास्ते हैं    दूसरे    रहबर हसन

देखिए कितनी   मुबारक    है विलादत आपकी
देता है हर एक फरिश्ता तहनियत आकर हसन

कर्बला होती   ना होता   नाम   का कोई यज़ीद
ग़ैज़ में   तलवार    हाथों में   उठाते    गर हसन

सुल्ह नामे    में हकीकत  वह लिखी   थी आपने
आज भी बातिल के दिल में आपका है डर हसन

मोमिनो के   लब पे होगी  मनक़बत हर दम मेरी
मदख़ां ज़ीशान   है मेरा  यह  कह   दें गर हसन

✍ ज़ीशान आज़मी

ہر مسلماں کے  ہیں مولا    سبطِ پیغمبر حسن
دو جہاں کے واسطے   ہیں دوسرے رہبر حسن

دیکھئے   کتنی    مبارک    ہے ولادت    آپ کی
دیتا ہے    ہر اک     فرشتہ    تہنیت  آکر حسن

کربلا ہوتی   نہ ہوتا    نام    کا    کوئی   یزید
غیظ میں   تلوار ہاتھوں میں اٹھاتے  گر حسن

صلح نامہ   میں حقیقت وہ لکھی تھی آپ نے
آج بھی  باطل کے  دل میں آپ کا ہے  ڈر حسن

مومنوں   کے   لب  پہ ہوگی منقبت ہر دم مری
مدح خواں ذیشان ہے میرا یہ کہ دیں گر حسن

✍ ذیشان آعظمی

Monday, April 29, 2019

Kabhi khushi kabhi ranj o malaal deta hai

मेरा खुदा   मुझे   इल्मो   ख़याल  देता है
मुसीबतों  को  मेरे   सर   से  टाल देता है

ख़याल रखते हैं  जो अपने रिश्तेदारों का
खुदाए हक़   उन्हें रिज़क़े  हलाल देता है

किसी के सामने  दामन नहीं जो फैलाता
उसे खुदा   बड़े   अच्छे   से पाल देता है

रज़ाए रब के लिए जो मदद करें सब  की
ज़माना   ऐसे   बशर  की मिसाल देता है

मुझे नहीं   है   भरोसा किसी भी नेता पर
बहाने करके   वो   हर काम  टाल देता है

खुदा के इल्म में सब है,  वही तो इंसां को
कभी  खुशी    कभी   रंजो मलाल देता है

अजीब  बात है ज़ीशान जो हैं ना वाक़िफ
वह   नाम    चार मे   मेरा उछाल   देता है

✍ ज़ीशान आज़मी

مرا خدا    مجھے    علم و خیال     دیتا ہے
مصیبتوں    کو مرے    سر سے ٹال دیتا ہے

خیال رکھتے   ہیں جو اپنے رشتہ داروں کا
خدائے حق    انھیں    رزقِ حلال    دیتا ہے

کسی    کے    سامنے دامن نہیں جو پھیلاتا
اسے    خدا بڑے    اچھے   سے  پال دیتا ہے

رضائے رب  کے   لئے جو مدد کرے سب کی
زمانہ     ایسے     بشر کی     مثال  دیتا ہے

مجھے  نہیں ہے بھروسہ کسی بھی نیتا پر
بہانے     کرکے    وہ    ہر    کام  ٹال دیتا ہے

خدا کے علم میں سب ہے وہی تو انساں کو
کبھی   خوشی   کبھی  رنج و ملال دیتا ہے

عجیب   بات   ہے   ذیشان جو ہیں نا واقف
وہ    نام    چار    میں  میرا اچھال دیتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Aap ke aane se kaabe ko sajaya jayega

तर्जुमा दिलचस्प    क़ुरआं का    सुनाया जाएगा
एक नया   क़ुरआन   बच्चों को   पढ़ाया जाएगा

बांट कर फिरक़ों मे हम सबको ए मोमिन देखना
एक दिन    तालीमे   क़ुरआं से    हटाया जाएगा

हाजतें    मांगते हैं    अपने   रब  को    भूल कर
देखना    भगवान,    मेहदी को   बनाया जाएगा

मुंतज़िर है    सदियों  से पहने हुए काला लिबास
आपके    आने पे    काबे     को सजाया जाएगा

क्या पता   ज़ीशान हम को हाल मुरतद कौम का
आलिमे  क़ुरआं से     पूछो     तो बताया जाएगा

✍ ज़ीशान आज़मी

ترجمہ    دل چسپ      قرآں     کا سنایا جائے گا
اک نیا      قرآن      بچوں      کو پڑھایا  جائے گا

بانٹ کر فرقوں میں ہم سب کو اے مومن دیکھنا
ایک دن      تعلیمِ قرآں       سے   ہٹایا   جائے گا

