Sunday, June 16, 2019

Girta hi ja rahaa hai kiyo mey'aar din ba din

इसकीम अच्छी लाती है सरकार दिन-ब-दिन
फिर भी अवाम   इससे है बेज़ार दिन-ब-दिन

मनसब के वास्ते   यह सियासत   की चाह में
बढ़चढ़ के आगे आते हैं हक़दार दिन-ब-दिन

बदहाली  क्यों न आएगी अपने वतन में गर
मसनद    पे बैठे  रहे    बेकार   दिन-ब-दिन

सरकारी     हस्पताल   नहीं    इसलिए यहां
हर सिम्त  बढ़ते जाते हैं बीमार दिन-ब-दिन

अल्लाह    की किताब     तो मौजूद है अभी
गिरता ही जा रहा है क्यों मेआर दिन-ब-दिन

जुल्मों   सितम है   आंखों के  ज़ीशान सामने
मजबूर हूं मैं लिखने को अशआर दिन-ब-दिन

✍ ज़ीशान आज़मी

اسکیم اچھی    لا تی   ہے سرکار دن بہ دن
پھر بھی عوام   اس سے ہے بیزار دن بہ دن

منصب کے واسطے یہ سیاست کی چاہ میں
بڑھ چڑھ کے آگے آ تے ہیں حقدار دن بہ دن

بد حالی کیو نہ آے گی اپنے وطن میں گر
مسند پہ    بیٹھتے    رہے   بیکار دن بہ دن

سرکاری     ہسپتال     نہیں اس لئے   یہاں
ہر سمت بڑھتے جاتے ہیں  بیمار  دن بہ دن

اللہ کی    کتاب    تو     موجود   ہے ابھی
گرتا ہی   جارہا ہے  کیوں  معیار دن بہ دن

ظلم و ستم ہیں آنکھوں کے ذیشان سامنے
مجبور ہوں میں لکھنے کو اشعار دن بہ دن

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, June 13, 2019

Matam kunaaN hai rooh e risalat Baqee me

उजड़ी पड़ी है सालों से तुरबत बक़ीअ में
बिनते नबी पे  कैसी है आफत बक़ीअ में

ढाते  हैं     ज़ुल्म   मानने   वाले रसूल के
कैसे मिलेगी फिर  उन्हें   राहत बक़ीअ में

आते   हैं बार-बार    मुलाक़ात    के लिए
बेशक है  ज़ायेरीन   की जन्नत बक़ीअ में

अफसोस    का मुक़ाम है रोता है आसमां
मातम कुना  है रूह ए रिसालत बक़ीअ में

ज़ीशान  की   दुआ है    खुदा ए क़दीर से
तामिर फिर से जल्द हो तुरबत बक़ीअ में

✍ ज़ीशान आज़मी

اجڑی پڑی ہے  سالوں سے تربت بقیع میں
بنتِ نبی  پہ   کیسی   ہے  آفت بقیع میں

ڈھاتے   ہیں ظلم   ماننے والے   رسول کے
کیسے ملےگی پھر انھیں راحت بقیع میں

آتے    ہیں    بار    بار    ملاقات     کے لئے
بےشک     ہے   زائرین کی جنت بقیع میں

