Sunday, June 16, 2019

Girta hi ja rahaa hai kiyo mey'aar din ba din

इसकीम अच्छी लाती है सरकार दिन-ब-दिन
फिर भी अवाम   इससे है बेज़ार दिन-ब-दिन

मनसब के वास्ते   यह सियासत   की चाह में
बढ़चढ़ के आगे आते हैं हक़दार दिन-ब-दिन

बदहाली  क्यों न आएगी अपने वतन में गर
मसनद    पे बैठे  रहे    बेकार   दिन-ब-दिन

सरकारी     हस्पताल   नहीं    इसलिए यहां
हर सिम्त  बढ़ते जाते हैं बीमार दिन-ब-दिन

अल्लाह    की किताब     तो मौजूद है अभी
गिरता ही जा रहा है क्यों मेआर दिन-ब-दिन

जुल्मों   सितम है   आंखों के  ज़ीशान सामने
मजबूर हूं मैं लिखने को अशआर दिन-ब-दिन

✍ ज़ीशान आज़मी

اسکیم اچھی    لا تی   ہے سرکار دن بہ دن
پھر بھی عوام   اس سے ہے بیزار دن بہ دن

منصب کے واسطے یہ سیاست کی چاہ میں
بڑھ چڑھ کے آگے آ تے ہیں حقدار دن بہ دن

بد حالی کیو نہ آے گی اپنے وطن میں گر
مسند پہ    بیٹھتے    رہے   بیکار دن بہ دن

سرکاری     ہسپتال     نہیں اس لئے   یہاں
ہر سمت بڑھتے جاتے ہیں  بیمار  دن بہ دن

اللہ کی    کتاب    تو     موجود   ہے ابھی
گرتا ہی   جارہا ہے  کیوں  معیار دن بہ دن

ظلم و ستم ہیں آنکھوں کے ذیشان سامنے
مجبور ہوں میں لکھنے کو اشعار دن بہ دن

✍ ذیشان آعظمی

Thursday, June 13, 2019

Matam kunaaN hai rooh e risalat Baqee me

उजड़ी पड़ी है सालों से तुरबत बक़ीअ में
बिनते नबी पे  कैसी है आफत बक़ीअ में

ढाते  हैं     ज़ुल्म   मानने   वाले रसूल के
कैसे मिलेगी फिर  उन्हें   राहत बक़ीअ में

आते   हैं बार-बार    मुलाक़ात    के लिए
बेशक है  ज़ायेरीन   की जन्नत बक़ीअ में

अफसोस    का मुक़ाम है रोता है आसमां
मातम कुना  है रूह ए रिसालत बक़ीअ में

ज़ीशान  की   दुआ है    खुदा ए क़दीर से
तामिर फिर से जल्द हो तुरबत बक़ीअ में

✍ ज़ीशान आज़मी

اجڑی پڑی ہے  سالوں سے تربت بقیع میں
بنتِ نبی  پہ   کیسی   ہے  آفت بقیع میں

ڈھاتے   ہیں ظلم   ماننے والے   رسول کے
کیسے ملےگی پھر انھیں راحت بقیع میں

آتے    ہیں    بار    بار    ملاقات     کے لئے
بےشک     ہے   زائرین کی جنت بقیع میں

افسوس   کا مقام     ہے    روتا ہے آسماں
ماتم کناں    ہے  روحِ رسالت    بقيع  میں

ذیشان     کی دعا    ہے    خداے قدیر سے
تعمیر پھر    سے   جلد ہو تربت بقیع میں

✍ ذیشان آعظمی

Sunday, June 9, 2019

Ke sach baat kahna hai aadat hamari

खुदा      जानता   है  इबादत    हमारी
मोहब्बत     हमारी    अदावत   हमारी

दुआ रब से   मांगो  वह हाजत रवा है
वह  करता    है  पूरी   जरूरत हमारी

ए हाथों को  फैलाने   वाले  यक़ीं रख
खुदा ही  बदलता  है   क़िस्मत हमारी

वतन के  लिए  जान   हमने  भी दी है
उन्हें  पर   कहां  क़दरो  क़िमत हमारी

हुकूमत का मौक़ा अगर हमको मिलता
दिखा  देते  हम  भी   अदालत  हमारी

कहूं   दूध को दूध,      पानी को पानी
के सच  बात कहना है  आदत हमारी

अगर हम  भी   ज़ीशान  होते ग़नी तो
जहां देखता    फिर  सख़ावत  हमारी

✍ ज़ीशान आज़मी

خدا      جانتا     ہے    عبادت    ہماری
محبت      ہماری     عداوت      ہماری

دعا رب  سے مانگو وہ حاجت  روا ہے
وہ کرتا ہے    پوری     ضرورت  ہماری

اے ہاتھوں کو پھیلانے والے یقیں رکھ
خدا ہی    بدلتا     ہے     قسمت ہماری

وطن    کے  لئے جان ہم نے بھی دی ہے
اُنھیں    پر    کہاں قدر و قیمت ہماری

حکومت   کا    موقع    اگر ہم کو ملتا
دکھا   دیتے ہم    بھی  عدالت   ہماری

کہوں   دودھ  کو  دودھ پانی کو پانی
کہ سچ     بات    کہنا  ہے عادت ہماری

اگر ہم     بھی    ذیشان  ہوتے  غنی تو
جہاں   دیکھتا     پھر   سخاوت ہماری

✍ ذیشان آعظمی

Monday, June 3, 2019

Phir baat mere man ki man me rah gayee

न जाने   उम्र    कौन     से   मदफन में रह गई
एक ज़िंदगी थी    क़िमती   उलझन  में रह गई

मुझको    नहीं था    शौक़ जवानी का हाँ मगर
यह   आरज़ू    मेरी   बचपन    में     रह    गई

यह मुजेज़ा किताबे    खुदा   का    नहीं तो क्या
आयत जो दिल में उतरी वह धड़कन में रह गई

कुछ    बात मैं   कहूं    कि   सभी  टोकने   लगे
फिर बात    मेरे   मन की  मेरे    मन  में रह गई

देखा    था ख्वाब    मैंने  जो अहलो अयाल का
ज़ीशान एक   वो याद   भी    गुलशन में रह गई

✍ ज़ीशान आज़मी

نہ جانے عمر کون    سے   مدفن  میں رہ گئی
اک زندگی تھی    قیمتی الجھن میں رہ گئی

مجھ   کو نہیں  تھا شوق جوانی کا ہاں مگر
یہ ایک    آرزو    مری     بچپن   میں رہ گئی

یہ معجزہ   کتابِ    خدا    کا    نہیں  تو کیا
آیت جو دل میں اتری وہ دھڑکن میں رہ گئی

کچھ   بات میں  کہوں کہ   سبھی ٹوکنے لگے
پھر بات  میرے من کی مرے من میں  رہ گئی

دیکھا تھا  خواب   میں   نے جو اہل و عیال کا
ذیشان اک   وہ     یاد بھی  گلشن میں  رہ گئی

✍ ذیشان آعظمی