حاجتیں   وہ مانگتے   ہیں اپنے رب کو بھول کر
دیکھنا       بھگوان     مہدی  کو    بنایا جائے گا

منتظر ہے     صدیوں    سے   پہنے ہوئے کالا لباس
آپ کے      آنے      پہ     کعبہ  کو سجایا جائے گا

کیا     پتا     ذیشان    ہم کو    حال مرتد قوم کا
عالمِ قرآں      سے      پوچھو    تو بتایا  جائے گا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, April 8, 2019

Darwaaze khule sainkadon is maahe jabeeN par

نظروں نے میری   دیکھا ہے  یہ عرش بریں پر
ایک    معجزہ    احمد   کا   ہے قرآن، زمیں پر

ہم  سے    تو   منافق  بھی کہیں گے   یہ یقیناً
تم  جیسا نمونہ    نہیں    دیکھا   ہے کہیں  پر

یہ دوستوں کی دیکھئے فطرت بھی  عجب ہے
وہ دیکھتے   ہیں   ہم  کو مگر دھیان کہیں پر

وہ اب بھی  اسی   طرح  مجھے  چاہتی ہوگی
اتنا تو   بھروسہ    ہے مجھے  دل کے مکیں پر

ہم خواب   نہیں   دیکھتے   ہیں ان کے علاوہ
ہر خواب   نچھاور  ہے وہ  اک شوخ حسیں پر

نورانی   ہے   چہرہ    نبی   کا،    علم و ہنر کے
دروازے  کھلے   سینکڑوں  اس   ماہ جبیں پر

کچھ یوں بھی خدا نے دی ہے ذیشان کو شہرت
ہے فکر    بلندی   پہ   مگر    پا    ہے  زمیں پر

✍ ذیشان آعظمی

नजरों     ने मेरी      देखा    है     यह     अरशे    बरीं पर
एक    मोजेज़ा       अहमद का    है क़ुरआन,    जमीं पर

हमसे तो मुनाफिक़ भी कहेंगे फिर भी कहेंगे यह यकीनन
तुम       जैसा     नमूना       नहीं      देखा     है कहीं पर

यह      दोस्तों       की      देखिए     फितरत भी अजब है
वह   देखते    हैं       हमको    मगर     ध्यान     कहीं पर

वह    अब    भी     उसी    तरह    मुझे    चाहती    होगी
इतना    तो    भरोसा     है     मुझे     दिल   के  मकीं पर

हम     ख्वाब नहीं        देखते     हैं      उनके     अलावा
हर ख्वाब     निछावर      है     वह    एक शौख़ हंसी पर

नूरानी     है       चेहरा      नबी का,          इल्मो हुनर के
दरवाजे खुले      सैंकड़ों       इस          माहे    जबीं पर

कुछ युं    भी      खुदा    ने दी है     ज़ीशान  को शोहरत
है      फिक्र      बुलंदी     पे      मगर     पा   है जमीं पर

✍ ज़ीशान आज़मी

Tuesday, April 2, 2019

Kis ko khabar hai kon sa aansoo qabool ho

رحمت کا    قبر    پر میری    یا   رب نزول ہو
وہ آئے    اس کے    ہاتھ    عقیدت کا پھول ہو

میں دور   اس    لئے ہوں شراب و شباب سے
منظور ہی    نہیں    مجھے   خرچہ فضول ہو

اس دور    میں    کمی نہیں ظالم کے ظلم کی
مظلوم    کی    دعا مرے     خالق    قبول  ہو

وعدہ خلافی   مجھ  سے کیا تجھ کو کیا ملا
لعنت خدا کی تجھ پہ ترے منہ میں دھول ہو

میں روکتا    ہوں سب    کو برائی سے یا خدا
چلتا ہوں    نیک  راہ پہ مجھ سے نہ بھول ہو

ظالم تو   آنسوؤں    سے    ڈرا کر    کہ آہ سے
کس کو    خبر ہے    کون   سا آنسو   قبول ہو

ذیشان کی    تمنا    ہے   یا رب وہ خواب میں
جب    دیکھے   رات  میں تو نبی و رسول ہو

✍ ذیشان آعظمی

रहमत का    कब्र पर     मेरी  या रब नूज़ूल हो
वह आए     उसके हाथ अकीदत  का फूल हो

मैं दूर      इसलिए    हूं      शराबो     शबाब से
मंज़ूर ही    नहीं    मुझे     खर्चा    फुज़ूल   हो

इस दौर में    कमी नहीं   ज़ालिम के ज़ुल्म की
मज़लूम    की दुआ    मेरे ख़ालिक़   क़ुबूल हो