افسوس   کا مقام     ہے    روتا ہے آسماں
ماتم کناں    ہے  روحِ رسالت    بقيع  میں

ذیشان     کی دعا    ہے    خداے قدیر سے
تعمیر پھر    سے   جلد ہو تربت بقیع میں

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, June 9, 2019

Ke sach baat kahna hai aadat hamari

खुदा      जानता   है  इबादत    हमारी
मोहब्बत     हमारी    अदावत   हमारी

दुआ रब से   मांगो  वह हाजत रवा है
वह  करता    है  पूरी   जरूरत हमारी

ए हाथों को  फैलाने   वाले  यक़ीं रख
खुदा ही  बदलता  है   क़िस्मत हमारी

वतन के  लिए  जान   हमने  भी दी है
उन्हें  पर   कहां  क़दरो  क़िमत हमारी

हुकूमत का मौक़ा अगर हमको मिलता
दिखा  देते  हम  भी   अदालत  हमारी

कहूं   दूध को दूध,      पानी को पानी
के सच  बात कहना है  आदत हमारी

अगर हम  भी   ज़ीशान  होते ग़नी तो
जहां देखता    फिर  सख़ावत  हमारी

✍ ज़ीशान आज़मी

خدا      جانتا     ہے    عبادت    ہماری
محبت      ہماری     عداوت      ہماری

دعا رب  سے مانگو وہ حاجت  روا ہے
وہ کرتا ہے    پوری     ضرورت  ہماری

اے ہاتھوں کو پھیلانے والے یقیں رکھ
خدا ہی    بدلتا     ہے     قسمت ہماری

وطن    کے  لئے جان ہم نے بھی دی ہے
اُنھیں    پر    کہاں قدر و قیمت ہماری

حکومت   کا    موقع    اگر ہم کو ملتا
دکھا   دیتے ہم    بھی  عدالت   ہماری

کہوں   دودھ  کو  دودھ پانی کو پانی
کہ سچ     بات    کہنا  ہے عادت ہماری

اگر ہم     بھی    ذیشان  ہوتے  غنی تو
جہاں   دیکھتا     پھر   سخاوت ہماری

✍ ذیشان آعظمی

Monday, June 3, 2019

Phir baat mere man ki man me rah gayee

न जाने   उम्र    कौन     से   मदफन में रह गई
एक ज़िंदगी थी    क़िमती   उलझन  में रह गई

मुझको    नहीं था    शौक़ जवानी का हाँ मगर
यह   आरज़ू    मेरी   बचपन    में     रह    गई

यह मुजेज़ा किताबे    खुदा   का    नहीं तो क्या
आयत जो दिल में उतरी वह धड़कन में रह गई

कुछ    बात मैं   कहूं    कि   सभी  टोकने   लगे
फिर बात    मेरे   मन की  मेरे    मन  में रह गई

देखा    था ख्वाब    मैंने  जो अहलो अयाल का
ज़ीशान एक   वो याद   भी    गुलशन में रह गई

✍ ज़ीशान आज़मी

نہ جانے عمر کون    سے   مدفن  میں رہ گئی
اک زندگی تھی    قیمتی الجھن میں رہ گئی

مجھ   کو نہیں  تھا شوق جوانی کا ہاں مگر
یہ ایک    آرزو    مری     بچپن   میں رہ گئی

یہ معجزہ   کتابِ    خدا    کا    نہیں  تو کیا
آیت جو دل میں اتری وہ دھڑکن میں رہ گئی

کچھ   بات میں  کہوں کہ   سبھی ٹوکنے لگے
پھر بات  میرے من کی مرے من میں  رہ گئی

دیکھا تھا  خواب   میں   نے جو اہل و عیال کا
ذیشان اک   وہ     یاد بھی  گلشن میں  رہ گئی

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, May 19, 2019

Aaj bhi batil ke dil me aap ka hai dar Hasan (as)

हर मुसलमां    के हैं मौला,  सिब्ते पैगंबर हसन
दो     जहां के   वास्ते हैं    दूसरे    रहबर हसन

देखिए कितनी   मुबारक    है विलादत आपकी
देता है हर एक फरिश्ता तहनियत आकर हसन

कर्बला होती   ना होता   नाम   का कोई यज़ीद
ग़ैज़ में   तलवार    हाथों में   उठाते    गर हसन

सुल्ह नामे    में हकीकत  वह लिखी   थी आपने
आज भी बातिल के दिल में आपका है डर हसन

मोमिनो के   लब पे होगी  मनक़बत हर दम मेरी
मदख़ां ज़ीशान   है मेरा  यह  कह   दें गर हसन

✍ ज़ीशान आज़मी

ہر مسلماں کے  ہیں مولا    سبطِ پیغمبر حسن
دو جہاں کے واسطے   ہیں دوسرے رہبر حسن

دیکھئے   کتنی    مبارک    ہے ولادت    آپ کی
دیتا ہے    ہر اک     فرشتہ    تہنیت  آکر حسن

