Thursday, June 13, 2019

Matam kunaaN hai rooh e risalat Baqee me

उजड़ी पड़ी है सालों से तुरबत बक़ीअ में
बिनते नबी पे  कैसी है आफत बक़ीअ में

ढाते  हैं     ज़ुल्म   मानने   वाले रसूल के
कैसे मिलेगी फिर  उन्हें   राहत बक़ीअ में

आते   हैं बार-बार    मुलाक़ात    के लिए
बेशक है  ज़ायेरीन   की जन्नत बक़ीअ में

अफसोस    का मुक़ाम है रोता है आसमां
मातम कुना  है रूह ए रिसालत बक़ीअ में

ज़ीशान  की   दुआ है    खुदा ए क़दीर से
तामिर फिर से जल्द हो तुरबत बक़ीअ में

✍ ज़ीशान आज़मी

اجڑی پڑی ہے  سالوں سے تربت بقیع میں
بنتِ نبی  پہ   کیسی   ہے  آفت بقیع میں

ڈھاتے   ہیں ظلم   ماننے والے   رسول کے
کیسے ملےگی پھر انھیں راحت بقیع میں

آتے    ہیں    بار    بار    ملاقات     کے لئے
بےشک     ہے   زائرین کی جنت بقیع میں

افسوس   کا مقام     ہے    روتا ہے آسماں
ماتم کناں    ہے  روحِ رسالت    بقيع  میں

ذیشان     کی دعا    ہے    خداے قدیر سے
تعمیر پھر    سے   جلد ہو تربت بقیع میں

✍ ذیشان آعظمی

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