वादा खिलाफी मुझसे किया तुझको क्या मिला
लानत   खुदा की    तुझ पे तेरे   मुंह में धूल हो

मैं रोकता    हूं सब    को    बुराई   से, या खुदा
चलता हूं नेक     राह पे     मुझ    से न भूल हो

ज़ालिम तू    आंसुओं से डरा कर    के आह से
किसको खबर    है कौन    सा  आंसू क़ुबूल हो

ज़ीशान की तमन्ना है    या रब    वह  ख्वाब मे
जब देखे    रात में तो     नबी    ओ    रसूल हो

✍ ज़ीशान आज़मी

Sunday, March 31, 2019

Aur bhi dukh hai zamane me mohabbat ke siwa

जिंदगी बेकार है    ऐ दोस्त    क़ुरबत  के सिवा
दुश्मनी से कुछ नहीं मिलता है नफरत के सिवा

काम धंधे छोड़कर    ए दोस्तों    रोते    हो क्यों
और भी दुख  हैं ज़माने   में   मोहब्बत के सिवा

✍ ज़ीशान आज़मी

زندگی    بیکار   ہے   اے   دوست  قربت کے سوا
دشمنی  سے   کچھ نہیں   ملتا ہے نفرت کے سوا

کام دھندے چھوڑ کر اے دوستوں روتے ہو کیوں
اور بھی    دکھ    ہے  زمانے میں محبت کے سوا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, March 25, 2019

Khoon ke Rishtey wafaa ki jo alamat hote

مال و زر   ہوتے   تو ہم   صاحبِ عزت ہوتے
آپ لوگوں    کی دعاؤں    سے  سلامت ہوتے

سب کے اعمال اگر   ماتھے پہ لکھ دیتا خدا
چھوڑ   کر  کچھ کو سبھی قابلِ نفرت ہوتے

کاش اس نے    کبھی    اک    بار   بلایا ہوتا
ان کے    دربار   میں ہم حاضرِ خدمت ہوتے

دور   اس  دیس سے جانا تھا ہمیشہ کے لئے
دوست ہم آپ کے تھے بول کے رخصت ہوتے

پڑھتے  اشعار ہمارے  بھی کھبی فرصت سے
آپ کی    نظروں   میں ہم لائقِ مدحت ہوتے

قدر ہوتی   ہی نہیں  دوستوں کی دنیا میں
خون کے   رشتے   وفا کی  جو علامت ہوتے

خلق  ذیشان   خدا    کرتا    نہیں دوزخ  کو
سب   اگر دنیا    میں   پابندِ  شریعت  ہوتے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, March 18, 2019

Jis Shakhs ki zubaan pe shuk-e-khuda rahe

मेरी    हयात कि    तेरे लब   पर दुआ  रहे
मैं   चाहता    नहीं  तू    सदा    बेवफा रहे

एक बार मिल के तू मेरे  दिल को क़रार दे
ज़ख्मे  जिगर   ना मेरा   हमेशा   हरा  रहे

दिल है   कि भूलता  नहीं  तस्वीर यार की
कोशिश तो की थी दिल में कोई दूसरा रहे

मिलता हूं   रोज-रोज   मैं   महबूब  से मेरे
आंखों में   ऐसा   ख्वाब   हमेशा सजा रहे

खुशबू की  तरह महकेंगे अशआर  भी मेरे
यह माजरा    है इश्क़ का    कैसे  छुपा रहे

मायूस   जिंदगी    से रहे    कैसे वह भला
जिस शख्स की ज़ुबान पर शुकरे खुदा रहे

ज़ीशान    कामयाब    तू होगा   जरूर गर
रब पर    यक़ीन    और लबों पर दुआ रहे

✍ ज़ीशान आज़मी

میری     حیات کی      ترے      لب   دعا رہے
میں   چاہتا    نہیں   تو     سدا    بے وفا رہے

اک   بار    مل   کے تو مرے  دل  کو قرار دے
زخمِ جگر      نہ     میرا    ہمیشہ     ہرا   رہے

دل ہے   کہ   بھولتا    نہیں   تصویر    یار کی
کوشش تو کی تھی دل میں کوئی دوسرا رہے

ملتا ہوں   روز   روز میں محبوب  سے  مرے
آنکھوں   میں  ایسا خواب ہمیشہ   سجا رہے

خوشبو کی طرح مہکے نگے اشعار  بھی مرے
یہ   ماجرا    ہے   عشق کا   کیسے  چھپا رہے

مایوس    زندگی    سے   رہے کیسے  وہ بھلا
جس    شخص    کی  زبان پہ  شکرِ خدا رہے

ذیشان    کامیاب     تو     ہوگا    ضرور   گر
رب پر    یقین     اور      لبوں    پر  دعا  رہے

✍ ذیشان آعظمی