کربلا ہوتی   نہ ہوتا    نام    کا    کوئی   یزید
غیظ میں   تلوار ہاتھوں میں اٹھاتے  گر حسن

صلح نامہ   میں حقیقت وہ لکھی تھی آپ نے
آج بھی  باطل کے  دل میں آپ کا ہے  ڈر حسن

مومنوں   کے   لب  پہ ہوگی منقبت ہر دم مری
مدح خواں ذیشان ہے میرا یہ کہ دیں گر حسن

✍ ذیشان آعظمی

Monday, April 29, 2019

Kabhi khushi kabhi ranj o malaal deta hai

मेरा खुदा   मुझे   इल्मो   ख़याल  देता है
मुसीबतों  को  मेरे   सर   से  टाल देता है

ख़याल रखते हैं  जो अपने रिश्तेदारों का
खुदाए हक़   उन्हें रिज़क़े  हलाल देता है

किसी के सामने  दामन नहीं जो फैलाता
उसे खुदा   बड़े   अच्छे   से पाल देता है

रज़ाए रब के लिए जो मदद करें सब  की
ज़माना   ऐसे   बशर  की मिसाल देता है

मुझे नहीं   है   भरोसा किसी भी नेता पर
बहाने करके   वो   हर काम  टाल देता है

खुदा के इल्म में सब है,  वही तो इंसां को
कभी  खुशी    कभी   रंजो मलाल देता है

अजीब  बात है ज़ीशान जो हैं ना वाक़िफ
वह   नाम    चार मे   मेरा उछाल   देता है

✍ ज़ीशान आज़मी

مرا خدا    مجھے    علم و خیال     دیتا ہے
مصیبتوں    کو مرے    سر سے ٹال دیتا ہے

خیال رکھتے   ہیں جو اپنے رشتہ داروں کا
خدائے حق    انھیں    رزقِ حلال    دیتا ہے

کسی    کے    سامنے دامن نہیں جو پھیلاتا
اسے    خدا بڑے    اچھے   سے  پال دیتا ہے

رضائے رب  کے   لئے جو مدد کرے سب کی
زمانہ     ایسے     بشر کی     مثال  دیتا ہے

مجھے  نہیں ہے بھروسہ کسی بھی نیتا پر
بہانے     کرکے    وہ    ہر    کام  ٹال دیتا ہے

خدا کے علم میں سب ہے وہی تو انساں کو
کبھی   خوشی   کبھی  رنج و ملال دیتا ہے

عجیب   بات   ہے   ذیشان جو ہیں نا واقف
وہ    نام    چار    میں  میرا اچھال دیتا ہے

✍ ذیشان آعظمی

Aap ke aane se kaabe ko sajaya jayega

तर्जुमा दिलचस्प    क़ुरआं का    सुनाया जाएगा
एक नया   क़ुरआन   बच्चों को   पढ़ाया जाएगा

बांट कर फिरक़ों मे हम सबको ए मोमिन देखना
एक दिन    तालीमे   क़ुरआं से    हटाया जाएगा

हाजतें    मांगते हैं    अपने   रब  को    भूल कर
देखना    भगवान,    मेहदी को   बनाया जाएगा

मुंतज़िर है    सदियों  से पहने हुए काला लिबास
आपके    आने पे    काबे     को सजाया जाएगा

क्या पता   ज़ीशान हम को हाल मुरतद कौम का
आलिमे  क़ुरआं से     पूछो     तो बताया जाएगा

✍ ज़ीशान आज़मी

ترجمہ    دل چسپ      قرآں     کا سنایا جائے گا
اک نیا      قرآن      بچوں      کو پڑھایا  جائے گا

بانٹ کر فرقوں میں ہم سب کو اے مومن دیکھنا
ایک دن      تعلیمِ قرآں       سے   ہٹایا   جائے گا

حاجتیں   وہ مانگتے   ہیں اپنے رب کو بھول کر
دیکھنا       بھگوان     مہدی  کو    بنایا جائے گا

منتظر ہے     صدیوں    سے   پہنے ہوئے کالا لباس
آپ کے      آنے      پہ     کعبہ  کو سجایا جائے گا

کیا     پتا     ذیشان    ہم کو    حال مرتد قوم کا
عالمِ قرآں      سے      پوچھو    تو بتایا  جائے گا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, April 8, 2019

Darwaaze khule sainkadon is maahe jabeeN par

نظروں نے میری   دیکھا ہے  یہ عرش بریں پر
ایک    معجزہ    احمد   کا   ہے قرآن، زمیں پر

ہم  سے    تو   منافق  بھی کہیں گے   یہ یقیناً
تم  جیسا نمونہ    نہیں    دیکھا   ہے کہیں  پر

یہ دوستوں کی دیکھئے فطرت بھی  عجب ہے
وہ دیکھتے   ہیں   ہم  کو مگر دھیان کہیں پر

وہ اب بھی  اسی   طرح  مجھے  چاہتی ہوگی
اتنا تو   بھروسہ    ہے مجھے  دل کے مکیں پر

ہم خواب   نہیں   دیکھتے   ہیں ان کے علاوہ
ہر خواب   نچھاور  ہے وہ  اک شوخ حسیں پر

نورانی   ہے   چہرہ    نبی   کا،    علم و ہنر کے
دروازے  کھلے   سینکڑوں  اس   ماہ جبیں پر

کچھ یوں بھی خدا نے دی ہے ذیشان کو شہرت
ہے فکر    بلندی   پہ   مگر    پا    ہے  زمیں پر

✍ ذیشان آعظمی

नजरों     ने मेरी      देखा    है     यह     अरशे    बरीं पर
एक    मोजेज़ा       अहमद का    है क़ुरआन,    जमीं पर

हमसे तो मुनाफिक़ भी कहेंगे फिर भी कहेंगे यह यकीनन
तुम       जैसा     नमूना       नहीं      देखा     है कहीं पर

यह      दोस्तों       की      देखिए     फितरत भी अजब है
वह   देखते    हैं       हमको    मगर     ध्यान     कहीं पर

वह    अब    भी     उसी    तरह    मुझे    चाहती    होगी
इतना    तो    भरोसा     है     मुझे     दिल   के  मकीं पर

हम     ख्वाब नहीं        देखते     हैं      उनके     अलावा
हर ख्वाब     निछावर      है     वह    एक शौख़ हंसी पर

नूरानी     है       चेहरा      नबी का,          इल्मो हुनर के
दरवाजे खुले      सैंकड़ों       इस          माहे    जबीं पर

कुछ युं    भी      खुदा    ने दी है     ज़ीशान  को शोहरत
है      फिक्र      बुलंदी     पे      मगर     पा   है जमीं पर

✍ ज़ीशान आज़मी

Tuesday, April 2, 2019

Kis ko khabar hai kon sa aansoo qabool ho

رحمت کا    قبر    پر میری    یا   رب نزول ہو
وہ آئے    اس کے    ہاتھ    عقیدت کا پھول ہو

میں دور   اس    لئے ہوں شراب و شباب سے
منظور ہی    نہیں    مجھے   خرچہ فضول ہو

اس دور    میں    کمی نہیں ظالم کے ظلم کی
مظلوم    کی    دعا مرے     خالق    قبول  ہو

وعدہ خلافی   مجھ  سے کیا تجھ کو کیا ملا
لعنت خدا کی تجھ پہ ترے منہ میں دھول ہو

میں روکتا    ہوں سب    کو برائی سے یا خدا
چلتا ہوں    نیک  راہ پہ مجھ سے نہ بھول ہو

ظالم تو   آنسوؤں    سے    ڈرا کر    کہ آہ سے
کس کو    خبر ہے    کون   سا آنسو   قبول ہو

ذیشان کی    تمنا    ہے   یا رب وہ خواب میں
جب    دیکھے   رات  میں تو نبی و رسول ہو

✍ ذیشان آعظمی

रहमत का    कब्र पर     मेरी  या रब नूज़ूल हो
वह आए     उसके हाथ अकीदत  का फूल हो

मैं दूर      इसलिए    हूं      शराबो     शबाब से
मंज़ूर ही    नहीं    मुझे     खर्चा    फुज़ूल   हो

इस दौर में    कमी नहीं   ज़ालिम के ज़ुल्म की
मज़लूम    की दुआ    मेरे ख़ालिक़   क़ुबूल हो

वादा खिलाफी मुझसे किया तुझको क्या मिला
लानत   खुदा की    तुझ पे तेरे   मुंह में धूल हो

मैं रोकता    हूं सब    को    बुराई   से, या खुदा
चलता हूं नेक     राह पे     मुझ    से न भूल हो

ज़ालिम तू    आंसुओं से डरा कर    के आह से
किसको खबर    है कौन    सा  आंसू क़ुबूल हो

ज़ीशान की तमन्ना है    या रब    वह  ख्वाब मे
जब देखे    रात में तो     नबी    ओ    रसूल हो

✍ ज़ीशान आज़मी

Sunday, March 31, 2019

Aur bhi dukh hai zamane me mohabbat ke siwa

जिंदगी बेकार है    ऐ दोस्त    क़ुरबत  के सिवा
दुश्मनी से कुछ नहीं मिलता है नफरत के सिवा

काम धंधे छोड़कर    ए दोस्तों    रोते    हो क्यों
और भी दुख  हैं ज़माने   में   मोहब्बत के सिवा

✍ ज़ीशान आज़मी

زندگی    بیکار   ہے   اے   دوست  قربت کے سوا
دشمنی  سے   کچھ نہیں   ملتا ہے نفرت کے سوا

کام دھندے چھوڑ کر اے دوستوں روتے ہو کیوں
اور بھی    دکھ    ہے  زمانے میں محبت کے سوا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, March 25, 2019

Khoon ke Rishtey wafaa ki jo alamat hote

مال و زر   ہوتے   تو ہم   صاحبِ عزت ہوتے
آپ لوگوں    کی دعاؤں    سے  سلامت ہوتے

سب کے اعمال اگر   ماتھے پہ لکھ دیتا خدا
چھوڑ   کر  کچھ کو سبھی قابلِ نفرت ہوتے

کاش اس نے    کبھی    اک    بار   بلایا ہوتا
ان کے    دربار   میں ہم حاضرِ خدمت ہوتے

دور   اس  دیس سے جانا تھا ہمیشہ کے لئے
دوست ہم آپ کے تھے بول کے رخصت ہوتے

پڑھتے  اشعار ہمارے  بھی کھبی فرصت سے
آپ کی    نظروں   میں ہم لائقِ مدحت ہوتے

قدر ہوتی   ہی نہیں  دوستوں کی دنیا میں
خون کے   رشتے   وفا کی  جو علامت ہوتے

خلق  ذیشان   خدا    کرتا    نہیں دوزخ  کو
سب   اگر دنیا    میں   پابندِ  شریعت  ہوتے

✍ ذیشان آعظمی

Monday, March 18, 2019

Jis Shakhs ki zubaan pe shuk-e-khuda rahe

मेरी    हयात कि    तेरे लब   पर दुआ  रहे
मैं   चाहता    नहीं  तू    सदा    बेवफा रहे

एक बार मिल के तू मेरे  दिल को क़रार दे
ज़ख्मे  जिगर   ना मेरा   हमेशा   हरा  रहे

दिल है   कि भूलता  नहीं  तस्वीर यार की
कोशिश तो की थी दिल में कोई दूसरा रहे

मिलता हूं   रोज-रोज   मैं   महबूब  से मेरे
आंखों में   ऐसा   ख्वाब   हमेशा सजा रहे

खुशबू की  तरह महकेंगे अशआर  भी मेरे
यह माजरा    है इश्क़ का    कैसे  छुपा रहे

मायूस   जिंदगी    से रहे    कैसे वह भला
जिस शख्स की ज़ुबान पर शुकरे खुदा रहे

ज़ीशान    कामयाब    तू होगा   जरूर गर
रब पर    यक़ीन    और लबों पर दुआ रहे

✍ ज़ीशान आज़मी

میری     حیات کی      ترے      لب   دعا رہے
میں   چاہتا    نہیں   تو     سدا    بے وفا رہے

اک   بار    مل   کے تو مرے  دل  کو قرار دے
زخمِ جگر      نہ     میرا    ہمیشہ     ہرا   رہے

دل ہے   کہ   بھولتا    نہیں   تصویر    یار کی
کوشش تو کی تھی دل میں کوئی دوسرا رہے

ملتا ہوں   روز   روز میں محبوب  سے  مرے
آنکھوں   میں  ایسا خواب ہمیشہ   سجا رہے

خوشبو کی طرح مہکے نگے اشعار  بھی مرے
یہ   ماجرا    ہے   عشق کا   کیسے  چھپا رہے

مایوس    زندگی    سے   رہے کیسے  وہ بھلا
جس    شخص    کی  زبان پہ  شکرِ خدا رہے

ذیشان    کامیاب     تو     ہوگا    ضرور   گر
رب پر    یقین     اور      لبوں    پر  دعا  رہے

✍ ذیشان آعظمی

Friday, March 15, 2019

Sine me daagh hai ke mitaaya na jayega

खुशबू है प्यार   इसको  छुपाया न जाएगा
बिन इस के एक   लम्हा गुज़ारा न जाएगा

कसमें ना   दीजिए कि   मुलाकात हो सके
मुमकिन है हमसे वादा निभाया ना जाएगा

लाज़िम है जिंदगी  में तेरा  साथ हर क़दम
हम  से क़दम  अकेले  उठाया   ना जाएगा

गुज़रेगी   रात युं ही    अंधेरे    में बिन  तेरे
तन्हा चिराग़   हमसे    जलाया   न जाएगा

कैसे भुला   दूं तुमको,   तेरी मीठी याद का
सीने में दाग़ है   कि    मिटाया   न जायेगा

दर्दे जुदाई   पूछो न   ज़ीशान    से    कभी
शायद यह    दर्द इससे   बताया न जाएगा

✍ ज़ीशान आज़मी

خوشبو    ہے پیار   اس کو چھپایا نہ جائے گا
بن اس   کے    ایک    لمحہ   گزارا نہ جائے گا

قسمیں   نہ    دیجئے   کہ    ملاقات   ہو سکے
ممکن    ہے     ہم  سے وعدہ نبھایا نہ جائے گا

لازم    ہے     زندگی    میں   ترا ساتھ ہر قدم
ہم  سے    قدم     اکیلے     اٹھایا    نہ جائے گا

گزرے گی رات یوں ہی اندھیرے میں بن ترے
تنہا    چراغ     ہم     سے    جلایا نہ  جائے گا

کیسے    بھولا دوں    تم کو تری میٹھی یاد کا
سینے    میں    داغ ہے    کہ  مٹایا  نہ جائے گا

دردِ جدائی    پوچھو     نہ ذیشان    سے کبھی
شاید یہ    درد     اس    سے   بتایا نہ جائے گا

✍ ذیشان آعظمی

Monday, March 11, 2019

Aayiye Dil nichodh kar dekhein

नफ्स  अपना   झिंझोड    कर देखें
राहे हक़   पर भी    दौड़   कर देखें

दिल को आराम मिलता है कि नहीं
हम अना   अपनी    छोड़  कर देखें

दोस्त! आसान   काम है    कि नहीं
टूटी पत्ती   को    जोड़    कर   देखें

ख्वाहिशों   की  हमारी  हद है कोई?
आईये दिल  निचोड़कर   कर  देखें

चुप है    ज़ीशान    मुद्दतों   से चलो
उस की    खामोशी    तोड़कर  देखें

✍ ज़ीशान आज़मी

مصرع : آئیے دل نچوڑ کر دیکھیں
افاعیل: فاعلاتن مفاعلن فعلن

نفس اپنا   جھنجھوڑ  کر  دیکھیں
راہِ حق    پر  بھی دوڑ کر دیکھیں

دل کو   آرام    ملتا   ہے   کے نہیں
ہم   انا    اپنی   چھوڑ  کر دیکھیں

دوست!   آسان   کام   ہے کے نہیں
ٹوٹی    پتی    کو جوڑ کر دیکھیں

خواہشوں کی ہماری حد ہے کوئی؟
آئیے   دل     نچوڑ     کر   دیکھیں

چپ ہے   ذیشان    مدتوں سے چلو
اس  کی  خاموشی توڑ کر دیکھیں

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, February 10, 2019

Ek zarra e haqeer hoo mai khaakdaan me

क़ुरआं किताबें हक़ है खुदा   की जाहान में
यह दस्तेयाब    हमको   है अरबी ज़ुबान में

हर काम    हम शुरू    करें   रब के नाम से
फिर कामयाबी तय है हर  एक इम्तिहान में

ऐ बंद ऐ    खुदा तू     परेशां    है क्यों  यहां
रोज़ी लिखी    हुई है    तेरी     आसमान में

मिमबर से हक़   बयान तू करता नही अगर
तो दम    नहीं     है    मौलवी तेरे बयान में

दुनिया   में सबसे अच्छा हमारा ही मुल्क है
हम को    सुकून    मिलता है   हिंदुस्तान में

ख़ालिक़ की कायनात   में औक़ात क्या मेरी
एक ज़र्र ए   हक़ीर    हूं मैं     खाकदान   में

इल्मो    हुनर   दिया   तुझे    परवरदिगार ने
ज़ीशान हम्द पढ़ता जा ख़ालिक़ की शान में

✍ ज़ीशान आज़मी

قرآں   کتابِ حق ہے  خدا کی جہان میں
یہ    دستیاب   ہم کو ہے عربی زبان میں

ہر کام   ہم   شروع کریں رب کے نام سے
پھر کامیابی   طے   ہے ہراک امتحان میں

اے بندئے خدا  تو پریشاں ہے کیوں یہاں
روزی   لکھی   ہوئی ہے تیری آسمان میں

ممبر   سے   حق   بیان   تو کرتا نہیں اگر
تو دم    نہیں   ہے مولوی تیرے بیان میں

دنیا میں سب سے اچھا ہمارا ہی ملک ہے
ہم کو    سکون    ملتا   ہے ہندوستان میں

خالق   کی کائنات   میں اوقات کیا میری
ایک     ذرہ حقیر ہوں    میں خاکدان میں

علم  و ہنر    دیا    تجھے    پروردگار  نے
ذیشان حمد پڑھتا جا خالق کی شان میں

✍ ذیشان آعظمی

Monday, January 28, 2019

Gaddar nahi karte kabhi pyar watan se

ناپید ہو    ظلمت    کا   ہر اک  خار وطن سے
ایسا    کوئی   شائع   کرے   اخبار وطن  سے

اس بات کو سب جان لیں جتنے ہیں صحافی
غدار    نہیں     کرتے   کبھی    پیار وطن سے

नापेद हो ज़ुलमत का हर एक खार वतन से
ऐसा कोई  शाया   करें    अखबार वतन  से

इस बात को  सब जान लें जितने हैं सहाफी
गद्दार    नहीं   करते    कभी   प्यार वतन से

✍ Zeeshan Azmi

Friday, January 25, 2019

Makhlooq har ek shaher ki ghabraane lagi hai

अब ज़ुल्म की खेती   यहां लहराने लगी है
हर सिम्त से रोने    की सदा  आने लगी है
अपना तू    कोई भेज रहबर   मेरे अल्लाह
मखलूक़ हर एक शहर की घबराने लगी है

اب ظلم کی کھیتی یہاں لہرانے لگی ہے
ہر سمت  سے رونے کی صدا آنے لگی ہے
اپنا تو   کوئی  بھیج دے رہبر میرے اللہ
مخلوق ہراک   شہر کی گھبرانے لگی ہے

✍ Zeeshan Azmi

Wednesday, January 16, 2019

Ujlat se kab milegi masarrat jahan me

तौफीक़   ए खुदा मुझे   दे    इस जहान में
मैं  कामयाब   हो    सकूं हर    इम्तिहान में

हर काम छोड़   दिजिये बस   रब के वास्ते
बंदे को जब पुकारे  मुअज्ज़िन आजा़न  में

उलफत है,  दोस्ती है, मोहब्बत   है प्यार है
अलफाज़   कितने प्यारे   है उर्दू  जबान में

एक बार दोस्तों   से मुलाक़ात   कर   कभी
तू फर्क़ जान   जाएगा घर   और मकान में

हरगिज़ नहीं   मिलेगी जमीं पर कभी तुम्हें
मंजिल है हर बशर की फक़त आसमान में

मैं इंतजार   करता हूं    यह   मुद्दतों से बस
उजलत से  कब मिलेगी मसर्रत जहान में

ज़ीशान शायरी    तेरी     आसान है  बहुत
दिल में रखा किसी   ने किसी  ने गुमान में

✍ ज़ीशान आज़मी

उजलत = hurry, fast
मसर्रत = joy, cheerfulness

توفیق اے خدا مجھے دے اس جہان میں
میں    کامیاب   ہو سکو   ہر امتحان میں

ہر کام چھوڑ   دیجئے بس رب کے واسطے
بندے کو    جب  پکارے   مؤذن اذان میں

الفت ہے،  دوستی ہے،  محبت  ہے پیار ہے
الفاظ کتنے   پیارے   ہیں   اردو زبان میں

اک بار   دوستوں   سے ملاقات  کر کبھی
تو فرق   جان جائے گا گھر اور مکان میں

ہرگز نہیں   ملےگی  زمیں پر کبھی تمہیں
منزل    ہے ہر    بشر  کی فقط آسمان میں

میں انتظار  کرتا ہوں   یہ مدتوں سے بس
عجلت سے کب ملے گی مسرت جہان میں

ذیشان      شاعری   تیری     آسان ہے بہت
دل میں رکھا کسی نے کسی نے گمان میں

✍ ذیشان آعظمی

Friday, January 11, 2019

Phool ko toot kar har simt bikhar jana hai

हक़ पे ज़ां देना है   या हक़   से  मुकर जाना है
फैसला खुद ही  तू कर तुझ को किधर जाना है

ज़िंदगी हक़ से  जियो,  हक़ को बयां करते रहो
हम मुसलमां हैं, मुसलमान   ही   मर   जाना है

अपनी मर्ज़ी   को भला    थोपने  से क्या होगा
क्या कभी बाप    ने बच्चों   का   हुनर जाना है

कोशिशें करता    ही जा के  यह कोई बात नही
तालिबे इल्म    को    नाकामी   से डर जाना है

लूटता क्यों    है गरीबो    को तू   करके कब्ज़ा
काम कर   नेक तू,   घर रब   के अगर जाना है

कब तलक शाख पे खिलता ही रहेगा एक दिन
फूल को टूट   के हर   सिम्त    बिखर  जाना है

आज़माइश का  सफर है यह सफर दुनिया का
हम को   हंसते   हुए   ज़ीशान   गुज़र जाना है

✍ ज़ीशान आज़मी

حق پہ جاں  دینا ہے یا حق سے مکر جانا ہے
فیصلہ خود ہی تو کر تجھ کو کدھر جانا ہے

زندگی   حق سے جیو حق کو بیاں کرتے رہو
ہم مسلماں ہیں، مسلمان   ہی    مر  جانا ہے

اپنی مرضی   کو بھلا   تھوپنے سے کیا ہوگا
کیا کبھی   باپ   نے    بچوں   کا ہنر جانا ہے

کوششیں   کرتا ہی جا کہ یہ کوئی بات نہیں
طالبِ علم   کو    نا کامی    سے   ڈر جانا ہے

لوٹتا کیوں   ہے غریبوں   کو تو کر کے قبضہ
کام   کر نیک   تو، گھر   رب کی  اگر جانا ہے

کب تلک    شاخ   پہ  کھلتا ہی رہے گا اک دن
پھول کو    ٹوٹ   کے ہر سمت بکھر جانا ہے

آزمائش   کا   سفر    ہے   یہ   سفر    دنیا کا
ہم   کو ہنستے    ہوئے    ذیشان  گزر جانا ہے

✍ ذیشان آعظمی